शुक्रवार, 15 मई 2015
ऐसे में तो हाउसिंग बोर्ड और बीडीए में डल जाएगा ताला
6,000 करोड़ का देना होगा मुआवजा
भोपाल। नए भूमि अधिग्रहण कानून के चलते भोपाल विकास प्राधिकरण के साथ-साथ हाउसिंग बोर्ड जैसी संस्थाओं में भी ताले डलने की नौबत आ गई है। प्राधिकरण की तमाम योजनाओं में विकास कार्य ठप पड़े हैं और अनुबंधित जमीनें भी हासिल नहीं हो पा रही, क्योंकि किसानों के साथ-साथ अन्य जमीन मालिकों ने समय सीमा में विकसित भूखंड न मिलने पर अब दो से चार गुना नकद मुआवजे की मांग शुरू कर दी है। प्राधिकरण की योजनाओं में लगभग 5 हजार एकड़ जमीन अधिग्रहित की जाना है और नए कानून के मुताबिक इनका नकद मुआवजा 6 हजार करोड़ रुपए से अधिक बनता है जो प्राधिकरण किसी सूरत में चुका नहीं सकता, जिसके चलते आने वाले दिनों में प्राधिकरण ही ठप हो जाएगा। यही स्थिति हाउसिंग बोर्ड से लेकर अन्य योजनाओं और एकेवीएन व उद्योग विभाग की भी रहेगी, क्योंकि वे भी भारी-भरकम नकद मुआवजा देकर जमीनें नहीं अधिग्रहित कर पाएंगे।
5 अप्रैल को अध्यादेश की अवधि समाप्त हो रही थी, उसके पहले उसे दोबारा मंजूरी देकर और 6 महीने का समय ले लिया ताकि राज्यसभा से इसे मंजूर करवाने के प्रयास किए जाएं। भोपाल में ही विकास प्राधिकरण इस नए कानून के आने के बाद से हाथ पर हाथ धरे बैठा है और जिन जमीनों का अनुबंध कर लिया गया उनके भी मालिकों और किसानों ने दो से चार गुना नकद मुआवजे की मांग शुरू कर दी। अगर कांग्रेस का ही कानून लागू रहता है तो भोपाल विकास प्राधिकरण सहित हाउसिंग बोर्ड और अन्य संस्थाओं में ताले डल जाएंगे और उद्योगों के लिए भी एकेवीएन जमीनें किसी सूरत में नहीं ले सकेगा। किसानों की मूल मांग ही यही थी कि उन्हें बाजार दर के हिसाब से मुआवजा दिया जाए, तो वे अपनी जमीनें सहर्ष देने को तैयार हैं। कांग्रेस शासन ने जो भूमि अधिग्रहण बिल 2013 लागू किया, उसमें किसानों का मुआवजा अच्छा खासा कर दिया। शहरी क्षेत्र में बाजार दर यानी गाइड लाइन से दोगुना और ग्रामीण क्षेत्र में 4 गुना तक मुआवजा देने का प्रावधान किया है। नतीजतन, मोदी सरकार ने अध्यादेश के जरिए इसके जटिल प्रावधानों को खत्म करने का निर्णय लिया। भाजपा का कहना है कि 32 राज्यों की मांग पर ये अध्यादेश लाया गया है और इसमें किसानों का मुआवजा एक रुपया भी नहीं घटाया गया है। औद्योगिक केन्द्र विकास निगम, जिसने तमाम औद्योगिक क्षेत्रों को उद्योग विकास के साथ विकसित किया है, अब उसे दिल्ली, मुंबई इंडस्ट्रीयल कॉरिडोर से लेकर पीथमपुर, बेटमा क्लस्टर और अन्य तमाम प्रोजेक्टों के लिए जमीनें चाहिए जो हासिल ही नहीं हो पा रही है।
अब तक नकद नहीं, विकसित भूखंड की नीति
कांग्रेस का बनाया भूमि अधिग्रहण कानून भोपाल के ही सबसे बड़े कॉलोनाइजर विकास प्राधिकरण को भारी पड़ रहा है। अभी तक भोपाल विकास प्राधिकरण जमीन मालिकों और किसानों के साथ नकद मुआवजे की बजाए विकसित भूखंड देने के अनुबंध करता रहा और यह फॉर्मूला अत्यंत कारगर भी रहा, जिसे अन्य राज्यों द्वारा अपनाए जाने की बात भी सामने आई। इसी के चलते प्राधिकरण ने जमीनें अनुबंध के जरिए लेकर सौंप दी, मगर नया कानून आने के बाद जमीन मालिकों और किसानों की भी नियत बदल गई और विकसित भूखंड की बजाय उन्होंने दो से चार गुना नकद मुआवजा मांगना शुरू कर दिया, जिसके चलते प्राधिकरण की हाल-फिलहाल की घोषित योजनाएं संकट में आ गईं। जिन किसानों ने अनुबंध कर लिए उन्होंने भी प्राधिकरण को नोटिस थमा दिए कि विकसित भूखंड नहीं चाहिए और नकद मुआवजा ही दिया जाए।
600 करोड़ की प्रापॅर्टी बेचने बोर्ड जारी करेगा विज्ञापन
उधर, हाउसिंग बोर्ड ने राजधानी में काफी समय से खाली पड़ी प्रॉपटी बेचने के लिए जल्द ही विज्ञापन जारी करने की बात कही है। पूरे मप्र की बात करें तो राजधनी में विभिन्न लोकेशनों में लगभग 17 करोड़ रुपए की प्रापॅर्टी खाली पड़ी हुई है। हालांकि शहर में 7 करोड़ से अधिक की प्रापॅर्टी बोर्ड ने हाल ही में बेच दी है। अब बची हुई प्रॉपर्टी बेचने के लिए विज्ञापन जारी किया जाएगा।
इसी प्रकार पूरे मप्र में विज्ञापन जारी कर 600 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी बेची जाएगी। गौरतलब है कि पूरे प्रदेश में यह प्रॉपर्टी लगभग पांच साल से खाली पड़ी हुई है। इस कारण बोर्ड को राजस्व में भी नुकसान हो रहा है। इसमें वह प्रॉपर्टी भी शामिल है, जो किराए पर चल रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, हाउसिंग बोर्ड की प्रॉपर्टी के दाम अधिक होने से कई स्थानों पर ग्राहकों ने खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। इससे बोर्ड को घाटा भी सहना पड़ा था। इस बार बोर्ड ने प्रॉपर्टी बेचने के लिए 25 प्रतिशत राशि कम की है। 25 प्रतिशत राशि कम करने से प्रॉपर्टी जल्द बिकने के आसार हैं। गौरतलब है कि हाउसिंग बोर्ड की कई योजनाएं अटकी पड़ी हुई हैं। वहीं कई योजनाओं का काम समयसीमा में पूर्ण न होने से भी घाटा उठाना पड़ रहा है। इस बार कलेक्टर गाइड लाइन के तहत भूमि के दाम न बढ़ाने से बोर्ड ने राहत की सांस ली है, क्योंकि कलेक्टर गाइड लाइन के हिसाब से बोर्ड हितग्राहियों से राशि वसूलता है, जिससे हितग्राहियों को नुकसान उठाना पड़ता है।
भोपाल में खाली थी 17 करोड़ की प्रॉपर्टी
पूरे प्रदेश की बात करें तो हाउसिंग बोर्ड की भोपाल में 17 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी खाली पड़ी थी। मात्र 18 दिनों में बोर्ड ने 17 करोड़ मेें से 6 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी बेच दी है। प्रॉपर्टी बेचने के लिए बोर्ड द्वारा समय -समय पर निविदाएं और ऑफर बुलाए जाते हैं। इसी के आधार पर प्रॉपर्टी बेची जा रही है। सूत्रों की मानें तो 25 प्रतिशत दाम कम करने से प्रॉपर्टी खरीदने के लिए ग्राहक भी मिल रहे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि प्रदेश में अच्छा रिस्पांस मिलेगा।
कम दाम में बेची जा रही संपत्ति
हाउसिंग बोर्ड ने पुरानी प्रॉपर्टी बेचने के लिए 25 प्रतिशत दाम किए हैं। दाम कम करने का फायदा बोर्ड को मिलने की संभावना है। इससे ग्राहक को फायदा है। शहर के तमाम प्राइम लोकेशन में बोर्ड की संपत्ति खाली पड़ी हुई है। दाम ज्यादा होने से ग्राहकों ने प्रॉपर्टी खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। इसलिए बोर्ड को करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ रहा था।
मुख्य संपदा अधिकारी, हाउसिंग बोर्ड अखिल वर्मा कहते हैं कि हाउसिंग बोर्ड ने पूरे प्रदेश में 25 प्रतिशत राशि कम कर लगभग 600 करोड़ रुपए की प्रॉपटी बेचने का निर्णय लिया है। इसकी शुरुआत भोपाल से हो चुकी है। अन्य शहरों में जल्द ही निविदाएं बुलाई जाएंगी। हाउसिंग बोर्ड के संपत्ति अधिकारी सुनील चेलानी कहते हैं कि हाउसिंग बोर्ड ने भोपाल में 17 करोड़ रुपए की खाली प्रॉपर्टी में से 6 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी बेच दी है। उम्मीद है कि 11 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी जल्द बेच दी जाएगी।
नगर तथा ग्राम निवेश में अब फाइलों की आवक बंद
इधर, नगरीय विकास एवं पर्यावरण विभाग ने इस संबंध में एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है, जिसमें अब यह जिम्मा नगर निगम की कॉलोनी सेल को सौंपा गया है जहां एकल खिड़की पर अब इन प्रकरणों की फाइलों की आवक होगी और वहीं से नगर तथा ग्राम निवेश के अलावा एनओसी के लिए प्राधिकरण, नजूल, सिलिंग व अन्य विभागों को पत्र लिखे जाएंगे। इससे टाउनशिप व बहुमंजिला इमारतों से लेकर सभी तरह के अभिन्यासों की मंजूरी के प्रकरण अब सीधे नगर तथा ग्राम निवेश में जमा नहीं होंगे।
उल्लेखनीय है कि जब भी इन्वेस्टर्स समिट या ऐसे आयोजन होते हैं तो उसमें एकल खिड़की यानि सिंगल विंडो का हल्ला मचाया जाता है और मुख्यमंत्री से लेकर सभी आला अफसर ये दावे करते हैं कि निवेशकों और प्रोजेक्ट लाने वालों को सारी अनुमतियां एकल खिड़की के माध्यम से ही उपलब्ध कराई जाएंगी। हालांकि भोपाल सहित पूरे मध्यप्रदेश में एकल खिड़की का दावा तो पिछले कई सालों से किया जा रहा है, मगर लाल फीताशाही के चलते ये एकल खिड़कियां भी अन्य विभागों के साथ-साथ एक अन्य खिड़की के रूप में ही जानी जाने लगी और खुद मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने इस बात को स्वीकार भी किया है कि सिंगल विंडो मीन्स वन अनदर विंडो। पिछले दिनों ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में प्राप्त प्रस्तावों और निवेशकों से सीधी चर्चा के दौरान एक नया शब्द शासन ने ईजाद किया जिसको नाम दिया ईज ऑफ डुइंग बिजनेस, जिसके चलते पूरे मध्यप्रदेश में नगर निगम क्षेत्रों में मध्यप्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम 1973 के अंतर्गत कॉलोनी के ले-आउट की विकास अनुज्ञा तथा मध्यप्रदेश नगर पालिक अधिनियम 1956 के तहत बिल्डिंग परमिशन तथा मध्यप्रदेश नगर पालिका (कॉलोनाइजर का रजिस्ट्रीकरण निवर्धन तथा शर्तें) नियम 1998 के तहत विकास की अनुमति प्रदान करने के लिए सिंगल डोर प्रणाली की व्यवस्था लागू की जाती है। नगरीय विकास एवं पर्यावरण विभाग की उपसचिव वर्षा नावलेकर ने विधिवत आदेश भी जारी कर दिया, जिसके चलते अब भोपाल के नगर तथा ग्राम निवेश कार्यालय में भी किसी भी तरह के नए अभिन्यास अथवा संशोधन या बहुमंजिला इमारतों के हाईराइज वाले प्रकरणों की फाइलें लेना बंद कर दी गई हैं। अब नगर तथा ग्राम निवेश से संबंधित सारे प्रकरणों को निगम के कॉलोनी सेल की एकल खिड़की पर ही जमा कराना होंगे। नगर तथा ग्राम निवेश में इन्वर्ट का काम बंद हो गया है और सिर्फ अभिन्यास मंजूरी के बाद उसका डिस्पेच वहां से होगा।
अभी नगर निगम के कॉलोनी सेल ने एकल खिड़की का सेटअप तैयार नहीं किया है और इसकी तैयारी चल रही है। वैसे इस आदेश को लागू करने के बाद से अभी तक एक भी प्रकरण आवक नहीं हुआ है, लेकिन नगर तथा ग्राम निवेश ने अवश्य 1 अप्रैल से ही फाइलें आवक करना बंद कर दी। अब नए आदेश के तहत नगर निगम की एकल खिड़की में जमा होने वाले इन आवेदनों को अलग-अलग विभागों में भेजा जाएगा। निगम सबसे पहले नगर तथा ग्राम निवेश को फाइल भेजेगा और साथ ही इंदौर विकास प्राधिकरण से मांगी जाने वाली एनओसी के साथ-साथ सीलिंग, डायवर्शन के साथ-साथ अन्य एनओसी के लिए भी पत्र संबंधित विभागों को लिखेगा। इनमें नगर निगम क्षेत्र में विकसित होने वाली कॉलोनियों के अभिन्यास, बहुमंजिला बिल्डिंगों के आवेदन और अभिन्यास संशोधन के लिए धारा 29(1) में लिए जाने वाले आवेदन भी शामिल रहेंगे। इसके साथ ही नगरीय विकास एवं पर्यावरण विभाग ने यह भी स्पष्ट कहा है कि इन आवेदनों की समीक्षा हर 15 दिन में अनिवार्य रूप से सक्षम प्राधिकारी जो कि नगर निगम के आयुक्त होंगे, द्वारा की जाएगी, जिसमें संबंधित विभागों के अधिकारी मौजूद रहेंगे। नगर तथा ग्राम निवेश, कलेक्टर कार्यालय, प्राधिकरण और हाउसिंग बोर्ड के अधिकारियों को इसमें शामिल किया गया है। उक्त विभागों के प्रतिनिधि मध्यप्रदेश नगर तथा ग्राम अधिनियम 1973, मध्यप्रदेश नगर पालिक अधिनियम 1956 तथा मध्यप्रदेश नगर पालिक नियम 1998 के अंतर्गत प्राप्त आवेदनों पर समय सीमा में अनापत्ति व अनुज्ञा उपलब्ध कराएंगे और अगर अनापत्ति और अनुज्ञा नहीं दी जा सकती तो उसकी भी लिखित जानकारी समीक्षा बैठक में प्रस्तुत करना जरूरी रहेगा। इतना ही नहीं इन सभी कार्रवाई को ऑनलाइन करने को भी कहा गया है ताकि सभी विभागों से ऑनलाइन ही पत्राचार किया जा सके और इसकी व्यवस्था भी नगर निगम को ही करना होगी। हालांकि अभी नगर निगम भवन अनुज्ञा के नक्शे ऑनलाइन लेता है, मगर अब कॉलोनी सेल में तैयार की जाने वाली एकल खिड़की के लिए भी ऑनलाइन सिस्टम तैयार करना होगा, जिसकी तैयारी नगर निगम ने शुरू कर दी है। शासन की मंशा है कि अभिन्यास मंजूरी और भवन निर्माण मंजूरी में लगने वाले विलंंब को खत्म किया जा सके और अब ये सारी प्रक्रिया एकल खिड़की के माध्यम से ही की जाए और इससे भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगाने का दावा किया गया है, क्योंकि रियल एस्टेट के तमाम कारोबारी और निवेशक आरोप लगाते रहे हैं कि इन अनुमतियों की एवज में लाखों रुपए खर्च करना पड़ते हैं। मगर अब इन अनुमतियों की समय सीमा तय कर दी गई है और अनुमति ना दिए जाने की जानकारी भी आवेदक को लिखित में मिल जाएगी।हर 15 दिन में प्रकरणों की समीक्षा अनिवार्य
एकल खिड़की पर जितने भी प्रकरण नगर निगम के कॉलोनी सेल को प्राप्त होंगे उनकी समीक्षा हर 15 दिन में करना अनिवार्य रहेगा। यह समीक्षा सक्षम प्राधिकारी जो कि नगर निगम आयुक्त होंगे, उनके द्वारा की जाएगी और इस समीक्षा बैठक में नगर तथा ग्राम निवेश, कलेक्टर कार्यालय से नजूल अधिकारी, व्यपवर्तन यानी डायवर्शन की अनुमति देने वाले एसडीओ, विकास प्राधिकरण और हाउसिंग बोर्ड के अधिकारी मौजूद रहेंगे और वे एक-एक प्रकरण के संबंध में इसी समीक्षा बैठक में जानकारी भी देंगे। सभी विभागों से ली जाने वाली एनओसी भी अब समय सीमा में प्राप्त होगी और यह भी तय किया जाएगा कि अधिनियम और नियम में जिन-जिन कार्यों के लिए समयावधि तय की गई है वह उसी प्रक्रिया के तहत हो और प्राप्त आवेदनों का निराकरण का प्रारुप संबंधित विभागों के नियमों के अधीन रहेगा।
93 लाख लोगों की जेब काटी सरकार ने
किसानों की बिजली भी 13 फीसदी महंगी कर डाली, 50 यूनिट खपत वाले ढूंढना पड़ेंगे उपभोक्ता
भोपाल। जितनी बिजली उतने दाम का नारा देकर सरकार में आई भाजपा ने दोगुने से अधिक बिजली के दाम अपने कार्यकाल में बढ़ा दिए हैं। एक बार फिर 93 लाख घरेलू उपभोक्ताओं को महंगी बिजली का झटका शिव के राज में लगा है। विद्युत नियामक आयोग ने 25 अप्रैल से बढ़ी हुई दरें लागू करने की अनुमति बिजली कम्पनियों को दे दी है, यानि अगले माह से सबके बिल 10 से 20 फीसदी तक बढ़ जाएंगे। 50 यूनिट तक खपत वाले उपभोक्ताओं की दरों में वृद्धि ना करने का दावा किया गया है, मगर इस श्रेणी के उपभोक्ताओं को ढूंढना भी पड़ेगा, क्योंकि झुग्गी झोपड़ीवासियों की भी इससे अधिक यूनिट खपत महीनेभर में हो जाती है। यहां तक कि किसानों को भी नहीं छोड़ा और उनकी बिजली भी 13 फीसदी महंगी कर डाली।
हर साल भोपाल सहित प्रदेश की तीनों कम्पनियां हजारों-करोड़ों के घाटे का हवाला देकर आयोग के समक्ष याचिकाएं दायर करती है और आयोग दिखावटी सुनवाई के बाद दरें बढ़ाने की मंजूरी दे देता है। मजे की बात यह है कि कम्पनियों को होने वाला फायदा तो उसके खाते में और घाटे की भरपाई आम उपभोक्ताओं की जेब काटकर की जाती रही है। अभी जो वृद्धि की गई उसके बावजूद बिजली कम्पनियां घाटे में रहेगी, क्योंकि पारेक्षण यानि वितरण क्षति अभी भी 25 फीसदी तक बनी है, जिसमें से आधी बिजली चोरी करवाई जाती है। तीनों बिजली कम्पनियों को इस बढ़ोतरी के बाद साढ़े 26 हजार करोड़ रुपए से अधिक की राशि मिलेगी और लगभग 3 हजार करोड़ रुपए की आय अनुमानित की गई है। तीनों बिजली कम्पनियों के कुल उपभोक्ताओं की संख्या 1 करोड़ 32 लाख से अधिक है। इनमें से सर्वाधिक 93 लाख तो घरेलू उपभोक्ता ही हैं।
10 साल में दो गुना से अधिक हो गए दाम
10 साल में भाजपा के राज में बिजली के दाम दो गुना से अधिक बढ़ गए हैं, जबकि पूर्व की कांग्रेस की दिग्गी सरकार को सड़क के अलावा सबसे ज्यादा गालियां बिजली के मामले में ही खाना पड़ी और भाजपा ने दावा किया था कि जनता को बिजली की इस लूटपट्टी से राहत दिलवाएंगे। अब बिजली तो अवश्य पहले से अधिक मिल रही है मगर उसके एवज में जनता को दाम भी अधिक चुकाना पड़ रहे हैं। अब घरेलू बिजली साढ़े 3 रुपए यूनिट से लेकर 6 रुपए यूनिट तक पहुंच गई है और उसके साथ ढेर सारे अतिरिक्त शुल्क अलग वसूल किए जाते हैं।
तेज भागते मीटरों ने भी बढ़ा डाले बिल
सरकार बनाने के पहले भाजपा ने यह भी दावे किए थे कि तेज भागते इलेक्ट्रॉनिक मीटरों से जनता को छुटकारा दिलाया जाएगा। दरअसल जब से ये इलेक्ट्रॉनिक मीटर लगे हैं तब से ही घर-घर के बिजली बिल बढऩे लगे वरना पहले सामान्य उपभोक्ता का बिजली बिल 100, 150, 200 रुपए तक का आता था जो अब बढ़कर 800-1000 रुपए तक पहुंच गया है। इतना ही नहीं बिजली कम्पनियों ने सांठगांठ करते हुए ये इलेक्ट्रॉनिक मीटर ऐसे बनवाए हैं कि ये हर तरह की खपत दर्शाते हैं और पिछले दिनों ही विधानसभा में स्वीकार किया गया कि जांच में भी यह पाया गया कि ये इलेक्ट्रॉनिक मीटर तेज गति से भागते हैं।
15 फीसदी से अधिक बढ़ेगा निगम का बिल
आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ कड़की में चल रहे इंदौर नगर निगम का बिजली का बिल भी 15 प्रतिशत से अधिक बढ़ जाएगा। अभी नर्मदा परियोजना पर ही नगर निगम को लगभग 120 करोड़ रुपए सालाना बिजली बिल चुकाना पड़ता है, जिसमें 15 फीसदी तक बढ़ोतरी हो जाएगी। सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोडवानी ने निगम के मामले में आयोग के समक्ष आपत्ति भी दर्ज करवाई थी। हालांकि नगर निगम के तो सारे कर्णधार सोए रहे। नर्मदा के बिल में 14 प्रतिशत और यशवंत सागर तथा बिलावली के स्थायी प्रभार में 13 प्रतिशत और 10 प्रतिशत प्रति यूनिट में वृद्धि आयोग ने की है।
जब उत्पादन बढ़ रहा है तो दामों में वृद्धि क्यों?
बीते सालों में मध्यप्रदेश में बिजली का उत्पादन भी बढ़ा और कांग्रेस राज की तुलना में दो गुना से अधिक उत्पादन हो गया है। पहले मांग और आपूर्ति के बीच डेढ़ से 2 हजार मेगावाट का अंतर रहता था, जिसके चलते अन्य राज्यों से अधिक दरों पर बिजली खरीदना पड़ती थी, मगर अब शिवराज सरकार एक तरफ ये दावे करती है कि बिजली का उत्पादन ना सिर्फ बढ़ गया बल्कि अब अन्य राज्यों को सरप्लस बिजली बेची जा रही है। यहां तक कि अम्बानी सहित अन्य औद्योगिक घरानों को कोयला खदानें आवंटित की गई और उनसे पॉवर प्लांट भी लगवाए, जिसमें दावा किया गया कि सस्ती बिजली बनेगी, लेकिन पौने दो रुपए यूनिट अम्बानी के प्लांट से बिजली खरीदने वाली शिवराज सरकार जनता को 6 रुपए यूनिट तक की महंगी बिजली आप ने लिया कम वृद्धि का श्रेय बेच रही है। सवाल यह है कि जब उत्पादन बढ़ रहा है तो फिर दामों में लगातार वृद्धि क्यों हो रही है?
कांग्रेस बिजली के मामले में इसलिए विरोध नहीं कर सकती क्योंकि उसी ने बिजली कम्पनियों के सेटअप से लेकर नियामक आयोग जैसी संस्थाएं बनाई और इलेक्ट्रॉनिक मीटर भी कांग्रेस की ही देन है। उसके एक बड़े नेता की मीटर बनाने की फैक्ट्री भी रही और तमाम ठेकेदार कांग्रेस के ही रहे जो अब भाजपा के भी हो गए हैं। यही कारण है कि आज तक कांग्रेस बिजली के मामले में कभी भी दमदानी से लड़ाई नहीं लड़ पाई। इस बार अवश्य आम आदमी पार्टी यानि आप ने बिजली कम्पनियों के खिलाफ प्रदेश में विरोध शुरू किया और एक लाख से अधिक आपत्तियां आयोग के समक्ष प्रस्तुत की और धरने प्रदर्शन के आयोजन भी किए। अब आप ने इस बात का श्रेय लिया है कि उनके आंदोलन के चलते ही 24 प्रतिशत से अधिक बिजली महंगी नहीं हुई और सिर्फ 10 प्रतिशत तक ही दाम बढ़ाए गए।
फ्यूल कॉस्ट के नाम पर 24 पैसे बढ़ाए
नियामक आयोग के बिजली की दरें बढ़ाने से आम आदमी की जेब पर भार काफी बढ़ गया है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव के कारण 2013-14 में नियामक आयोग ने बिजली की दरें सीधे तौर पर तो नहीं बढ़ाई लेकिन फ्यूल कॉस्ट के नाम पर जरूर वर्तमान टैरिफ से 24 पैसे प्रति यूनिट अधिक वसूला जा रहा था। इसके बाद अब जो दरें बढ़ाई गई है उसने आम आदमी के घर का बजट ही गड़बड़ा दिया है क्योंकि 300 यूनिट की खपत वाले उपभोक्ताओं को अब तक बिजली 5.40 पैसे प्रति यूनिट के हिसाब से मिल रही थी, लेकिन अब उसको प्रति यूनिट के हिसाब से 5.77 पैसे चुकाने होंगे। जबकि गैर घरेलू उपभोक्ताओं पर सीधे 50 पैसे प्रति यूनिट की बढोतरी की गई है।
पिछले टैरिफ और नए टैरिफ में अंतर:
यूनिट वर्तमान दरें नई दरें
100 4.27 4.42
300 5.40 5.77
गैर घरेलू उपभोक्ता
200 6 रुपए 6.50
इसके पहले कब बढ़ी थी दरें:
नियामक आयोग ने इसके पहले सन 2012-13 में बिजली की प्रति यूनिट दरें बढ़ाई थी। उस दौरान .07 प्रतिशत के हिसाब से वृद्धि की गई थी। इसके बाद लोकसभा विधानसभा चुनाव थे और यदि दरें बढ़ाई जाती तो सरकार को नुकसान तय था इसलिए बिजली की दरों में कोई बढोत्तरी नहीं की गई।
आखिर क्यों बढ़ाई दरें:
नियामक आयोग ने बिजली कंपनी को फ्यूल कॉस्ट एडजेस्टमेंट की छूट दे रखी है। जिसे कारण 2013-14 में सीधे तौर पर तो दरें नहीं बढ़ी लेकिन फ्यूल कॉस्ट के नाम पर 24 पैसे पिछले वर्ष बढ़ाए गए हैं। कुल मिलाकर बिजली कंपनी गुपचुप तरीके से पहले से ही उपभोक्ता से पिछले टैरिफ के मुकाबले 24 पैसे प्रति यूनिट अधिक वसूल रही थी। जबकि इस अवधि में जब फ्यूल सस्ता हुआ तो रेट कभी भी कम नहीं किए गए। उधर एक्सपर्ट का कहना है कि जब फ्यूल कॉस्ट के नाम पर कंपनियों को दरें बढ़ाने की पहले ही अनुमति दी गई है तो फिर अलग से बिजली की दरें बढाने का क्या मतलब है।
एक कूलर भी बढ़ाएगा बोझ:
100 यूनिट पर बिजली की दरें कम बढाई गई है जबकि 300 यूनिट पर अधिक बढ़ी है। खास बात यह है कि यदि घर में एक कूलर भी है तो बिजली बिल 200 यूनिट के पार हो जाता है। ऐसे में सामान्य उपभोक्ता पर सबसे ज्यादा भार बढा है।
ऐसे समझें जेब पर पडऩे वाले भार को:
यूनिट खपत वर्तमान बिजली बिल कितना बढ़ेगा
100 427 442
300 1622.50 1732.50
गैर घरेलू उपभोक्ता
200 1200 1300
सीएजी से ऑडिट से खुलेगी पोल:
कंपनियां हमेशा घाटे का हवाला देकर बिजली की दरें बढ़ाने का प्रस्ताव देती है, लेकिन जब बात ऑडिट की आती है तो कंपनियां सीएजी से ऑडिट कराने से कतराती हैं। यही वजह है कि कंपनियां हमेशा निजी ऑडिटरों से ऑडिट कराती है जिसके कारण कभी यह पता नहीं चलता है कि मुनाफे और घाटे की हकीकत आखिर क्या है।
पहले रिटायर्ड जस्टिस होते थे अध्यक्ष:
नियामक आयोग के अध्यक्ष 2003 में रिटायर्ड जस्टिस सचिन द्विवेदी थे। नियम भी था कि अध्यक्ष रिटायर्ड जस्टिस को ही बनाया जाए लेकिन उस समय 2006 तक जब बिजली की दरें नहीं बढ़ाई गई तो शासन ने नियमों में संशोधन करते हुए रिटायर्ड जस्टिस के साथ ही रिटायर्ड प्रमुख सचिव को भी अध्यक्ष बनाने का प्रावधान शामिल कर दिया। इसके बाद रिटायर्ड पीएस एसके मल्होत्रा को अध्यक्ष बनाया गया था, तब से रिटायर्ड पीएस को ही अध्यक्ष बनाया जा रहा है और लगातार बिजली की दरें बढ़ भी रही हैं।
मोदी 'सरÓ की पाठशाला में मप्र के आईएएस फेल
अहम मंत्रालयों की डोर 'सुपर पीएमओÓ के हाथ
दिल्ली में घटता जा रहा मप्र के आईएएस का रुतबा!
भोपाल। मप्र कैडर के आईएएस अफसर हमेशा अपनी मेहनत और बेहतर कार्यप्रणाली के लिए सराहे जाते रहे हैं। केंद्र में किसी भी पार्टी की सरकार हो या कोई भी प्रधानमंत्री हो मप्र के नौकरशाहों ने हमेशा अपना उत्कृष्ट योगदान दिया है। लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार के लगभग एक साल के कार्यकाल में मध्यप्रदेश के नौकरशाहों की भूमिका महत्वपूर्ण नहीं हो सकी। या यूं कहे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यप्रणाली में मप्र के आईएएस फिट नहीं बैठ रहे हैं। यही कारण है कि हालही में मोदी सरकार ने अहम मंत्रालयों में सचिव व संयुक्त सचिव स्तर पर अफसरों की भूमिकाओं में जो परिवर्तन किया है, उसमें मप्र कॉडर के बिमल जुल्का, स्नेहलता कुमार, राजन कटोच व जेएस माथुर(अतिरिक्त सचिव)अपनी भूमिका बरकरार तो रख पाए हैं, लेकिन अहम महकमों में मप्र के अफसरों को जिम्मेदारी नहीं मिली। इसके पीछे मुख्य वजह यह बताई जा रही है कि पीएमओ की दक्षता गाइड लाइन पर मप्र के अफसर खरे नहीं उतर सके हैं। पीएमओ के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार केंद्र में पदस्थ मप्र कैडर के 33 आईएएस में से मात्र पांच के कार्य को सराहा गया है, जबकि 28 आईएएस के कार्य को मात्र संतोषप्रद माना गया है।
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पदभार संभालते ही सबसे पहले नौकरशाही पर नकेल कसने की कोशिश की। इसके लिए कई तरह की गाइड लाइन बनाई। मोदी की आक्रामकता देख नौकरशाह भी सहम गए। मोदी ने केंद्र में अफसरों की कमी की पूर्ति के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से अपने कोटे के 952 अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर भेजने के लिए यह गाइड लाइन जारी की । केंद्र ने कहा है कि उसके पास उपसचिव, निदेशक स्तर के आईएएस अधिकारियों की बहुत कमी है। जो आईएएस 14 साल की सेवा पूरी कर चुके हैं वे निदेशक तथा जो 9 साल की सेवा पूरी कर चुके हैं वे उपसचिव पर प्रतिनियुक्ति पर भेजे जा सकते हैं। इसके अलावा संयुक्त सचिव स्तर के आईएएस अधिकारियों की भी मांग की गई है। बताया जाता है कि मोदी सरकार की कार्यप्रणाली और जरा-सी चुक पर मिडनाइट ट्रांसफर से घबराकर किसी भी प्रदेश का कोई भी आईएएस दिल्ली जाना नहीं चाहता है। आईएएस की कमी के कारण जहां एक-एक अफसर पर कई विभागों की जिम्मेदारी है वहीं कई महत्वपूर्ण विभाग और कार्य बाबूओं के कंधों पर है। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पदभार संभालते ही जिस तरह की आक्रामकता दिखाई, उससे नौकरशाहों में अनजाना-सा भय समा गया है। इसका परिणाम यह हुआ की केंद्र में पदस्थ नौकरशाह अपने राज्य की ओर रूख कर गए, वहीं केंद्र की बार-बार की मांग के बावजुद भी राज्य से आईएएस दिल्ली जाने को तैयार नहीं हो रहे हैं। ऐसे में मोदी ने सभी प्रमुख विभागों की निगरानी के लिए 'सुपर पीएमओÓ (पीएमओ में पदस्थ प्रधानमंत्री के पसंदीदा अफसरों की टीम यानी प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्रा, अजीत कुमार डोभाल, राजीव टोपनो, संजीव सिंगला, गुलजार नटराजन, बृजेश पांडेय, मयूर माहेश्वरी और श्रीकार केशव परदेसी ।)का गठन कर डाला। अब लगभग हर विभाग में 'सुपर पीएमओÓ का हस्तक्षेप बढ़ गया है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि जहां एक साल पहले तक दिल्ली में जो नौकरशाह अपने विभागों में बिना दबाव और बिना तनाव के कार्य कर रहे थे, अब उन्हें 'सुपर पीएमओÓ की निगरानी में काम करना पड़ रहा है। आलम यह है कि केंद्र में जितने अहम मंत्रालय हैं उनकी डोर 'सुपर पीएमओÓ ने अपने हाथ में ले रखी है। 'सुपर पीएमओÓ ने केंद्र सरकार में पदस्थ अफसरों की जो रिपोर्ट तैयार की है, उसमें मप्र के अफसरों को फिसड्डी बताया गया है।
मोदी की वर्किंग स्टाइल से डरे अफसर
केंद्र की अफसरशाही में अब प्रदेश के नौकरशाहों की 'रुचिÓ कम होने लगी है। इसे केंद्र सरकार का असर माना जाए या अफसरों की हिचकिचाहट लेकिन केंद्र में मप्र कॉडर के आईएएस अफसरों की आमद में कमी आने लगी है। गौरतलब है कि यूपीए सरकार के समय मप्र के अफसरों का केंद्र सरकार व महत्वपूर्ण मंत्रालयों में काफी दबदबा रहा है। एक समय यह संख्या 60 से ज्यादा थी इनमें सचिव स्तर के 11 अफसर थे। मप्र कॉडर की संख्या के मान से नियमानुनसार 84 आईएएस केंद्र में पदस्थ किए जा सकते हैं, लेकिन अमूमन राज्य सरकार इतने अफसर नहीं देती हैं। अभी केंद्र में मप्र के अफसरों की संख्या 33 है, क्योंकि दो अफसर मनोज गोविल आईएमएफ यूएसए में पदस्थ हैं व पल्लवी जैन गोविल लंबे अवकाश पर हैं। केंद्र सरकार में संयुक्त सचिव स्तर के अफसरों में मप्र की भूमिका महत्वपूर्ण है। इनमें आलोक श्रीवास्तव के पास पोत परिवहन, रश्मि शुक्ला शर्मा के पास पंचायती राज, अनिल श्रीवास्तव नागर विमानन, एम गोपाल रेेड्डी गृह, एसपीएस परिहार कैबिनेट सेक्रेटेरिएट, मनोज झालानी स्वास्थ्य, संजय बंदोपाध्याय सड़क परिवहन,शैलेंद्र सिंह उद्योग, प्रवीण गर्ग सामाजिक न्याय, अनुराग जैन पीएमओ, नीरज मंडलोई शहरी विकास मंत्रालय में हैं। जबकि निकुंज श्रीवास्तव व ई.रमेश कुमार केंद्रीय मंत्रियों के निज सचिव हैं। इनके अलावा केंद्र में प्रवेश शर्मा, राघवचंद्रा, विजया श्रीवास्तव, जयदीप गोविंद, पीके दास, पंकज राग, आशीष श्रीवास्तव, दीप्ति गौड़ मुखर्जी, अनिल जैन, अनिरूद्ध मुखर्जी, केरोलिन खोंगवार, मनीष सिंह, पवन शर्मा पदस्थ हैं। लेकिन 'सुपर पीएमओÓ के हस्तक्षेप के कारण ये अपनी छाप अपने विभाग में छोड़ पा रहे हैं।
मध्यप्रदेश आईएएस संवर्ग में 417 पद स्वीकृत हैं और इनमें से 325 अधिकारी ही पदस्थ हैं। यानी 92 पद अभी भी खाली है। दो सीनियर अधिकारी एसीएस देवराज बिरदी तथा पीएस स्तर के विश्वमोहन उपाध्याय 31 जनवरी को ही रिटायर हुए हैं। इस कारण भी संख्या घटी है। वैसे इस साल 21 आईएएस रिटायर होने जा रहे हैं, जिसमें बिरदी तथा उपाध्याय भी शामिल थे। एक समय पीएमओ कार्यालय में सचिव के रूप में आर रामानुजम, वित्त मंत्रालय में सुमित बोस सहित अन्य मंत्रालयों में सचिव के रूप में ओपी रावत, डीआरएस चौधरी, सुधीरनाथ, सुषमानाथ, अलका सिरोही, राघवेन्द्र सिरोही, अमिता शर्मा, जेमिनी शर्मा, विश्वपति त्रिवेदी आदि शामिल थे। केंद्र में मप्र के सचिव स्तर के अफसरों की कमी आने से भी मप्र के आईएएस का रुतबा लगातार भारत सरकार में घटता जा रहा है। मध्य प्रदेश कैडर के एक और आईएएस आर. रामानुजम को केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जवाबदारी मिल गई है। केन्द्रीय मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के मध्य प्रदेश कैडर के आर. रामानुजम की नियुक्ति प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रधानमंत्री के सचिव के पद पर की है। 1979 बैच के अधिकारी रामानुजम को एक अच्छे प्रशासक के रूप में जाना जाता है। प्रदेश में कई महत्वपूर्ण जवाबदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन करने वाले रामानुजम को मिली इस नई जिम्मेदारी से प्रदेश के आईएएस अधिकारियों में बहुत ही हर्ष है। इसे प्रदेश के हितों के लिए भी एक अच्छा संकेत कहा जा रहा है।
उधर, जब से केंद्र में मोदी की सरकार बनी है कोई भी अफसर केंद्र में जाने को तैयार नहीं हो रहा है। दरअसल, मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद ब्यूरोक्रेसी में बदलाव को सबसे बड़ा एजेंडा बनाया और इसपर काम भी हुए। इस प्रक्रिया में सख्त फैसले भी हुए। बीच रात में सीनियर अधिकारियों को हटाया गया। कुछ अफसरों को विदेश दौरे के समय उनके पद से हटा दिया गया। मोदी सरकार के टॉप लेवल के अफसरों को हटाने के फैसले की जगह उन्हें हटाए जाने के तरीके पर सवाल उठे। एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि महज अतिरिक्त उत्साह के कारण विदेश सचिव बदलने जैसा फैसला भी विवादों में आया। पूर्व विदेश सचिव सुजाता सिंह को भी हटाने के तरीके पर सवाल उठाए गए। हालांकि भले ही अधिकारियों को हटाने के तरीके पर विवाद हुए लेकिन इनकी जगह पर जिन अधिकारियों की नियुक्ति हुई, वे बेहतर पंसद साबित हुए। इससे विवाद कम हुआ। एक अधिकारी ने बताया कि अगर सरकार किसी को हटाकर उसकी जगह योग्य लोगों को बैठाती रहेगी, तब तब यह मामला तूल नहीं पकड़ेगा लेकिन जिस दिन इसके उलट हुआ, विवाद बढ़ जाएगा। पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी टीआरएस सुब्रहमण्यम का कहना है, 11 महीने के शासन में मोदी सरकार की खासियत रही है कि उन्होंने बड़े पदों पर जो नियुक्ति की है, उसमें योग्यता को विशेष तरजीह दी गई। साथ ही अफसरों के साथ अधिक पूर्वाग्रह कम दिखा। ऐसे में संभव है कि कुछ मिसाल संयोग रहे हो।
ये तो चंद उदाहरण हैं जो केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली को दर्शातें हैं। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केंद्र सरकार की कमान संभालते ही नौकरशाही उनकी रफ्तार के साथ कदम मिलाने की कोशिश में जुट गई। लेकिन उनसे कदम ताल मिलाने में कुछ नौकरशाह हांफने लगे तो कुछ कांपने। आलम यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम-काज को देख कर नौकरशाहों में खलबली मची हुई है। नौकरशाह मोदी के काम के प्रति जुनून से हतप्रभ है। मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद जिस तरह से अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श कर एजेंडा तैयार करने में जुटे रहे, उससे अधिकारी हैरत में है। मोदी के काम-काज के इस तरीके को देख काम करने वाले नौकरशाह उत्साहित हैं। हालांकि मोदी के काम-काज के तरीके से एक सकारात्मक बदलाव भी दिख रहा रहा है। मोदी ने अपने मंत्रियों से भी 16 से 17 घंटा काम करने की बात कही है और मंत्री ऐसा कर भी रहे हैं। मंत्रियों की देखा देखी अफसर भी काम में लगे रहते हैं।
'सुपर पीएमओÓ का बढ़ता दबदबा
लोकप्रियता के शिखर पर सवार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शासन चलाने का तरीका संभवत: अलग है। पीएमओ के बाद केंद्रीय कैबिनेट में गृह, वित्त, रक्षा और विदेश मंत्रालयों को सबसे ताकतवर माना जाता है, लेकिन मोदी के 'सुपर पीएमओÓ के जरिए इन मंत्रालयों के कामकाज में पर्दे के पीछे से हस्तक्षेप ने फैसले लेने की गति धीमी कर दी है। पीएम मोदी के करीबी माने जाने वाले अरुण जेटली का वित्त मंत्रालय गुजरात कैडर के अधिकारियों से भरा हुआ है, जिससे लगता है कि मोदी ने जेटली की घेरेबंदी कर दी है। ऐसे में अन्य राज्यों से आए अफसर काम करने में असहज महसूस कर रहे हैं। ऐसी ही स्थिति अन्य विभागों की भी है। मप्र कैडर के अफसर पीडी मीणा को मोदी सरकार ने रक्षा मंत्रालय में भेजा, लेकिन उन्हें भूतपूर्व कर्मचारी कल्याण का काम मिला। जहां ऐसा करने को कुछ नहीं है जो मीणा की कार्य क्षमता को प्रदर्शित कर सके। मप्र में मुख्यसचिव स्तर के एक अफसर ने बताया कि दिल्ली के बजाए फिलहाल मप्र में काम करना बेहतर है। माना जा रहा है कि मोदी सरकार के कामकाज और इसे लेकर अक्सर होने वाली चर्चाओं के चलते अफसरों में दिल्ली आने को लेकर हिचक है। वहीं मप्र सरकार भी अफसरों की कमी के चलते अफसरों को अनुमति देने से बच रही है। स्थितियां यही रही तो जल्द ही केंद्र में सचिव स्तर के मप्र के अफसरों की संख्या दो रह जाएगी,क्योंकि सचिव सीमा प्रबंधन(गृह)स्नेहलता कुमार रिटायर हो गई हैं और सचिव सूचना प्रसारण बिमल जुल्का अगस्त में सेवानिवृत्त हो रहे हैं।
कुछ ऐसी ही स्थिति अन्य अहम मंत्रालयों की हैं। 'सुपर पीएमओÓ के मंत्रालयों पर नियंत्रण करने की कवायद पिछले साल नवंबर में मोदी के भरोसेमंद गुजरात कैडर के अधिकारी हसमुख अधिया की वित्त मंत्रालय में वित्तीय सेवा विभाग के सचिव के रूप में नियुक्ति से शुरू हुई। अधिया भारतीय प्रबंधन संस्थान के गोल्ड मेडलिस्ट हैं और उन्होंने योग में भी पीएचडी की है। मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के पसंदीदा 1985 बैच के आईएएस गिरीश चंद्र मूर्मू को वित्त मंत्रालय में व्यय विभाग का संयुक्त सचिव नियुक्त किया गया है। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उन्हें प्रवर्तन निदेशालय का निदेशक बनाने की तैयारी चल रही है। यह पद लंबे समय से खाली है। कुछ ही दिन पहले 1987 बैच के वरिष्ठ आईएएस राज कुमार को भी वित्त मंत्रालय में आर्थिक मामलों का संयुक्त सचिव नियुक्त किया गया। यह सब नियुक्तियां बड़े मंत्रालयों पर 'सुपर पीएमओÓ का दबदबा कायम करने के लिए किया गया है।
कई फैसलों में 'सुपर पीएमओÓ के हस्तक्षेप
जैसा कि सभी जानते हैं नरेंद्र मोदी का काम करने का तरीका संभवत: अलग है। मोदी ने 'सुपर पीएमओÓ के जरिए इन मंत्रालयों के कामकाज में पर्दे के पीछे से हस्तक्षेप ने फैसले लेने की गति धीमी कर दी है। मंत्रालय के अधिकारियों की जानकारी के बगैर इसमें कई अहम बदलाव कर दिए गए। कई अधिकारियों का कहना है कि अन्य मंत्रालयों में पीएमओ का इसी तरह का हस्तक्षेप सामान्य बात है। यही कारण है कि मोदी सरकार के सत्ता संभालने के 11 माह से अधिक होने के बावजूद अभी तक दिल्ली की नौकरशाही उनके कामकाज के तरीकों से सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाई है और मेक इन इंडिया अभियान सहित कई अहम परियोजनाएं अनिश्चय की स्थिति में हैं या फिर उनमें संतोषजनक प्रगति नहीं हुई है। पीएमओ की कार्यप्रणाली को अच्छी तरह जानने वाले एक आईएएस कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उन्हीं मंत्रियों और अफसरों की पट रही है जिनकी बुलेट ट्रेन रफ्तार वाली कार्यशैली है। लेकिन आलम यह है कि अधिकांश मंत्री बैलगाड़ी मिजाज वाले साबित हो रहे हैं। मंत्रियों की रफ्तार धीमी होने का खामियाजा अफसरों को भूगतना पड़ रहा है। उन विभागों के अफसर मोदी की पाठशाला में पास हो गए हैं जिने विभाग के मंत्री अपनी तरफ से पीएमओ में प्रस्ताव, नोट ले कर पहुंचते हैं। ये नरेंद्र मोदी के कहे आईडिया को लपकते हैं और तुरत फुररत प्रस्ताव बना कर पीएमओ को भेज देते हैं। इससे फैसले भी होते हैं और काम भी। एक और पेंच है। जो मंत्री ई मेल, ई-गर्वनेश को अपना रहे हैं वे पीएमओ से फटाफट काम करवा ले रहे हैं। जानकर आश्चर्य होगा कि मोदी के पीएमओ की कार्यसंस्कृति से बुनियादी परिवर्तन हुए हैं। ई-मेल, ई-गवर्नेश में प्रधानमंत्री निवास और पीएमओ दोनों धड़ल्ले से काम कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी ई-मेल पर प्रस्ताव, नोट, ड्राफ्ट लेने-देने और उसी पर तुरंत मंजूरी का रिकार्ड बना रहे हैं। यदि मंत्री और उनके अफसरों ने ई-मेल से नोट, प्रस्ताव, मसला भेजा तो पीएमओ से तुरंत रिस्पोंस होगा। तुरंत काम होगा। और फाइलों के अंदाज में यदि मंत्रालयों से प्रस्ताव, नोट और मसले आए तो उनमें देरी मुमकिन है। इस हकीकत में अपने लिए हैरानी वाली बात यह है कि पुराने आला अफसर यानि पीएमओ के प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्र, एके मिश्रा आदि कैसे ई-मेल, ई-गवर्नेंश में रम पा रहे होंगे
पीएमओ पर मंत्रालयों की निर्भरता!
केंद्र में पदस्थ बिहार कैडर के एक आईएएस कहते हैं कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री कार्यालय की गरिमा और उसकी खोई हुई ताकत लौटाई है। पिछली सरकार में कई सत्ता केंद्रों में से एक सत्ता केंद्र पीएमओ भी था, लेकिन आज यह इकलौता सत्ता केंद्र है। केंद्र सरकार के कामकाज की केंद्रीय कमान प्रधानमंत्री कार्यालय में होनी चाहिए, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। यह कमान सिर्फ निर्देश देने और निगरानी करने तक हो तो बेहतर है। लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार के मंत्री अपने हर काम के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय के भरोसे बैठे हैं। वे पीएमओ का मुंह ताकते हैं। फैसले करने से हिचक रहे हैं। और तभी मंत्रालयों के मामूली फैसलों की फाइलें प्रधानमंत्री के पास जा रही हैं। मंत्री पीएमओ का मुंह देख रहे हैं कि वहां से कोई निर्देश आए तो वे आगे बढ़ें। कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके दफ्तर ने अपने कंधों पर इतना बोझ ले लिया हैं जिससे अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है मप्र कैडर के एक आईएएस कहते हैं कि संदेह नहीं है कि नरेंद्र मोदी और उनके दफ्तर ने देश-दुनिया की तमाम चिंताओं का बोझ लिया हैं। सबका साथ, सबका विकास के साथ सबका काम खुद करने का भी पीएमओ का अंदाज हैं। जाहिर है कई मंत्री बात-बात के लिए पीएमओ की तरफ देखते हैं। पीएमओ पहल करे और कहे तो बात आगे बढ़ेगी। ऐसे में विभिन्न विभागों की कमान संभाल रहे नौकरशाह भी पंगू बने हुए हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि कई विभागों में तो काम ही नहीं हो रहा है। मंत्रियों के पीएमओ पर निर्भर होने का एक नतीजा यह हुआ है कि प्रधानमंत्री कार्यालय पर बहुत ज्यादा बोझ बढ़ गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी रूचि से बुनियादी ढांचे के विकास, आर्थिक महत्व के मसलों और विदेशी मामलों में लगे रहते हैं। उन्होंने अपने आप को कूटनीति और उसके जरिए देश की अर्थव्यवस्था में जान फंूकने के काम में लगाया है। लेकिन इनके अलावा छोटे-छोटे मसलों की भी उनके पास भरमार हो गई है। वेहर महीने बुनियादी ढांचे से जुड़े मंत्रालयों की बैठक कर रहे हैं और समीक्षा कर रहे हैं। गंगा की सफाई पर वे बैठक कर रहे हैं। यहां तक की खेल से जुड़े मामूली फैसलों की फाइल भी उनके पास जा रही है। ऐसे में इन विभागों के मंत्रियों औश्र अफसरों के पास अपने स्तर पर काम करने के लिए कुछ भी नहीं है।
खेमों में बंटने लगे हैं ब्यूरोक्रेट्स !
जैसे-जैसे केंद्र में गुजरात कैडर के आईएएस का रूतबा बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे ब्यूरोक्रेसी क्षेत्रीय और जातीय खेमों में बंटती जा रही है। सरकार के हिसाब से ही अफसर भी आते-जाते रहते हैं। यूपीए सरकार में यूपी, बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान और मप्र के अफसरों का बोलबाला था वहीं मोदी सरकार में हर जगह गुतरात कैडर के अफसरों का रूतबा बढ़ता जा रहा है। केंद्र में पदस्थ मप्र कैडर के एक आईपीएस का दावा है कि केंद्र में हमेशा से कायस्थ लॉबी, बनिया लॉबी और ब्राह्मण लॉबी प्रभावशाली बनी रहती है। जिन अफसरों के कामकाज की तारीफ होती भी है तो वह उनके काम की मेरिट से ज्यादा किसी और वजह से होती है। वह कहते हैं कि जो आईएएस अफसर मंत्रियों के करीबी रहते हैं, उन्हें मनचाही पोस्टिंग मिलती रहती है। यहां तक कि रिटायरमेंट के बाद भी इन अफसरों की सेवा बढ़ती रहती है। इसके अलावा उन अफसरों को भी मलाईदार पोस्टिंग मिलती है जो पैसा खर्च कर सकते हैं। रिटायर्ड आईएएस प्रोमिला शंकर ने अपनी किताब 'गॉड ऑफ करप्शनÓ में ब्यूरोक्रेसी में तो जातीयता पर भी सवाल भी खड़े किए हैं।
सिविल सर्विसेज बोर्ड बनाने की मांग
राजनीतिक हस्तक्षेप से बार-बार तबादलों से अजीज आ चुके अफसरों ने प्रदेश में सिविल सर्विसेज बोर्ड बनाने की मांग तेज कर दी है। इसकी सबसे पहले अवाज राजस्थान कैडर के अफसरों ने उठाई है। राजस्थान कैडर के आईएएस समित शर्मा ने सिविल सेवा के अफसरों के ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए सिविल सर्वे बोर्ड बनाने की मांग की। शर्मा ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट फैसला दे चुका है कि सिविल सेवा अफसरों के ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए सिविल सर्विसेज बोर्ड होगा। उन्होंनेे राजनीतिक आधार पर तबादलों पर सवाल उठाते हुए सिविल सेवा अफसरों का कार्यकाल तय करने की मांग उठाई। आईएएस कुंजीलाल मीणा ने दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय सिविल सर्विसेज डे में राजस्थन से किसी अफसर की एंट्री नहीं भेजने का मामला उठाया।
विदेशों में जम गए आईएएस की होगी छुट्टी
अब उन आईएएस अफसरों की खैर नहीं है जो विदेश दौरे पर गए लेकिन लौट कर नहीं आए। मोदी सरकार अब ऐसे अफसरों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर रही है। कुछ आईएएस सरकारी नौकरियों में डेप्युटेशन पर विदेश गए और वहां करोड़ों के पैकेज पाकर दूसरी नौकरियों में जम गए। उन्हें इतनी भी फुरसत नहीं मिल सकी कि वह नौकरी छोडऩे की औपचारिकता निभा सके। डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल ऐंड ट्रेनिंग के अनुसार इस तरह के मिसिंग आईएएस की संख्या लगभग 20 है। ये ऐसे आईएएस है, जो सरकारी नौकरियों में डेप्युटेशन पर विदेश गए, लेकिन न तो निश्चित समय में लौटे और न ही कोई सूचना दी। सरकार अब उन्हें नौकरी से बर्खास्त करने की तैयारी कर रही है। एक ऐसे ही आईएएस प्रशांत को सरकार ने हटा दिया। सरकार ने उन्हें हटाने का औपचारिकता आदेश जारी कर दिया। 1988 बैच के बिहार के प्रशांत पश्चिम बंगाल कॉडर के आईएएस थे। इन्हें 2009 में मिनिस्ट्री ऑफ पेट्रोलियम की ओर से वॉशिंगटन में डेप्युटेशन पर भेजा गया था। वहां से उन्हें एक साल बाद लौटना था, लेकिन सूत्रों के अनुसार उन्होंने वहां एक बड़ी मल्टिनेशनल कंपनी में बड़े पैकेज पर नौकरी पकड़ ली। सरकार ने उन्हें कई बार तलाशने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं मिले। इसके बाद सरकार ने उन्हें मिसिंग आईएएस के लिस्ट में शामिल कर दिया और अंतत: हटा दिया।
आईएएस नियुक्ति के बाद कितना कमाया बताना होगा
अखिल भारतीय सेवा के प्रत्येक अफसर को अब अचल संपत्ति ही नहीं, बल्कि अब चल संपत्ति का भी लेखा-जोखा हर वर्ष सरकार को प्रस्तुत करना होगा। खासकर आईएएस, आईपीएस तथा आईएफएस की नियुक्ति के समय उसके नाम पर कितनी संपत्ति थी और आज वह बढ़कर कितनी हो गई है। पत्नी, पुत्र-पुत्री और आश्रितों के नाम पर कितनी संपत्ति है, उनके नाम पर बैंक में कितना पैसा जमा है, जमीन, बीमा पालिसी, बैंक में जमा बॉंड, वाहन मकान आदि का ब्यौरा भी अब बताना होगा। 31 मार्च तक लेखा-जोखा केंद्र सरकार ने लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम के तहत अफसरों को हर वर्ष पहली जनवरी की स्थिति में इसका लेखा-जोखा देना होगा। जीएडी ने इस मामले में अफसरों से 31 जुलाई तक उक्त प्रावधानों के तहत जानकारी मांगी है। केंद्रीय कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन मंत्रालय ने प्रत्येक लोक सेवक, यथास्थिति, लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 की धारा 44 की उपधारा (2)या उपधारा (3)के अधीन अपनी आस्तियों और दायित्वों की घोषणा करेगा। प्रत्येक लोक सेवक उस वर्ष की 31 जुलाई को या उसके पूर्व लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियमों के अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी को प्रत्येक वर्ष के 31 मार्च को अपनी संपत्ति के विषय में घोषणा, सूचना या विवरणी फाइल करेगा। इन अधिनियमों में 26 दिसंबर 2014 को प्ररूप 2 एवं 4 में आंशिक संशोधन भी किए गए है। तीनों अखिल भारतीय सेवा के अफसरों को अपनी संपत्ति के बारे में जानकारी हिंदी और अंग्रेजी दोनों में से किसी एक भाषा में देना होगा। इस मामले में सामान्य प्रशासन विभाग ने प्रदेश के सभी आईएएस अफसरों से 31 जुलाई तक जानकारी मांगी है।
मप्र में मंत्रियों से पटरी न बैठाने वाले हटाए गए
इधर मप्र शासन ने मंत्रियों से पटरी न बैठाने वाले अफसरों को हटाने का सिलसिला शुरू कर दिया है। जिसके तहत पहली गाज प्रमुख सचिव स्वास्थ्य प्रवीर कृष्ण पर गिरी है। उन्हें हेल्थ से हटाकर ग्रामोद्योग विभाग भेज दिया गया है। लोक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री नरोत्तम मिश्रा को बड़ी राहत मिली है। लंबे समय से वे अपने विभाग के प्रमुख सचिव प्रवीर कृष्ण को हटाने जद्दोजहद कर रहे थे। अंतत: उन्हें भारी भरकम विभाग से हटाकर लूप लाइन में डाल दिया गया है। इस प्रशासनिक फेरबदल में राज्य सरकार ने कई दिग्गज आईएएस के पर कतरे हैं तो कई नए आईएएस अफसरों को भारी भरकम पद से नवाजा गया है। मुख्यमंत्री के विश्वस्त अफसरों में शुमार विवेक अग्रवाल को कमिश्नर नगरीय प्रशासन विभाग बनाया गया है। सिंहस्थ से ठीक पहले हुए इस बदलाव को राजनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि सिंहस्थ के कामकाज में पिछडऩे के चलते ही सीएम ने अपनी पसंद के अफसरों को बिठाया है। हाल ही में उन्हें एमपीआरडीसी के एमडी पद से रातों रात हटाए गया था, जिसे लेकर ब्यूरोक्रेसी में खासी चर्चा रही थी। अपर मुख्य सचिव राकेश अग्रवाल को अपने ही विभाग के डायरेक्टर और आईएफएस अफसर एसडी पटैरिया से विवाद के चलते पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यक विभाग में पदस्थ किया गया है। एक दिन पहले ही आईएफएस पटैरिया को भी रेशम संचालक के पद से हटाया जा चुका है। इधर स्वास्थ्य जैसे बड़े महकमे की जिम्मेदारी हाल ही में दिल्ली से लौटी ऊर्जा विकास निगम की एमडी गौरी सिंह को सौंपी गई है। हाल ही में दिल्ली से लौटे प्रमुख सचिव मलय श्रीवास्तव को भी बेहतर पदस्थापना देते हुए पहले परिवहन जैसा विभाग सौंपा गया था। अब नगरीय विकास एवं पर्यावरण विभाग की बागडोर सौंपी गई है। सिंहस्थ से ठीक पहले श्रीवास्तव को नगरीय विकास की जिम्मेदारी देने के पीछे मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव इकबालसिंह की फिल्डिंग को अहम माना जा रहा है। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के खास नगरीय प्रशासन आयुक्त को भोपाल से रवाना कर जबलपुर भेज दिया गया है। संजय शुक्ला को पावर मैनेजमेंट कंपनी में एमडी बनाया गया है। शुक्ला को इससे भी बेहतर पोस्टिंग की उम्मीद थी। इसी प्रकार अपर मुख्य सचिव एसआर मोहंती से दो बड़े महकमों के अतिरिक्त प्रभार छीन कर अन्य को दिए गए हैं। राजेश प्रसाद मिश्रा को फिर मुख्यमंत्री तीर्थ योजना और संस्कृति विभाग की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई है। उल्लेखनीय है कि इस योजना शुरुआत उन्होंने ही की थी।
मप्र के 22,000 गांवों में सूखे की आहट
48 फीसदी कुओं में भूजल स्तर गिरा
ओलावृष्टि-बेमौसम बारिश के बाद सूखा कहर बरपाने को तैयार
गांवों में पानी के लिए सरकार ने बनाया 2,000 करोड़ का प्लान
विनोद उपाध्याय
भोपाल। पिछले साल देश के कई हिस्सों में पड़े सूखे और इस साल मार्च में हुई बेमौसम बारिश के बाद अब प्रदेश में सूखे के आसार निर्मित होने लगे हैं। प्रदेश के 48 फीसदी कुओं का भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। इस कारण करीब 22,000 गांवों में सूखे की संभावना बढ़ गई है। सूखे की संभावना को देखते हुए पीएचई विभाग ने प्रदेश के 15,000 गांवों में पानी पहुंचाने के लिए 2,000 करोड़ का प्लान बनाया है।
मप्र स्टेट ग्राउंड वॉटर सर्वे डिपार्टमेंट के अनुसार, लगातार दोहन के कारण प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में दिनों दिन भूजल स्तर गिर रहा है। जैसे-जैसे पारा ऊपर चढ़ रहा है। वैसे ही भूजल स्तर तेजी से पालात की ओर जाने लगा है। इस साल अभी तक कुछ जिलों में जलस्तर 45 से 62 मीटर तक नीचे खिसक चुका है। भूजल स्तर इसी तेजी से गिरता रहा तो गर्मी के मई-जून माह में लोगों को गंभीर पेयजल संकट से जूझना पड़ सकता है। जिन जिलों में तेजी से भूजल स्तर गिर रहा है उनमें रीवा, सतना, सीधी, सिंगरौली, शहडोल, अनूपपुर, उमरिया, डिंडौरी, जबलपुर, कटनी, छिंदवाड़ा, बालाघाट, नरसिंहपुर, मंडला, सागर, पन्ना, टीकमगढ, छतरपुर, रायसेन, विदिशा, दमोह, सिहोर, ग्वालियर, गुना, अशोकनगर, शिवपुरी, दतिया, भिंड, मुरैना, श्योपुर, इंदौर, धार, मंदसौर, उज्जैन शाजापुर, देवास, रतलाम, खंडवा, बुरहानपुर, बडवानी, झाबुआ और अलीराजपुर जिले हैं। ये जिले इस बार सूखे की चपेट में आ सकते हैं। भूजल स्तर की पहली लेयर 35 मीटर की होती है। जिसका पानी अब खत्म हो चुका है। वर्तमान में 70 मीटर वाली दूसरी लेयर का पानी हैंडपंपों और नलकूपों के माध्यम से मिल रहा है। गर्मी के दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को पेयजल संकट का समाना करना पड़ सकता है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की ताजा रिपोर्ट ने मध्यप्रदेश सहित सभी राज्यों की भूजल का गिरता स्तर ने सबको अवाक कर दिया है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के अनुसार मध्यप्रदेश के 1031 विशेषित कुओं में से 555 (48 प्रतिशत कुओं में भूजल का स्तर गिरा है। चौकाने वाले रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि 2.13 मीटर प्रति वर्ष की दर से सूबे के कुओं में भूजल का स्तर में गिरावट हो रहा है।
46 हजार जल स्त्रोत सूखे
केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के अनुसार,प्रदेश में जल संकट गंभीर रूप ले चुका है क्योंकि यहां भू जल स्तर 35 से 50 मीटर नीचे तक चला गया है। हाल यह है कि प्रदेश के 46,689 जल स्त्रोत सूख गए हैं। सबसे ज्यादा जल स्तर 50 मीटर सीहार जिले में नीचे गया है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में 46,689 जल स्त्रोत सूख चुके हैं। इनमें 46094 हैंडपंप और 595 लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के कुएं भी शामिल हैं। भिंड जिले को छोड़कर प्रदेश का एक भी जिला ऐसा नहीं है जहां जल स्त्रोत न सूखे हों। इंदौर का जल स्त्रोत सूखने के मामले में सबसे बुरा हाल है जहां 3662 हैंडपंपों ने पानी देना बंद कर दिया है। इसी तरह उज्जैन में 3113, रतलाम में 3091, देवास में 3038 जल स्त्रोत सूख गए हैं। केंद्रीय जल संसाधन विभाग के भू जल बोर्ड द्वारा तैयार किए गए आंकड़ों के आधार पर प्रदेश में टीकमगढ़ को छोड़कर हर जिले में भूजल स्तर नीचे चला गया है और भिंड के अलावा सभी जिलों में जल स्त्रोत सूखे हैं। उधर,मप्र में जमीन के भीतर का पानी और नीचे पहुंचने से सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। मप्र स्टेट ग्राउंड वॉटर सर्वे डिपार्टमेंट के अनुसार, इस बार सूखे का असर सबसे ज्यादा मालवा अंचल के जिलों पर पड़ेगा। विभाग की इस रिपोर्ट से प्रदेश में जहां सूखे की आशंका बढ़ गई है। वहीं सरकारी महकमे में इस बात पर चर्चा भी तेज हो गई है कि ऐसे में भूजल दोहन को कैसे रोका जाए। ओवर एक्साप्लाटेड एरिया (सबसे ज्यादा प्रभावित) में इंदौर, उज्जैन और ग्वालियर संभाग के जिले शामिल हैं। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है, इन संभागों के रहवासियों की भूजल पर निर्भरता अधिक है। अधिकारियों की माने तो इन जिलों में अन्य जल स्त्रोतों के उपयोग को बढ़ाने के भी सुझाव विभाग ने दिए हैं। इस रिपोर्ट के जारी होने के बाद पानी को लेकर सरकार की मुश्किलें और बढ़ती दिखाई दे रही है। मालवा में बीते पांच सालों से गिरते जल स्तर को देखते हुए विभाग ने भीषण सूखे की आंशका जाहिर की है।
मप्र स्टेट ग्राउंड वॉटर सर्वे डिपार्टमेंट के अनुसार प्रदेश के दस जिलों के 24 ब्लॉकों को ओवर एक्सप्लावटेड एरिया घोषित किया गया है। अर्थात यहां भूजल का दोहन अत्यधिक खतरनाक स्तर को भी पार कर गया है। इसके अलावा चार ब्लॉकों को क्रिटिकल घोषित किया गया है। जबकि वर्ष 2009 की तुलना में सेमी क्रिटिकल ब्लॉकों की संख्या में 6 का इजाफा हो गया है। वर्तमान में प्रदेश में सेमी क्रिटिकल ब्लॉकों की संख्या 61 से बढ़कर 67 पहुंच गई है। भूजल स्तर की सबसे खराब स्थिति मालवा क्षेत्र की आंकी गई है। ओवर एक्सप्लावटेड एरिया में मालवां क्षेत्र के 22 ब्लॉक शामिल है। प्रभावित जिलों में इंदौर, देवास, धार, मंदसौर रतलाम, सीहोर, शाजापुर, बड़वानी के साथ उज्जैन नाम आता है।
48 फीसदी कुओं में भूजल स्तर गिरा
प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों के उपलब्धता में मनुष्य की छेड़छाड़ ने भयावह स्थिति खड़ा कर दिया है। एक ओर हवा के झोके जहरीली होती जा रही है तो दूसरी ओर प्रकृति की अनमोल संसाधन भूजल का स्तर भी तेजी से गिरता जा रहा है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की ताजा रिपोर्ट ने मध्यप्रदेश सहित सभी राज्यों की भूजल का गिरता स्तर ने सबको अवाक कर दिया है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के अनुसार मध्यप्रदेश के 1031 विशेषित कुओं में से 555 (48 प्रतिशत कुओं में भूजल का स्तर गिरा है। चौकाने वाले रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि 2.13 मीटर प्रति वर्ष की दर से सूबे के कुओं में भूजल का स्तर में गिरावट हो रहा है। हालांकि सबसे अधिक राजस्थान के 877 कुओं में से 521 कुओं में 3.96 मीटर प्रति वर्ष की दर से गिरावट देखा गया है जबकि तमिलनाडू के 736 कुओं में से 363 कुओं में 3.14 मीटर प्रति वर्ष की दर से गिरावट देखी गयी है। दिल्ली (85 प्रतिशत), आंध्रप्रदेश (74), चंडीगढ़ (71), झारखंड (73), हिमाचल प्रदेश(68), पश्चिम बंगाल (66) प्रतिशत कुओं में गिरावट देखी गयी है। हालांकि केंद्र सरकार विभिन्न स्कीमों के माध्यम से तकनीकी एवं वित्त्तीय सहायता देकर जल संसाधन में संवर्धन, संरक्षण एवं प्रभावी प्रबंधन के लिए राज्य सरकारों के प्रयासों में सहयोग देकर देश में जल संरक्षण के उपायों को प्रोत्साहित करती है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड ने भूजल के कृत्रिम पुनर्भरण के लिए एक मास्टर योजना तैयार की है।
करोड़ों खर्च, नहीं बढ़ा जल स्तर
मध्यप्रदेश सरकार ने भू जल स्तर को बढ़ाने के लिए करोड़ों रूपए की लागत से भू-जल स्तर को बढ़ाने के लिए वाटर सेट योजना ग्रामीण क्षेत्रों में लागू की थी। जिसके तहत हरियाली परियोजना के नाम से इस योजना को ग्रामीण क्षेत्र में लागू किया गया। जिसमें उन स्थानों का चयन किया गया था। जिन किसानों के खेतों में सिंचाई के साधन नहीं है उन स्थानों का भू-जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। हरियाली परियोजना में जल स्तर ऊपर लाने के लिए छोटे-छोटे चेक डेम एंव नदी, नालों पर स्टाप डेम बनाकर पानी को रोका जाने का काम किया जाता है। पांच वर्ष में भूमि का जल स्तर ऊपर उठाने के लिए हरियाली परियोजना के माध्यम से करोड़ों रूपए खर्च किए जा चुके है। लेकिन जल स्तर नहीं बढ़ सका। हरियाली परियोजना ने किए जल स्तर बढ़ाने के सारे कार्य मात्र एक औपचारिकता बनकर रह गए है। जिन नालों पर चेक डेम और स्टाप डेमों का निर्माण किया गया। उन डेमो में विगत पांच वर्षो से पानी रूका ही नहीं है क्योंकि इन डेमों में पानी रोकने वाले गेटों को लगाया ही नहीं गया। इसके कारण सारा पानी व्यर्थ बहजाता है। जिससे लाखों की लागत से बने स्टाप डेमों का फायदा किसानों को नहीं मिल पा रहा है।
कारगर साबित नहीं हुई योजना
अभी तक जिन जिलों में यह योजना संचालित की गई है, वहां के अनुभव कड़वे साबित हुए हैं। प्रदेश में नल-जल योजना संधारण, रखरखाव की कमी के चलते फेल हुई है। वहीं ग्राम पंचायतों की उदासीनता भी सामने आई है। जिन ग्राम पंचायतों में यह योजना संचालित की गई थी, वहां समय पर विद्युत बिलों के भुगतान नहीं होने के कारण ये बंद हो गई। जबकि कई जगह अधिकारियों की साठ-गांठ से योजना में हुए भारी भ्रष्टाचार के कारण योजना फ्लॉप हुई है। राज्य सरकार ने इन सभी खामियों को देखते हुए योजना में बदलाव करने का निर्णय लिया है। इसके अंतर्गत योजना की जिम्मेदारी ठेकेदारों को दी जाएगी। वह 20 वर्ष तक इसके संधारण की जिम्मेदारी भी उठाएंगे, जिससे योजना दूरगामी बनी रहे। इसमें अहम रोल ग्राम पंचायतों का भी होगा। ग्राम पंचायतों में योजना के संचालन के लिए पेय जल समिति का गठन किया जाएगा। यह समिति ग्राम के लोगों से तय की गई पेयजल की राशि एकत्र कर बिल के रूप में जमा करेगी।
बांधों में कैद हुआ पानी
मप्र में हर साल गर्मी में गहराते जल संकट के पीछे नदियों पर बनने वाले बांध और डैम हैं। नर्मदा, सोन, सिन्ध, चम्बल, बेतवा, केन, धसान, तवा, ताप्ती, शिप्रा, काली सिंध आदि नदियों का पानी मैदानी इलाकों में पहुंचने की बजाय बांध और डैम में कैद होकर रह जाता है। एक अनुमान के अनुसार बाणसागर, मणीखेड़ा, कोलार, केरवा, बरगी, तवा, संजय सरोवर, इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर,सरदार सरोवर, बरना, भीमगढ़, गांधीसागर, हलाली, हरसी बांध, महेश्वर, राजघाट, तिघरा आदि बांध और डैम ऐसे हैं जिनमें मप्र का एक तिहाई पानी कैद रहता है। बरसात में तो ये सब लबालब हो जाते हैं, लेकिन गर्मी में इनका पानी एक सीमित क्षेत्र में ही जमा रहता है। जिसके कारण नदियों के माध्यम से मैदानी इलाकों में पानी पहुंच नहीं पाता है और वहां जल स्तर दिन पर दिन नीचे सरकता जा रहा है।
2,000 करोड़ की योजना
हर साल गर्मियों में सूखे की कगार पर पहुंचने वाले गांवों में पानी की समस्या दूर करने के लिए सरकार ने खाका तैयार किया है। इसके तहत प्रदेश के पंद्रह हजार से अधिक गांवों में सरकार ने अब नलों के जरिए पानी पहुंचाने की तैयारी शुरू कर दी है। नल-जल योजना के सालों से लंबित पड़े प्रोजेक्ट को नाबार्ड का सहारा मिल गया है। नाबार्ड से मिले दो हजार करोड़ से इन गांवों में नलों के जरिए पानी पहुंचाया जाएगा। योजना पर इसी महीने से काम शुरू कर देने की तैयारी की जा रही है। गौरतलब है कि राज्य सरकार के निर्देश पर पीएचई महकमें ने गांवों में पानी पहुंचाने के लिये ढाई हजार करोड़ का प्रोजेक्ट तैयार किया था, अब सरकार के पास पैसा नहीं होने से यह परवान नहीं चढ़ सका। इसके बाद राज्य सरकार ने केन्द्र को यह प्रोजेक्ट भेजकर उससे मदद की मांग की पर केन्द्र से भी इसके लिये राशि नहीं मिल सकी। अब नाबार्ड ने इसके लिये राज्य सरकार को दो करोड़ रूपए मुहैया कराए हैं। इस पैसे से गांवों में साफ पानी पहुंचाने की व्यवस्था की जाएगी।
पीएचई विभाग ने नलकूप खनन कर पाईप लाइन बिछाने का काम करेगा। विभाग का मानना है कि नदियों से पानी लाकर उसे गांवो में वितरित करने में सफाई के लिये ट्रीटमेंट प्लान की जरूरत पड़ती पर विभाग ने तय किया है कि गांवों में नलकूपों का खनन कर उसके जरिये गांवों में पानी पहुंचाया जाएगा। इसमें गांवों तक पाईप लाइन बिछाने का काम पीएचई विभाग करेगा। इसके बाद घर तक नल कलेक्शन देने का काम पंचायतों को दिया जाएगा। पंचायतें एक नल कनेक्शन देने के लिये पांच सौ रूपए का शुल्क वसूलेंगी और प्रतिमाह उपभोक्ता से साठ रूपए महीने जलकर लिया जाएगा। जिस कंपनी को पाईप लाइन बिछाने का ठेका दिया जाएगा। उससे दस साल तक मेंटीनेंस करने का भी अनुबंध किए जाने का निर्णय लिया गया है।
विभाग का मानना है कि नदियों से पानी लाकर उसे गांवो में वितरित करने में सफाई के लिये ट्रीटमेंट प्लान की जरूरत पड़ती पर विभाग ने तय किया है कि गांवों में नलकूपों का खनन कर उसके जरिये गांवों में पानी पहुंचाया जाएगा। इसमें गांवों तक पाईप लाइन बिछाने का काम पीएचई विभाग करेगा। इसके बाद घर तक नल कलेक्शन देने का काम पंचायतों को दिया जाएगा। पंचायतें एक नल कनेक्शन देने के लिये पांच सौ रूपए का शुल्क वसूलेंगी और प्रतिमाह उपभोक्ता से साठ रूपए महीने जलकर लिया जाएगा। जिस कंपनी को पाईप लाइन बिछाने का ठेका दिया जाएगा। उससे मेंटीनेंस करने का भी अनुबंध किए जाने का निर्णय लिया गया है।
नल-जल योजना 20 साल के ठेके पर देगी सरकार
मुख्यमंत्री ने योजना को नए तरीके से बेहतर प्रबंधन के जरिए संचालित करने के लिए पीएचई विभाग से प्रस्ताव तैयार कराया है। इसके लिए शासन स्तर पर नए सिरे से नीति तैयार की गई है। इसमें यह प्रावधान किया गया है कि अब योजना में निर्माण कार्य पीएचई द्वारा नहीं, बल्कि निजी एजेंसियों द्वारा कराया जाएगा, जिन्हें निर्माण के बाद योजना के संधारण और रख-रखाव की जिम्मेदारी 20 साल तक उठाना पडेगी। जबकि योजना के ग्राम पंचायत स्तर पर आरंभ होने के बाद उसके संचालन की व्यवस्था यहां की पेयजल समिति करेगी। योजना के लिए नाबार्ड से दो हजार करोड़ की राशि मंजूर हुई है। इससे योजना की शुरुआत की जाएगी। प्रदेश में 14 हजार नल-जल योजनाएं संचालित की जा रही हैं। जबकि करीब डेढ़ हजार नल-जल योजनाएं बंद पड़ी हैं।
जलसंकट की आहट, सूखा राहत प्रकोष्ठ बना
कम बारिश के बाद पेयजल संकट की संभावित आहट के चलते लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने अभी से सूखा राहत प्रकोष्ठ बना लिया है। विभाग इस प्रकोष्ठ का व्यापक प्रचार-प्रसार करेगा और इसके स्थानीय प्रभारियों के नाम व मोबाइल नंबर भी समाचार पत्रों में प्रकाशित करेगा। साथ ही इस प्रकोष्ठ को जल स्रोतों और नलकूपों का जलस्तर भी लगातार जांचने को कहा गया है। हालांकि अभी तक प्रदेश के किसी भी क्षेत्र में पेयजल संकट की स्थिति नहीं बनी है फिर भी विभाग ने तैयारियां शुरु कर दी हैं। ताजा निर्देशों में कहा गया है कि हर स्थान पर सूखा राहत प्रकोष्ठ का गठन किया जाए और संभागायुक्त, कलेक्टर व कार्यपालन यंत्री से सतत संपर्क बनाए रखें। इतना ही नहीं इसके लिए उठाए गए कदमों की जानकारी प्रतिदिन ई-मेल से इनकी जानकारी भी भोपाल भेजी जाए। प्रदेश स्तर पर सूखा राहत की जिम्मेदारी कार्यपालन यंत्री सुनील कुमार खरे को सौंपी गई है।
मध्यप्रदेश में इस बार सूखे जैसे हालात बनने की आशंका जताई जा रही है। ऐसा प्रशांत महासागर की सतह पर असामान्य तरीके से बढ़ते तापमान(अल-नीनो प्रभाव) के कारण होगा। प्रशांत महासागर की सतह पर असामान्य तरीके से बढ़ते तापमान (अल-नीनो प्रभाव) के चलते इस वर्ष मानसून के दौरान भारत में सामान्य से कम बारिश होने के आसार बन रहे हैं। जून से सितंबर के बीच कुल 896 मिलीमीटर बारिश होने की आशंका जताई जा रही है। अगस्त को छोड़ पूरे मानसून के दौरान इस बार सामान्य से सिर्फ 34 फीसदी बारिश होने के आसार हैं। यह भविष्यवाणी इस हफ्ते मौसम संबंधी सूचना जारी करने वाली देश की पहली निजी कंपनी स्काईमेट ने की है।
सूखी 313 नदियों को पुनर्जीवित करने की योजना अधर में
मध्यप्रदेश में छोटी नदियां लगातार सूखती जा रही हैं, कई इलाके तो ऐसे हैं जहां नदियों के निशान तक नहीं बचे हैं। राज्य सरकार ने भी 313 ऐसी नदियों को चिह्न्ति किया है जो सूख चुकी हैं। इन्हें पुनर्जीवित किया जाना है, लेकिन योजना अभी अधर में है। राज्य की प्रमुख नदियों-नर्मदा, चंबल, बेतवा, क्षिप्रा, गंभीर, जामनी व धसान की हालत किसी से छुपी नहीं है, यह लगातार प्रदूषित हो रही हैं। साथ ही इनका प्रवाह भी प्रभावित हो रहा है। वहीं इन प्रमुख नदियों की सहायक नदियों के अलावा छोटी नदियां तो बारिश के मौसम में नजर आती हैं, लेकिन बारिश के बाद वे पूरी तरह सूख जाती हैं। इसके अलावा कई ऐसी नदियां हैं जिनमें बरसात में भी पानी नजर नहीं आता। राज्य की नदियों की स्थिति को लेकर पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह ने दो वर्ष पूर्व राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए नीति बनाने का प्रारूप दिया था। तब मुख्यमंत्री ने इस पर अमल का भरोसा दिलाया था। इस पर राज्य सरकार की ओर से चलाए गए अभियान में 313 नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए सर्वेक्षण और पैमाइश कर ली गई, लेकिन वह नीति अभी तक नहीं बनी है।
राज्य की नदियों के सूखने की मूल वजह पानी को रोकने का बेहतर प्रबंधन न होना रहा है। राजेंद्र सिंह कहते हैं कि फसलचक्र और वर्षाचक्र के बीच संबंध ठीक से स्थापित न किए जाने के कारण अधिकांश जल बह जाता है, वहीं कटाव को रोकने के बेहतर प्रबंध नहीं हैं। इसके अलावा भूजल पुनर्भरण की दिशा में भी काम नहीं हुआ है। राज्य सरकार की ओर से जल संरक्षण-सुरक्षा की दिशा में पहल की जा रही है, लेकिन जल प्रबंधन की दिशा में कारगर पहल के अभाव में नदियां और स्थायी संरचनाएं गर्मी के मौसम में सूख जाती हैं।
इधर, जल जन जोड़ो अभियान के संयोजक संजय सिंह कहते हैं कि नदियों के सूखने की वजह स्थायी संरचनाओं का सूखना है। हिमालय क्षेत्र से निकलने वाली नदियों के अलावा अधिकांश नदियों का उद्गम तालाब, झील या नाले हैं, लेकिन आज यही तालाब और झीलें सूख रही हैं। राज्य में बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा, निमांड वह इलाका है, जहां पानी की समस्या किसी से छुपी नहीं है। हाल यह है कि पानी की किल्लत के कारण बुंदेलखंड में खेती पर संकट छाया रहता है और हर वर्ष कई परिवार रोजी-रोटी की तलाश में राज्य से पलायन कर जाते हैं। राज्य में सूख चुकी नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए सरकारी स्तर पर चल रही कोशिश अगर कारगर साबित हुई तो पानी को लेकर होने वाले झगड़ों से निजात तो मिलेगी ही, साथ ही खेती- किसानी के काम भी आसान हो जाएंगे।
सूखने लगे हैण्डपंप
प्रदेश में गर्मी का प्रकोप बढऩे से जहां जन जीवन अस्त व्यस्त है, वहीं जल स्तर में गिरावट आने से ग्रामीणों की चिंता बढऩे लगी है। हैण्डपंपों में कई स्थानों पर गंदा पानी आने से ग्रामीणों की परेशानियां बढऩे लगी है। उन्होंने प्रशासन से खराब पडे हैण्ड पंपों को सुधारने और पेयजल के पुख्ता इंतजाम किए जाने पर जोर दिया है। जिस तरह गर्मी अपना तेज दिनों दिन बढ़ा रही है, ठीक उसी तरह कुंए एवं हैण्डपंप का जल स्तर कम होता जा रहा है। कहीं कहीं तो गर्मी के दिनों में हैैण्डपंप में पानी ही नही आ रहा है। जिस कारण ग्रामीण महिलाओं को पीने के पानी के लिए मसक्कत करना पड़ रही है। गांवों में लोग पीने के पानी के लिए हैण्ड पंपों पर ही निर्भर है, लेकिन हैण्डपंप सही पानी नहीं दे रहे है, जिस कारण लोग परेशान है। बताया गया है कि ग्रामीण इलाकों में कुओं का जल स्तर भी लगातार कम होता जा रहा है।, जिस कारण पेयजल और निस्तार के लिए पानी का अभाव होने लगा है। इतना ही नहीं कई इलाकों में बोर भी सूखने लगे है। पानी की कमी वेसे तो नहीं होती लेकिन गर्मी के दिनों में लोग पानी के लिए मजबूर दिखाई देते है। हद तो तब हो जाती है जब हैंडपंप से केवल लाल कलर का पानी निकलने लगता है। जिससे लोग बीमारी के भय से उपयोग में नहीं ला रहे है। गांवों में जल संकट के चलते लोगों को पाने के पानी के लिए परेशान होना पड़ रहा है। इसके अलावा किसानों को मवेशियों के लिए पानी लाने में पेरशानी हो रही है। कुओं के घटते जल स्तर एवं सूखते नल कूपों पर चिंता जताते हुए ग्रामीाणें ने प्रशासन से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की मांग की है।
नगर निकायों में पानी स्थिति
स्थानीय प्रशासन और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकीय विभाग द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार प्रदेश के 360 नगर निकायों में से 189 में रोज पानी सप्लाई नहीं हो रहा है लेकिन इनमें से 29 नगर निकायों में तीन दिन या इससे अधिक दिन छोड़ कर पानी सप्लाई हो रहा है। 50 नगर निकायों में दो दिन छोड़ कर बाकी 110 नगर निकायों में एक दिन छोड़कर पानी आता है। स्थिति इतनी भयावह है कि झाबुआ जिले के खवासा में 20 दिन में एक बार पानी सप्लाई होता है। इसी जिले के मेघनगर में 15 दिन में एक बार जनता को पानी के दर्शन नसीब होते हैं। शुजालपुर में 7 दिन बाद जिले में सोयतकलां और नगर पंचायत सीहोर में 6 दिन छोड़कर पानी दिया जाता है। छतरपुर के बकस्वाहा,शाजापुर के सुमनेर, खंडवा के मूंदी, राजगढ़ की ब्यावरा नगर पालिका में 5-5 दिन के अंतराल से पानी मिल रहा है। छतरपुर के महाराजपुर और गढ़ीमलहरा, छिंदवाड़ा के चांदामेटा, चौरई, राजगढ़ के बोड़ा और माचलपुर में 4-4 दिन के अंतर से बुरहानपुर के 10 वार्डों में तीन दिन छोड़ कर, पानी सप्लाई हो रहा है। धार जिले में कुक्षी में 4 दिन छोड़ कर, मनावर और गंधवानी में तीन दिन छोड़कर, धामनोद में 2 दिन छोड़कर, धरमपुरी में 4 दिन बाद, नालछा में 7 दिन के अंतराल से और मांडू में 1 दिन छोड़कर पानी दिया जा रहा है। राजधानी भोपाल में भी एक दिन छोड़कर पानी मिल रहा है। बैरसिया में अगर दो दिन छोड़कर पानी मिल रहा है तो कोलार नगर पालिका में तो नल जल योजना ही नहीं है, वहां टैंकरों से पानी सप्लाई हो रहा है। इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि जो कोलार डैम भोपाल की प्यास बुझाता है, उसी डैम से कोलार के नागरिकों की प्यास बुझाने की कोई योजना नहीं है। गर्मी के इस मौसम में बीस दिन या सात दिन में मिलने वाला पानी पीने के लिए कितना सुरक्षित हो सकता है, इसका अंदाजा तो सहज ही प्रदेश में गंदे पानी से होने वाली बीमारियों, उलटी, दस्त, डायरिया सहित पेट की अन्य बीमारियों के बढ़ते मरीजों से लगाया जा सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के लिए त्राहि-त्राहि
यह बदतर स्थिति केवल शहरों तक सीमित नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो हालत और भी भयावह है। पहाड़ी क्षेत्रों में तो आदिवासी गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। उन्हें कई-कई मील से पानी भर कर लाना पड़ रहा है। मैदानी क्षेत्रों में भी कुंओं और हैंडपंपों का पानी नीचे उतर गया है। जिनकी चिंता नहीं हो रही है। वह हैं पालतू पशु। नदी नालों में पानी सूख जाने के कारण उनकी प्यास बुझाना सबसे मुश्किल हो रहा है। केवल पशुओं के पीने के पानी के संकट के कारण ही कई क्षेत्रों में लोगों को पलायन करना पड़ रहा है। यदि हम आदिवासी बहुल क्षेत्रों की बात करें तो बालाघाट में 4 नल जल योजनायें और 168 हैंडपंप बंद पड़े हैं। मंडला में जहां नर्मदा कुंभ के नाम पर आरएसएस का कार्यक्रम आयोजित करने पर शिवराज सरकार ने करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाये थे। वहां 56 नल जल योजनायें और 923 हैंडपंप बंद पड़े हुए हैं। सिवनी में 100 से ज्यादा गांवों में परिवहन से पानी की व्यवस्था हो रही है। 133 नल जल योजनाएं बंद हैं। इसके साथ ही 405 हैंडपंप भी बंद पड़े हुए हैं। बड़वानी जिले में 2 नल जल योजनायें ठप्प हैं। साथ ही 587 हैंडपंप बंद हैं। झाबुआ में 2 नल जल योजनायें बंद हैं। पिटोल में 4 व बामनियां में 3 दिन के बाद पानी सप्लाई होता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार खराब हैंडपंपों की संख्या तो मात्र 46 है, लेकिन 79 गांवों में गांववासियों को परिवहन से पानी लाकर प्यास बुझाने को मजबूर होना पड़ा रहा है। मंदसौर जिले में शासन ने मान लिया है कि 200 गांव पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। कई गांव ऐसे भी हैं, जहां 5 किलोमीटर दूर से पानी लाया जा रहा है। 1415 हैंडपंप खराब पड़े हुए हैं और 25 नल जल योजनायें बंद पड़ी हैं। रतलाम में 116 हैंडपंप और 106 नलकूप योजनायें बंद हैं। शहरों तक में यह स्थिति है कि रतलाम नगरनिगम में एक दिन छोड़कर, जावरा नगर पालिका में 3 दिन छोड़कर, नामली नगर पंचायत में 3 दिन छोड़कर, ताल और पिपलोदा में 2 दिन छोड़कर पानी सप्लाई हो रहा है। दमोह जिला फिर पानी संकट से जूझ रहा है। जहां ग्रामीण क्षेत्रों 373 हैंडपंप बंद हैं। डिंडोरी जिले के 88 गांवों में पानी का भयावह संकट है। शहडोल संभाग में 183 में से 28 नल जल योजनायें बंद हैं।
जबलपुर जिले में 27 नल जल योजनायें बंद हैं। 200 हैंडपंप सूख गये हैं और 41 बसाहटों में टैंकर से पानी सप्लाई हो रहा है। ग्वालियर जिले में 1300 हैंडपंप सूखे गये हैं, इसके अलावा 200 हैंडपंप खराब हैं और 6 नल जल योजनायें बंद हैं। कुल मिलाकर सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही 4 लाख 62 हजार 348 हैंडपंपों में से 36,690 बंद पड़े हुये हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में नल जल की 8 हजार 835 योजनाओं मे से 1196 योजनाएं बंद हैं। जो हैंडपंप चालू भी हैं, उनमें से भी आधे से अधिक दबंगों के कब्जे में है। स्थिति यह है कि राजधानी भोपाल में ही 33 ट्यूबवेल पर दबंगों का कब्जा है। ग्रामीण क्षेत्रों में दलित और आदिवासी बस्तियों के हैंडपंप यदि खराब हैं तो वे दबंगों के कब्जे वाले हैंडपंपों से पानी भरने की सोच भी नहीं सकते। उल्लेखनीय है कि पेयजल संकट की यह स्थिति 15 अप्रैल की है। जब तक यह अंक पाठकों के हाथ में होगा, तब तक पेयजल संकट और ज्यादा विकराल हो चुका होगा।
शुक्रवार, 27 मार्च 2015
करोड़ों का प्रीमियम वसूला, धेला भर भी नहीं दिया लाभ
किसानों का 12,0000,00,000 हड़पा बीमा कंपनियों ने
मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी 6 लाख किसानों को फसल बीमा राशि का इंतजार
भोपाल। यह लगातार तीसरा वर्ष है जब रवि फसलों के पकने और कटने के समय अतिवृष्टि एवं ओलावृष्टि हुई है और किसानों की फसल खेत में ही बर्बाद हो गई है। पिछली दो बार की तरह इस बार भी मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके मंत्रिमंडल के सदस्य खेतों में घूम-घूमकर किसानों के आंसू पोछने को उपक्रम (इसका अर्थ अपनी-अपनी समझ के अनुसार लगाने के लिए आप स्वतंत्र हैं )कर रहे हैं। मुख्यमंत्री किसानों को तत्काल राहत राशि मुहैया कराने की घोषणा कर रहे हैं, अफसरों को तरह-तरह का निर्देश दे रहे हैं, बर्बाद फसलों का सर्वे करने के लिए अलग-अलग तरीके सुझा रहे हैं। यहीं नहीं वे राष्ट्रीय फसल बीमा का लाभ दिलाने की घोषणा कर रहे हैं। वह कहते फिर रहे हैं कि वर्ष 2013 में खरीफ सत्र के दौरान फसलों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए 2187 करोड़ रुपए की बीमा राशि का भुगतान करवा दिया हूं, लेकिन किसान आज भी बीमा राशि के लिए बैंकों का चक्कर लगा रहे हैं। आलम यह है कि पिछले 14 साल में फसल बीमा के लिए प्रदेश के 3 करोड़ 27 लाख किसानों से प्रीमियम के रूप में 12 अरब 44 करोड़ रूपए वसूले गए, लेकिन मौसम की मार पर फायदा मात्र 65 लाख किसानों को ही मिला और वह भी कौडिय़ों में। जिसका परिणाम यह हो रहा है कि पिछले आठ साल में कर्ज के बोझ के तले प्रदेश में करीब साढ़े नौ हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं। फसल बीमा कराने वाले किसानों का कहना है कि अगर हमारी बर्बाद हुई फसलों की बीमा राशि ही मिल जाए तो हम सरकार के मुआवजे की आस में नहीं रहेंगे।
आसमानी कहर से हुई बर्बादी की भरपाई करने का दावा कर किसानों से हर साल फसल बीमा के प्रीमियम के नाम पर करोड़ों की उगाही करने के बाद भी उन्हें धेला भर की मदद नहीं दी जा रही है। पूरा साल गुजर जाने के बाद भी जिले में किसानों को फसल बीमा की राशि नही दी गई है। सुनियोजित तरीके से की जा रही ठगी के कारण लगातार तीसरी फसल बर्बाद हो जाने के बाद जिले के किसानों का गुस्सा अब फसल बीमा करने वाली सहकारी समितियों के कर्ताधर्ताओं के खिलाफ पनप रहा है। जिम्मेदार अफसर सारा दोष शासन की प्रक्रिया पर मढ़ रहे हैं तो सत्ताधारी दल और विपक्ष किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने में खुद को असहाय महसूस कर रहा है।
वर्ष 2013-14 में जहां प्रदेश में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से 49 जिलों के 9,584 गांवों की करीब 10 हजार करोड़ रूपए की फसल तबाह हो गई थी। वहीं इस बार सरकारी आंकलन से 15 और कृषि व मौसम विशेषज्ञों के अनुसार 39 जिलों में फसलों को नुकसान पहुंचा है। प्रदेश सरकार ने किसानों को त्वरित राहत पहुंचाने के लिए 500 करोड़ रूपए की राहत राशि की घोषणा कर दी है, लेकिन अभी न तो कोई बैंक और न ही सहकारी समिति किसानों को राहत देने सामने आई है।
फसल बीमा के नाम पर ठगी का खेल
करीब एक दशक पहले शुरू हुई राष्ट्रीय फसल बीमा योजना का सीधा-सीधा मकसद फसल नष्ट होने की स्थिति में क्षतिपूर्ति करना और किसान को मदद पहुंचाना है। अपने घोषित मकसद की वजह से जाहिर है कि यह योजना काफी लोकलुभावनी दिखाई देती है, लेकिन हकीकत इसके उलट है। बीमा कंपनियों ने बड़ी चालाकी से इसकी ऐसी शर्तें तय की हैं कि हर्जाने का दावा मान्य होने पर कंपनियों को बहुत मामूली भुगतान करना पड़े। मुआवजा भी तब मिलता है, जब तालुका या प्रखंड स्तर पर फसल बर्बाद हुई हो। इससे कम क्षेत्र में नुकसान होने पर भरपाई नहीं की जाती। इतना सब कुछ पक्ष में होने के बाद भी कंपनियों की नीयत किसानों को फायदा देने की नहीं है। फसल बीमा का अग्रिम प्रीमियम वसूल करने वाली बीमा कंपनियां जरूरत पडऩे पर दावा राशि का भुगतान करने में भी आनाकानी करती हैं।
पहले तो किसानों को बिना बताए उनके खातों से फसल बीमा प्रीमियम काट लिया जाता है। जब सूखा या ओलावृष्टि आदि से फसल बर्बाद होती है कई फसलों को गैर अधिसूचित बताकर बीमा कंपनी मुआवजा नहीं देती। लेकिन जो फसलें अधिसूचित हैं उनका मुआवजा देने में भी आनाकानी की जाती है। पिछले साल ओलावृष्टि से बर्बाद हुई गेहूं की फसल के किसानों को अब तक मुआवजे का इंतजार है। हालांकि कृषि महकमा और बीमा कंपनी अपने-अपने स्तर से सर्वे कर चुके हैं। वैसे तो राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना किसानों की भलाई के लिए लागू की गई है। इसलिए किसानों को फसल सुरक्षा करने के उद्देश्य से उनके बैंक खाते से संबंधित बैंक या सहकारी समितियां फसल बीमा का प्रीमियम काट लेती हैं। इस प्रीमियम में आधी धनराशि किसान की होती है और आधी राशि केंद्र और राज्य सरकार समान रूप से वहन करती हैं। लेकिन जब मौसम की प्रतिकूलता और ओलावृष्टि से फसल बर्बाद होती है किसानों को उसका मुआवजा तक नहीं दिया जाता।
किसान को मिलता है सिर्फ 50 पैसे मुआवजा
राज्य के 39 जिलों में हुई ओलावृष्टि से सैकड़ों करोड़ रूपए की फसल बर्बाद हो गई है। हालांकि, किसानों के पास बीमा है, लेकिन इसका फायदा उन्हें नहीं मिलने वाला है। पिछले 14 साल का अनुभव बताता है कि बीमा होने के बावजूद किसानों के हाथ कुछ नहीं लगता है, जबकि कंपनियां हजारों करोड़ रुपए कमा रही हैं। बीमा योजना में भारी खामियां है, जिसका लाभ कंपनियां उठा रही हैं और लाखों की बर्बादी झेलने वाले किसान को भरपाई के नाम पर सिर्फ 50-50 पैसे मिल रहे हैं। जानकारी के अनुसार, 'फसल बीमाÓ करने वाली कंपनियों ने पिछले 14 साल में प्रदेश के 3 करोड़ 27 लाख किसानों से प्रीमियम के रूप में 12 अरब 44 करोड़ रूपए कमाए हैं। गौरतलब है कि कंपनियां केंद्रीय सहकारी बैंकों और उनकी शाखाओं के माध्यम से बीमा करती हैं। किसान अगर फसल का बीमा नहीं करवाएं तो ये बैंक उन्हें कर्ज भी नहीं देते हैं। किसानों का कहना है कि सरकार की गलत योजना से बीमा कंपनियां सीधे तौर पर 65 प्रतिशत से ज्यादा पैसा अपनी जेब में डाल लेती हैं और किसानों को लाखों रुपए की फसल नष्ट होने के बदले में कभी 50 तो कभी 80 पैसे का मुआवजा देकर पल्ला झाड़ लेती हैं। किसानों के प्रतिनिधियों का कहना है कि बीमा कंपनियां फसल बर्बाद होने पर किसानों को प्रीमियम से भी कम राशि का क्लेम देती हैं। यानी वे किसानों से प्रीमियम का पैसा भी हजम कर जाती हैं और मुआवजे की राशि भी खा जाती हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2010 में फसल बीमा के तहत प्रदेश के किसानों ने खरीफ फसलों के लिए 11374.53 लाख स्पए प्रीमियम के तौर पर जमा कराया था,जबकि उन्हें लगभग आधी रकम लगभग 5416.28 लाख रूपए ही दावे के अंतर्गत मिल सके। इसी तरह वर्ष 2012-13 में खरीफ -के लिए 20781.50 लाख रूपए प्रीमिय जमा हुआ और फसल खराब होने पर मिले मात्र 7507.77 लाख रूपए। इस तरह बीमा कंपनिया किसानों को ठग रही हैं।
बीमा कंपनियों को कोई नुकसान नहीं
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना के अंतर्गत एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी के पास किसानों का बीमा होता है। प्रदेश के जिला सहकारी बैंक और प्राथमिक सहकारी समितियों के जरिए जो किसान अल्पकालीन कृषि ऋण लेते है उनके ऋण की राशि को ही बीमा राशि मानते हुए उसका डेढ़ से साढ़े तीन प्रतिशत तक प्रीमियम राशि शुरूआत में ही काट ली जाती है। बीमा कंपनी केवल उस सीमा तक नुकसान की भरपाई करती है जितनी उन्हें प्रीमियम के रूप में प्राप्त हुई। दावे की राशि ज्यादा होने पर राज्य और केंद्र सरकार आधा-आधा वहन करती है। इस कारण बीमा कंपनी को इसमें कोई नुकसान नहीं होगा। बल्कि जिस वर्ष में ज्यादा प्रीमियम मिलता है और दावा भुगतान कम किया जाता है उस वर्ष उन्हें फायदा होता है।
ऐसे फंसाया जाता है पेंच
फसल बीमा योजना की सबसे बड़ी गड़बड़, योजना का स्वैच्छिक और अनिवार्य होना है। जो भी किसान बैंक या सहकारी संस्था से ऋण लेता है, बैंक उससे बिना पूछे अनिवार्य रूप से प्रीमियम काट लेता है। उसे कोई जानकारी, रसीद या पॉलिसी का कागज नहीं दिया जाता। जिसके चलते किसान को मालूम ही नहीं चलता कि उसकी फसल का बीमा हुआ भी है,या नहीं। मौसम आधारित फसल बीमा योजनाएं हमारे मुल्क में पश्चिम मुल्कों से आई हैं। और सब जानते हैं,कि इसमें विश्व बैंक की सिफारिशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बहुत बड़ा दबाव था। पश्चिमी मुल्कों और हमारे यहां की परिस्थितियों में यदि अंतर करके देखें, तो इसमें बुनियादी फर्क है। यूरोपीय मुल्कों में जहां सैंकड़ो-हजारों एकड़ जमीन के किसान और कंपनियां बहुतायत में हैं, तो हमारे यहां छोटे-छोटे काश्तकार हैं। एक बात और। वहां के किसान संतुष्ट होकर स्वेच्छा से अपनी फसल का बीमा करवाते हैं,लेकिन हमारी सरकारों ने इस बीमे को जबर्दस्ती किसानों पर थोपा है। किसान चाहे न चाहे,उसे बीमा करवाना ही पड़ेगा। आलम यह है कि हमारे यहां सभी फसल बीमा योजनाएं सरकार के अनुदान और सहयोग से क्रियान्वित हो रही हैं। उसके बाद भी तस्वीर कुछ इस तरह से है, पैसा किसान व सरकार का, मुनाफा कंपनियों का और नुक्सान सिर्फ व सिर्फ किसान का। कुल मिलाकर, सरकारों के तमाम दावों और वादो के बाद भी फसल बीमा योजना किसानों के लिए सिर्फ एक छलावा साबित हुई है। लगातार हो रही किसानों की आत्महत्याएं, फसल बीमा योजना की नाकामी को उजागर करती हैं। बीमा कंपनी द्वारा किसानों की फसल का बीमा व्यक्तिगत होता है। लेकिन फसल के नुकसान होने पर मुआवजा सामूहिक मिलता है। प्राकृतिक आपदा के बाद 3 और 5 साल के औसत उत्पादन के आधार पर नुकसान का आकलन होता है। अधिकांश फसल कटाई प्रयोग किसान के सामने नहीं होते। मौसम खराबी का आंकलन करने के लिए हर जगह पर्याप्त लैब और उपकरणों का अभाव है। अऋणी किसानों को नहीं मिल पाता बीमा योजना का लाभ। विडंबना की बात यह है कि एक तरफ किसानों को यहां फसल बीमा का फायदा नहीं मिला,तो दूसरी तरफ बैंक अधिकारी किसानों को कर्ज वसूली के लिए परेशान कर रहे हैं। किसानों पर दंड व ब्याज लगाया जा रहा है।
सरकार की आर्थिक सेहत बिगड़ी
करीब एक लाख करोड़ के कर्ज में डूबे प्रदेश की वित्तीय स्थिति पहले ही गड़बड़ चल रही थी, अब असमय बारिश और ओलावृष्टि ने सरकार की आर्थिक सेहत पर सीधा असर डाला है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की है कि किसानों की मदद को पूरा करने के लिए विभागों के बजट में कटौती की जरूरत पड़ी तो वह भी किया जाएगा। जानकारी के अनुसार सरकार पीडब्ल्यूडी, पीएचई, पर्यटन, खेलकूद, उद्योग संवर्धन, पुलिस इत्यादि महकमे के बजट से कटौती कर किसानों को राहत राशि उपलब्ध कराने की तैयारी कर रही है। यदि यहां से भी व्यवस्था पूरी नहीं हुई तो विकास कार्यो को रोककर राशि जुटाई जाएगी। प्रदेश की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। ओला-पाला से खरीफ की फसल चौपट होने के बाद जैसे-तैसे किसानों ने हिम्मत कर फिर फसल बोई, फसल पक कर तैयार हुई और फिर प्रकृति की मार से फसल बर्बाद हो गई।
कर्ज के जाल में किसान
किसानों की आत्महत्या के पीछे कर्ज एक बड़ा कारण है। लघु और सीमांत किसानों के लिए बगैर कर्ज से खेती करना लगभग असंभव हो गया है। बैंकों से मिलने वाला कर्ज अपर्याप्त तो है ही, साथ ही उसे पाने के लिए खूब भागदौड़ करनी पड़ती है। इस दशा में किसान आसानी से साहूकारी कर्ज के चंगुल में फस जाते हैं। यदि हम पूरे मध्यप्रदेश में किसानों पर कर्ज की मात्रा का आकलन करेंं तो पाते हैं कि प्रदेश के किसान करीब दस हजार करोड़ रूपए से भी ज्यादा के कर्जदार हैं। क्योंकि अपेक्स बैंक के रिकॉर्ड में किसानों पर साढ़े सात हजार करोड़ रूपए कर्ज के रूप में दर्ज हैं। इसमें कम से कम ढाई हजार करोड़ का साहूकारी कर्ज जोड़ दें तो यह आंकड़ा दस हजार करोड़ को पार कर लेता है। सन् 2006 में गठित राधाकृष्णन समिति ने भी किसानों की आत्महत्या के लिए कर्ज को एक मुख्य कारण माना है। मध्यप्रदेश में आत्महत्या करने वाले किसान 20 हजार से लेकर 3 लाख रूपए तक के साहूकारी कर्ज में दबे थे। साहूकारी कर्ज की ब्याजदर इतनी ज्यादा होती है कि सालभर के अंदर ही कर्ज की मात्रा दुगनी हो जाती है। ऐसे में यदि फसल खराब हो जाए तो आने वाले समय में यह संकट और भी बढ़ जाता है।
3 माह से 6 लाख किसानों को फसल बीमा राशि का इंतजार
पिछले रबी सत्र में फसलों को हुए नुकसान की भरपाई के एवज में करीब 6 लाख किसानों को सरकार ने दिसंबर 2014 में फसल बीमा मद में करीब 609 करोड़ रुपए देने की घोषणा की थी, लेकिन तीन माह बाद भी किसानों को उक्त राशि नहीं मिल पाई है। राज्य किसान कल्याण और कृषि विकास विभाग के प्रमुख सचिव राजेश राजोरा ने कहा, 'दावा निपटान समिति जल्द ही दावों की समीक्षा करेगी और इस बात की पूरी संभावना है कि 2013-14 के रबी सत्र के लिए 608 करोड़ रुपये का दावा निपटा लिया जाएगा। इससे गेहूं और चना की फसल को नुकसान के एवज में करीब 5.77 लाख किसानों को मुआवजा मिल सकता है। खरीफ सीजन 2013 के लिए फसल बीमा दावा को पहले ही निपटाया जा चुका है और इसके तहत किसानों के बीच 2187 करोड़ रुपए का मुआवजा वितरित किया गया है।
6 साल में वसूले 53 करोड़, बांटे 24 करोड़
मुख्यमंत्री प्रदेशभर में घूम-घूमकर किसानों को फसल बीमा का लाभ दिलाने का आश्वासन दे रहे हैं, जबकि किसानों को पिछले साल का बीमा अभी तक नहीं मिल सका है। मंदसौर जिले में फसल बीमा योजना के नाम पर किसानों से प्रीमियम तो ली जा रही है, लेकिन क्लेम के नियम-कायदे इतने उलझे हुए हैं कि समय पर दे ही नहीं रहे हैं। छह सालों में कंपनी ने किसानों से 53 करोड़ रुपए वसूले हैं पर बांटे केवल 24 करोड़ रुपए ही है। वर्ष 2012-13 में जिले में 99 हजार 694 किसानों ने प्रीमियम के रुप में 2.53 करोड़ रुपए जमा कराए थे लेकिन एक भी किसान को क्लेम नहीं मिला। वर्ष 2013-14 में तो 57692 में से सिर्फ 18 किसानों को क्लेम मिल पाया। रबी की फसल पर प्राकृतिक कहर टूटने के बाद किसानों को बीमा कंपनी एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया से उम्मीद थी लेकिन प्रीमियम वसूलने के बाद भी सिर्फ 37 लाख रुपए दिए गए। इस तरह से वर्ष 2014-15 में भी फसल बर्बाद होने के बाद किसान क्लेम का इंतजार कर रहे हैं। जिले में 2013 में खरीफ की फसल में अति बारिश से हुए नुकसान में जिलेभर के किसानों में से महज 74 को ही फसल बीमा योजना का लाभ मिला था, लेकिन उन्हें किस तरह मिला यह बात न तो कृषि विभाग कहने के लिए तैयार है और न ही लीड बैंक के कर्ताधर्ता। लीड बैंक के मुताबिक 2014 की रबी की फसल में हुए नुकसान के कई बीमा प्रकरण भोपाल इंश्योरेंस कंपनी को भेजे गए थे, लेकिन अभी तक उनका निराकरण नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री ने सबलगढ़ में इंश्योरेंस का प्रीमियम 31 मार्च तक जमा करवाकर बीमा लाभ दिलाने की घोषणा की है, लेकिन रबी की फसल का बीमा कराने की आखिरी तारीख 31 दिसंबर थी। ऐसे में अब किसानों की फसल का बीमा किस तरह होगा, यह लोगों की समझ में नहीं आ रहा है। जिले के कृषि विभाग के उप संचालक आरपी गोयल कहते हैं कि अंचल के किसान आमतौर पर फसल का बीमा नहीं कराते हैं। जब वे खाद या बैंक से लोन लेते हैं तो बैंक उनकी फसल का बीमा करा देती हैं। तत्कालीन कलेक्टर मदन कुमार के समय फसलों का बीमा कराने के लिए काफी प्रयास किए गए, लेकिन किसान बीमा कराने के लिए तैयार ही नहीं हुए। लीड बैंक मुरैना प्रबंधक टी शाह कहते हैं कि 2013 में खरीफ की फसल में हुए नुकसान के लिए जिले के 74 किसानों को फसल बीमा मिला था। 2014 के प्रकरण अभी भी इंश्योरेंस कंपनी में लटके हैं। निराकरण नहीं हुआ है।
शर्तों ने रोकी किसान की राहत
ओला और बारिश से रबी की फसलें चौपट होने के बाद किसानों को फसल बीमा योजना से भी उम्मीद नहीं है। बीमा की शर्तें ही किसानों के लिए मुसीबत बन रही हैं। किसानों से प्रीमियम तो पूरा वसूला जाता है लेकिन शर्तें इतनी सख्त कि क्लेम मिलना नामुमकिन ही होता है। इस पर भी यदि क्लेम मिल भी जाता है तो वो भी नहीं के बराबर ही होता है। प्रदेश में फसल बीमा के हालात ये हैं कि कई जिलों के किसान को तो दो साल में एक बार भी क्लेम नहीं मिला। कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन भी मानते हैं कि फसल बीमा में विसंगतियां हैं। किसानों को लाभ नहीं मिल रहा है। बावजूद इसके प्रदेश सरकार बीमा नियमों में सुधार की दिशा में अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी है। रायसेन जिले के संग्रामपुर गांव के लालाराम की 15 बीघा की फसल दो साल पहले ओलों से नष्ट हो गई थी। फसल बीमा था, दो हजार प्रीमियम भी जमा किया लेकिन उन्हें क्लेम की राशि महज 15 सौ रुपए ही मिली। विदिशा के बिलरई निवासी हरनाम सिंह रघुवंशी की अतिवृष्टि से पिछले साल 20 बीघा का सोयाबीन नष्ट हो गया था। फसल पर 50 हजार रुपए से अधिक की लागत आई और बीमा क्लेम महज 12 सौ रुपए ही मिला। बैतूल जिले के घोड़ाडोंगरी के कोयलारी गांव के किसान राजेश यादव की 25 बीघा की वर्ष 2013 की रबी और खरीफ की फसल ओला, बारिश के कारण बर्बाद हो गई थी। दोनों फसलों बीमा का क्लेम महज 12 सौ रुपए मिला।
बैतूल जिले में वर्ष 2013-14 में रबी और खरीफ मौसम की फसलों के लिये 68 हजार 608 किसानों से 4 करोड़ 18 लाख रुपए से अधिक राशि फसल बीमा का प्रीमियम जमा करने के लिए वसूल की गई है। सहकारी समितियों के माध्यम से जिले भर में रबी और खरीफ मौसम की फसलों के लिये खाद और बीज क्रय करने वाले किसानों से फसल बीमा के लिए प्रीमियम राशि की वसूली की गई है। जिले में पिछले साल की रबी और खरीफ मौसम की फसलों के लिये जमा किए गए प्रीमियम की बीमांकित राशि करीब सवा अरब रुपए है। दोनों फसलों को मौसम के कहर से हुए नुकसान के बाद प्रशासन द्वारा किए गए सर्वे में केवल खरीफ मौसम में सवा अरब से अधिक की क्षति का आंकलन किया गया था। सरकारी तौर पर तो किसानों को मुआवजा बांट दिया गया लेकिन फसल बीमा की राशि का आज तक किसान इंतजार कर रहे हैं। फसल बीमा के लिए जिले में एग्रीकल्चर इश्योरेंस कंपनी को अधिकृत किया गया है। इस कंपनी को किसानों की सूची और प्रीमियम की राशि भेज दी जाती है और फसल कटाई प्रयोग के अलावा आनावारी की रिपोर्ट के आधार पर कंपनी बीमा दावे स्वीकार करती है। फसल बीमा करने के लिये जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक के अलावा राष्ट्रीयकृत बैंकों से किसान क्रेडिट कार्ड बनाने वाले किसानों से भी प्रीमियम की वसूली की जाती है।
बैतूल जिले की शाहपुर तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम सोहागपुरढाना के कृषक राजेश सिनोटिया ने बताया कि उनके द्वारा सोसायटी में फसल बीमा का प्रीमियम तो जमा किया गया था। लेकिन आज तक लाभ नहीं मिल पाया है। उनके खेत के आसपास के सभी किसानों को बीमा का लाभ दिया गया लेकिन उन्हे लाभ नहीं मिल पाया है। राजेश ने बताया कि पिछले साल सोयाबीन की फसल अधिक बारिश होने और गेहूं की फसल ओलावृष्टि होने की वजह से पूरी तरह से बर्बाद हो गई थी। तमाम जगह शिकायत करने के बाद भी केवल यह आश्वासन दिया जा रहा है कि बीमा कंपनी के द्वारा अभी राशि नहीं दी गई है। फसल बीमा के नाम पर किसानों से हो रही ठगी के मामले में आठनेर ब्लाक सबसे अव्वल है। इस ब्लाक में सैकड़ों किसानों को फसल बीमा के नाम पर चवन्नी भी नहीं मिल पाई है। आठनेर ब्लाक के ग्राम सूखी निवासी फगनसिंह धुर्वे ने बताया कि एक साल पहले उसके द्वारा सोसायटी से खाद खरीदी गई थी तब डेढ़ हजार रुपए फसल बीमा का प्रीमियम भी जमा किया गया था। दो साल बीत गए लेकिन फसलों के बर्बाद हो जाने के बाद भी धेला भर नहीं मिल पाया है।
बैतूल जिला कांग्रेस अध्यक्ष समीर खान कहते हैं कि अच्छे दिन का ढोल पीटने वाली सरकार की पोल हर कदम पर खुल रही है। अन्नदाता बर्बाद हो गया है और उनके हक की राशि सरकार दबाए बैठी है। किसानों को फसल बीमा का लाभ जल्द दिलाने के लिए कांग्रेस सड़क पर उतरेगी और सरकार की पोल खोलेगी। उधर, बैतूल जिला सहकारी बैंक के महाप्रबंधक लता कृष्णन कहती है कि पिछले वर्ष की रबी और खरीफ मौसम की फसलों का प्रीमियम किसानों से वसूल कर बीमा कंपनी को दिया गया है। अभी तक पिछले साल की बीमा राशि प्राप्त नहीं हो पाई है। इस वर्ष की रबी मौसम की फसलों का बीमा किया जा रहा है।
बीमा योजना की सुविधा बनी असुविधा
सुनने में आसान लगने वाली फसल बीमा योजना की सुविधा किसानों के लिए टेड़ी खीर साबित हो रही है। पहले तो इस योजना के दायरे में किसानों का आना ही मुश्किल होता है। दायरे में आ भी जाएं, तो फसल का नुकसान साबित करने और क्लेम पाने में रात-दिन एक करना पड़ता है। तमाम दुविधाओं को देखते हुए जिले के किसानों ने इससे तौबा कर ली है। अनिवार्य बीमा के दायरे में आने वाले ऋणधारक किसानों को छोड़ दिया जाए, तो निजी तौर पर आगे आकर बीमा कराने वाले किसानों की जिले में सं या न के बराबर है। फसलों के नुकसान के आकलन के लिए जिला प्रशासन द्वारा तैयार रिपोर्ट को बीमा कंपनी मान्य नहीं करती है। इसके लिए उसकी टीम अलग से सर्वे करती है और नुकसान तय करती है। कंपनी क्षेत्र में हुए नुकसान को आधार बनाती है, न कि बीमित किसान की फसल को। यदि सिर्फ बीमित किसान की फसल किसी आपदा का शिकार हुई है, तो उसे मान्य नहीं किया जाएगा।
एक साल बाद क्लेम
तमाम उलझनों के बाद किसानों का नुकसान मान भी लिया जाए, तो क्लेम की राशि मिलने में एक साल इंतजार करना होता है। यानी खरीफ की फसल में नुकसान होने पर उसका क्लेम अगली खरीफ की फसल में दिया जाएगा। कृषि विभाग के अनुसार अधिसूचित फसलों को तय करने के लिए क्षेत्र में उस फसल के पांच साल के उत्पादन को देखा जाता है। उसके हिसाब से मौजूदा सीजन में उसके उत्पादन का आंकलन करते हुए उसे अधिसूचित किया जाता है। एक जिले में आम तौर पर तीन से चार फसलों को अधिसूचित किया जाता है। फसल बीमा का काम जिला सहकारी बैंक के माध्यम से किया जाता है। यह सुविधा खास तौर से उन किसानों को मिलती है, जिन्होंने बैंक से ऋण ले रखा है। बैंक द्वारा ऋण राशि में ही उनका प्रीमियम समायोजित कर दिया जाता है। इसके अलावा कोई किसान अलग से बीमा का लाभ लेना चाहे, तो उसे नकद प्रीमियम देने के साथ ही क्लेम पाने के लिए भटकना पड़ता है। इन मुश्किलों से बचने के लिए किसान अलग से फसल बीमा का लाभ नहीं लेते हैं।
हमे पता नहीं कहां हो रहा सर्वे ओलावृष्टि और बारिश से फसल बर्बाद होने के बाद तबाह किसानों को मुआवजा देने के लिए शासन और प्रशासन ने अपने-अपने स्तर पर घोषणा तो कर दिया है,लेकिन किसानों के खेतों पर सर्वे करने के लिए अभी तक कोई नहीं पहुंचा है। भोपाल जिले के कुछ गांवों का दौरा कर सर्वे के बारे में किसानों से पूछा गया तो उन्होंने ही सवाल पूछ लिया कि आखिर सर्वे हो कहां रहा है? ज्यादातर किसान कह रहे हैं कि उनके यहां सर्वे के लिए कोई नहीं आया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्देश पर कलेक्टर ने जिला प्रशासन और कृषि विभाग के अधिकारियों को ओला और बारिश में हुए नुकसान का आकलन करने के निर्देश दिए थे। उसके बाद से सर्वे शुरू हुआ है। जिला प्रशासन का दावा है कि टीमों ने क्षेत्र में सर्वे कर लिया है, लेकिन अधिकांश क्षेत्रों में टीमें नहीं पहुंचने की बात कह रहे हैं। तूमड़ा गांव के निवासी नर्मदा पटेल ने बताया कलेक्टर साहब ने कहा था कि जल्द ही टीम सर्वे करने जाएगी। क्षेत्र में हजारों एकड़ फसल तबाह हो गई है, लेकिन अभी तक कोई सर्वे करने नहीं पहुंचा। खेतों में पानी भरने से फसल खराब हो गई है, लेकिन सर्वे के लिए कोई नहीं आया। कांहासैया निवासी कमल ने बताया, एक एकड़ में गेहूं बोया था। फसल बर्बाद हो गई। पटवारी कह रहा है, गेहूं के सर्वे का निर्देश नहीं है। इसी गांव के निवासी संतोष पटेल का तीन एकड़ में बोया चना बर्बाद हो गया है। रामकेश पटेल का नौ एकड़ चना खराब हुआ है। इन्होंने बताया कि पटवारी आया था, लेकिन सर्वे किए बिना ही लौट गया। परवलिया सड़क निवासी ब्रजमोहन ने कहा कि सर्वे अभी किया गया है, जबकि फसल चार दिन बाद सूखेगी। अभी नुकसान मामूली दिख रहा है। लक्ष्मण ने बताया उनका 2.5 एकड़ चना बर्बाद हो गया, लेकिन सर्वे नहीं हुआ।अम्बिका शुक्ला ने बताया कि पटवारी को सर्वे के लिए फोन किया, तो उसने कह दिया कि आदेश नहीं मिला है। छांद निवासी राजा खान ने बताया कि उनकी दस एकड़ से ज्यादा फसल तबाह हो गई है, लेकिन अभी तक गांव में सर्वे करने कोई नहीं पहुंचा। इसी तरह जिले के ललोई,जमूसर खुर्द,आदमपुर छावनी आदि गांवों में दलहनी फसलें ओला, पानी से चौपट हो गई हैं। ओला पानी से क्षेत्र में दलहनी फसलों को सौ प्रतिशत नुकसान पहुंचा है, तो गेहूं की फसल खेतों में बिछ गई है। तिल-तिल मरती फसल देख रो रहे किसान बड़ी मेहनत से फसल बोई। देखभाल की और बारिश का पानी भरने के कारण अब फसल तिल-तिल करके सूख रही है। किसानों को पता है कि पानी सूखने तक फसल नष्ट हो जाएगी और इसके कारण उनके आंसू नहीं रूक रहे हैं। यह हाल हुजूर तहसील के कई गांवों का है। खेतों में पानी भरने से गेहूं के पौधों की जड़ें सड़ गई हैं और पत्तियां पीली पडऩे लगी हैं। किसानों का कहना है कि जड़ें सड़ गई हैं, इसलिए अब इन पौधों का सूखना भी तय है। मटर सूखी और टमाटर के पौधे काले-मटर के पौधे भी सूख गए हैं। फलियां पानी में डूबने के कारण सड़ गई हैं। उनमें कीड़े लगने लगे हैं। टमाटर और आलू के पौधे भी सूखकर काले हो गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पटवारी ने गेहूं में नुकसान न होने की बात कहकर सर्वे से इनकार कर दिया है, जबकि खेतों में अभी भी पानी भरा है। पौधे सूख रहे हैं। सब्जियों के नुकसान के लिए यह कहकर टाला जा रहा है कि सिर्फ दलहन के सर्वे का आदेश है। जिला प्रशासन का दावा है कि तहसीलदार तथा राजस्व व कृषि विभाग की टीम गांवों में जाकर नष्ट हुई फसल का सर्वे किया है। सात दिन में सर्वे पूरा करने के लिए कहा गया था। हुजूर तहसील के ग्रामीण इलाकों में हुई ओलावृष्टि के बाद तूमड़ा, र्इंटखेड़ी राजस्व सर्किल के अंतर्गत आने वाले गांवों की फसल पर सीधा असर पड़ा है। अब कैसे होगी बेटी की शादी और बेटे की पढ़ाई मौसम की मार झेल रहे किसान अब कर्ज में डूबते जा रहे हैं, खासतौर से छोटे किसानों के लिए मौसम अभिशाप बनकर सामने आ रहा है। स्थिति यह है कि किसान को फसल लगाने के लिए वर्ष में दो बार कर्ज लेना पड़ा, पहले कर्ज लेकर फसल लगाई। सोचा कि फसल आने पर कर्ज भी चुक जाएगा और घर की हालत भी बदल जाएगी, लेकिन शायद कुदरत को यह मंजूर न था और किसान की पहली फसल बारिश की भेंट चढ़ गई। कर्ज का बोझ बढ़ता गया और कर्ज को चुकाने के लिए किसान अगले सीजन पर फिर कर्ज लेकर रबी की फसल बो दी, लेकिन इस बार भी मौसम की बेरूखी किसान को भारी पड़ गई और दोबारा कर्ज लेकर किसान मुसीबतों में फंस गया। जी हां, हम बात कर रहे हैं क्षेत्र के उन किसानों की जिन्होंने कर्ज लेकर पहले खरीब की फसल बोई और अब रबी की फसल को मौसम की वजह से बर्बाद होता देख रहे हैं। ऐसे ही एक मामला जिले की बैरसिया तहसिल अंतर्गत आने वाले जमुसर खुर्द गांव निवासी लीलाराम का है। जिसने बीज और खाद के लिए कर्ज लेकर जुलाई माह में अपनी 5 एकड़ जमीन में सोयाबीन बोया लेकिन अत्याधिक बारिश की वजह से सोयाबीन की फसल खेत में ही सड़ गई और लीलाराम की उस उम्मीद पर पानी फिर गया। लीलाराम को उम्मीद थी वह फसल आने पर वह अपनी लाडली की शादी धूमधाम करेगा और अन्य बच्चों की परवरिश भी ठीक से हो जाएगी। रबी का सीजन आते ही पहले से कर्ज में डूबे लीलाराम ने एक बार फिर किसानी जुआ खेलने की सोचकर खाद,बीज खरीदने सेवा सहकारी बैंक से कर्ज ले लिया। उसने बैंक से 12 हजार रुपए खाद के नाम पर कर्ज लिया और 35 हजार रुपए फसल की लागत के लिए कर्ज ले लिया। कर्ज लेकर उसने गेहूं की बुवाई की, लेकिन बेमौसम हुई बारिश से उसकी फसल काली पड़ गई है और खेत से बीज निकलना भी मुश्किल है। लीलाराम के सामने अब घर चलाने के भी लाले पड़ गए हैं और अब ऐसे में उसकी बेटी के विवाह और पुत्र सोनू की पढ़ाई की चिंता सताने लगी है। गौरतलब हो कि सोयाबीन की फसल खराब होने पर सुखदेव के लाख प्रयासों के बाद भी उसकी जमीन का सर्वे नहीं किया गया और न ही मुआवजा संबंधी कार्रवाई की गई। इस संबंध में उसने जनसुनवाई समेत कई बार अधिकारियों के चक्कर काटे। कैसे हो बेटे का इलाज चार एकड़ की भूमि की खेती के सहारे अपने जीवन की गाड़ी चला रहे गुढारीघाट निवासी किसान भंवर लाल का कहना है कि खरीफ सीजन में बैंक से सोयाबीन की खेती के लिए 50 किलो सोयाबीन का बीज, खाद का कर्ज लेकर बोवनी की, लेकिन अधिक बारिश से फसल चौपट हो गई। पुन: हौसला करके 50 हजार का पुन: बैंक से कर्ज उठाकर इस सीजन में चनें और गेंहू की खेती की। जिसमें खराब मौसम की वजह से फसल में पाला लगने जाने से चने की फसल चौपट हो गई। उसने ने बताया कि उसका बेटा बेनी बीमारी से ग्रसित है और अब उसकी बीमारी के इलाज का भी इंतजाम नहीं है। इस तरह से देखा जा रहा है किसानों ने कर्ज लेकर फसलें बोईं लेकिन मौसम ने उनके कर्जे को चुकवाने की जगह और बढ़ा दिया। जिले में पिछले साल रबी मौसम की फसलों पर भी ओलों और अतिवृष्टि की ऐसी मार पड़ी थी कि किसानों के खेतों में चारों ओर बर्बादी फैल गई थी। गेहूं, चना और मसूर की फसलें बुरी तरह से प्रभावित हुईं और किसान तंगहाल हो गए थे। इसके बाद किसानों को खरीफ मौसम की फसलों से कुछ उम्मीद बंधी थी लेकिन लगातार बारिश से किसानों के खेतों में लगी धान, मक्का, ज्वार और सोयाबीन की फसलें पूरी तरह से चौपट हो गईं थी। किसानों को उम्मीद थी कि फसल बीमा का उन्हें लाभ मिल जाएगा लेकिन पूरा साल गुजर जाने के बाद भी राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं बच पाई है। किसानों के कर्ज की वसूली स्थगित प्रदेश सरकार ने फिलहाल ओला और बेमौसम बरसात से फसलों को हुए नुकसान के चलते 50 प्रतिशत से ज्यादा नुकसान उठाने वाले किसानों के कर्ज की वसूली स्थगित कर दी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि अल्पावधि ऋणों को मध्यावधि ऋणों में बदल दिया जाएगा और उनका ब्याज सरकार देगी। प्रभावित किसानों को खाद, बीज जीरो प्रतिशत ब्याज दर पर मिलेगा। मुख्यमंत्री का कहना है कि राज्य सरकार ने प्रभावित किसानों की मदद के लिए फौरी तौर पर 500 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। जितनी भी आवश्यकता होगी, उतनी राशि दी जाएगी। किसानों को फसल बीमा लाभ दिलवाने के लिए सभी कदम उठाए जायेंगे, जिससे नुकसान की काफी हद तक भरपाई हो सकेगी। वह कहते हैं कि पिछले साल प्रदेश में किसानों को 2187 करोड़ की राशि फसल बीमा में दिलवाई गई, जो देश में सबसे ज्यादा है। इस बार 50 प्रतिशत से अधिक नुकसान पर 15 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर और सब्जी तथा मसालों की फसलों के नुकसान पर 26 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से राहत दी जाएगी। व्यक्ति की मृत्यु पर 1.5 लाख, पशुओं की मृत्यु पर 16 हजार 500 और छोटे जानवरों की मृत्यु पर 10 हजार रुपए की सहायता दी जाएगी। प्रभावित किसानों की बेटी की शादी के लिए 25 हजार रुपए की सहायता दी जाएगी। जिन किसानों की पूरी फसल नष्ट हो गई है, उन्हें अगली फसल तक गेहूं, चावल और नमक एक रुपए प्रति किलो की दर से दिया जाएगा। ---
निर्मल भारत की मप्र में दिखी गंदी तस्वीर
शौचालय बनाने के नाम पर 785 करोड़ हजम कर गई पंचायतें
समेकित ऑडिट रिपोर्ट में हुए खुलासों ने सबको चौकाया
विभाग ने पंचायतों से वापस बुलाए 475 करोड़
भोपाल। पिछले एक दशक में मप्र में जितने भ्रष्टाचारी पकड़ाएं हैं, उससे पहले इतने भ्रष्टाचार के मामले कभी भी सामने नहीं आए हैं। हद तो यह की देश में ग्रामीण स्वच्छता के लिए शुरू किया गया निर्मल भारत अभियान भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है। सरकार ने घर-घर शौचालय बनाने के लिए प्रदेश की 23,000 पंचायतों को करीब 1260 करोड़ रूपए दिया था, लेकिन आज 7 साल बाद भी 63 फीसदी ग्रामीण क्षेत्र में शौचालय नहीं हैं। जबकि पंचायतों ने कागजों पर 785 करोड़ की रकम खर्च कर दी है। इस खुलासे के बाद सरकार ने पंचायतों से 475 करोड़ रूपए वापस बुलाए हैं। वहीं पंचायतों को क्षेत्र में बनाए गए शौचालयों की रिपोर्ट भी तलब की है। उल्लेखनीय है के मध्य प्रदेश में ग्राम पंचायतों और ग्राम कोषों का ऑडिट सीएजी के पर्यवेक्षण में स्वतंत्र एजेंसी के जरिए होने लगा तो गड़बड़ी मिलने का सिलसिला भी शुरू हो गया। समेकित ऑडिट रिपोर्ट में कई ऐसे खुलासे सामने आए हैं जो चौकाने वाले हैं।
पंचायत चुनाव नहीं होते तो चलता रहता भ्रष्टाचार
देश को निर्मल बनाने के लिए सरकार ने हर घर में शौचालय बनाने के लिए निर्मल भारत अभियान शुरू किया था, लेकिन मप्र में यह अभियान भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है। प्रदेश की कई पंचायतों ने तो शौचालय बनाने का बजट ही हजम कर लिया और वहां के लोग आज भी खुले में शौचालय जाने को मजबूर हैं। अगर प्रदेश में हाल ही में पंचायत चुनाव नहीं होते तो शौचालय बनाने के नाम पर भ्रष्टाचार चलता रहता और निर्मल भारत की तस्वीर कागजों पर संवरती रहती। लेकिन पंचायत चुनाव के दौरान तत्कालीन सरपंचों की पोल खोलने के लिए प्रदेशभर में जिस तरह भंडाफोड़ अभियान चला उससे सारी हकीकत सामने आ गई। सबसे पहले निर्मल भारत अभियान में भ्रष्टाचार का बड़ा मामला सतना जिले की आदिवासी बहुल्य मझगवां जनपद की 76 ग्राम पंचायतों में सामने आया। यहां विभिन्न वित्तीय वर्षों के दौरान 18 हजार 316 शौचालयों के निर्माण के लिए बतौर अनुदान दी गई 6 करोड़ 96 लाख 56 हजार रुपए की भारी भरकम रकम में से 1 करोड़ 66 लाख 60 हजार रुपए की राशि का डंके की चोट पर दुरुपयोग हुआ। गबन की शिकार यह वह रकम है जो सरंपच और सचिवों ने काम स्वीकृत नहीं होने के बाद भी बैंक खातों से निकाल ली गई। अब इस रकम की भरपाई के लिए प्रशासन को पसीना आ रहा है। हालांकि देर से ही सही भ्रष्टाचार की खबर सामने आने के ग्रामीण विकास विभाग ने प्रदेश की 23000 पंचायतों में निर्मल भारत अभियान के तहत भेजी गई करीब 475 करोड़ की राशि वापस बुला ली है। इस अभियान के तहत गांवों में शौचालय और अन्य विकास कार्य होने थे पर चुनाव के दौरान इस राशि में भ्रष्टाचार होने की शिकायतों के चलते यह कदम उठाया गया है। उल्लेखनीय है कि 7 साल के अंदर पूरे देश में खुले में शौच की परंपरा के सफाए के केंद्र सरकार के संकल्प के साथ शुरु किया गया निर्मल भारत अभियान मप्र में जमीनी स्तर पर भारी भ्रष्टाचार के दलदल में फंस कर रह गया है।
एनबीए में गबन की ऐसे खुली पोल
निर्मल भारत अभियान में सतना जिले में करोड़ों के घोटाले की पोल तब खुली जब जिला पंचायत के तबके मुख्य कार्यपालन अधिकारी(सीईओ)अभिजीत अग्रवाल ने जिले के सभी जनपदों के सीईओ को निर्देश देकर इस आशय के ब्यौरे तलब किए कि निर्मल भारत अभियान(एनबीए)के तहत शौचालय निर्माण में राशि आहरण (व्यय),मूल्यांकन उपियोगिता और कार्यपूर्णता की अद्यतन स्थिति क्या है? जब रिपोर्ट सामने आई तो पता चला कि निर्मल भारत मद में केंद्र से आए अनुदान में करोड़ों का गोलमाल हुआ है। अकेले मझगवां जनपद की 76 पंचायतों में बगैर काम के 1 करोड़ 66 लाख 60 हजार रुपए की राशि निकाल ली गई। जिला पंचायत के सीईओ को कमोबेश सभी जनपद सीईओ की ओर से भेजे गए प्रतिवेदनों में भी इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि निरंतर फोन पर,भ्रमण के दौरान, लिखित-मौखिक और बैठकों में भी सरपंच-सचिवों से अद्यतन रिपोर्ट मांगी गर्इं लेकिन प्रतिवेदन नहीं मिले। ज्यादातर जनपद सीईओ ने भी अपनी रिपोर्ट में माना है कि अनुदान राशि का निजी मद में दुरुपयोग करते हुए ऐसी गंभीर अनियमितताएं की गर्इं जो गबन की श्रेणी में आती हैं।
सतना जिला कलेक्टर संतोष मिश्रा कहते हैं, त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में आऊट स्टैंडिंग पर नोड्यूज (एनओसी)की बाध्यता के चलते हालांकि काफी हद तक धांधली में फंसी यह रकम रिकवर हुई है। उन्होंने बताया कि चुनाव के बहाने तकरीबन 9 करोड़ की रिकवरी हुई है। कलेक्टर ने भी माना कि वसूली की यह रकम पर्याप्त नहीं है। कलेक्टर ने कहा कि सीईओ जिला पंचायत और जनपदों के सीईओ तथा एसडीएम को जल्द ही इस मामले में अभियान चला कर वसूली कराए जाने के निर्देश दिए जाएंगे। जरुरत पड़ी तो गबन के आरोपी सरपंच और सचिवों के खिलाफ एफआईआर करा कर मामले पुलिस को भी सौंपे जाएंगे। उन्होंने कहा कि कार्यवाही तो ऐसी की जाएगी जो नजीर बने। सतना जिला पंचायत की मुख्यकार्यपालन अधिकारी और अपर कलेक्टर (विकास)सूफिया फारुखी बताती हैं, कि निर्माण एवं विकास तथा अन्य मदों पर बकाया रिकवरी और सरकारी धन के दुरुपयोग मामले में किसी भी प्रकार की आऊट स्टैंडिंग पर जनपद के सभी सीईओ को जीरो रिकवरी का टारगेट देते हुए कड़े निर्देश दिए गए हैं। उनसे अब इस आशय के सर्टिफिकेट भी लिए जा रहे हैं। भ्रष्टाचार के मामलों में आरोप सिद्ध होने पर सख्त कार्यवाही और वसूली का भी सिलसिला शुरु हो गया है। शौचालय निर्माण में सरकारी राशि के दुरुपयोग पर जनपद सीईओ के प्रतिवेदन को गंभीरता से लिया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि निर्मल भारत अभियान के तहत केंद्रीय अनुदान के भुगतान के तहत रकम जिला पंचायत द्वारा आरटीजीएस के माध्यम से जनपदों के जरिए सीधे पंचायतों के खाते में भेजी जाती है। पंचायतों के इन बैंक खातों का संचालन साझा तौर पर सरपंच और सचिव करते हैं। सरपंच और सचिवों की साठगांठ के कारण ही जिले में भारी पैमाने पर गफलत हुई।
सतना जिले के मझगवां जनपद में निर्मल भारत अभियान के तहत भ्रष्टाचार का मामला सामने के बाद से तो जैसे भ्रष्टाचार की बाढ़ आ गई। एक-एक कर कई जिलों की रिपोर्ट सामने आते ही पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने जब प्रदेशभर के पंचायतों की प्रोग्रेस रिपोर्ट का जायजा लिया और उससे मैदानी रिपोर्ट का मिलान किया तो उसमें अरबों रूपए के भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है।
मुरैना जिले में 2003 में ग्राम पंचायतों के माध्यम से गांव-गांव सर्वे कराकर कुल तीन लाख 76 हजार 398 परिवारों को इस योजना के लिए चुना गया था। इन सभी के लिए 2018 तक शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा गया था। आज 12 साल होने को हैं लेकिन अब तक जिले में कुल एक लाख 49 हजार 195 शौचालय ही बन सके हैं। भौतिक सत्यापन में इनमें से कितने काम करते मिलेंगे यह जांच का विषय है। अपने शुरुआती साल से ही यह अभियान कभी अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सका। 2013-14 के जो आंकड़े उपलब्ध हैं उनमें उस साल 122 ग्राम पंचयातों में 35267 शौचालय बनाए जाने थे जिनमें से 22017 को मंजूरी मिली। उनमें से भी पूरे साल में कुल 9672 यानी लगभग 27 फीसदी शौचालय ही बन सके। इस वित्तीय वर्ष के लिए 63437 शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा गया लेकिन अब तक कुल 3380 शौचालय बन सके हैं। कागज पर दर्ज आकड़ों की अपेक्षा शौचालयों की मैदानी स्थिति ज्यादा खराब है। बने हुए शौचालयों में से ज्यादातर अनुपयोगी हैं उनकी दीवारें अधूरी हैं उनसे छत गायब हैं कमोड मिट्टी में दवा दिया गया है उसका किसी सैप्टिक टैंक से कनेक्शन ही नहीं है। पानी की कैसी भी कोई सुविधा नहीं है ऐसे हजारों आधे शौचालय पूरे जिले में मौजूद है। जिनके घर में शौचालय बने हैं उन्होंने अपना 900 रुपए का अंशदान बचा लिया तो बाकी पैसा ठेकेदार, पंच, सरपंच और इस योजना की देखरेख करने वाली एजेंसी जिला पंचायत के अधिकारी-कर्मचारी खा पी गए। लोग आज भी खुले में शौच कर रहे हैं।
पंचायतों तक नहीं पहुंचा मर्यादा का अभियान
सीधी जिले के विभिन्न विकासखण्डों में स्थित ग्राम पंचायतों में से अधिकांश ग्राम पंचायतें ऐसे है जिनके प्रतिनिधियों के घर में शौचालय का निर्माण नहीं कराया गया है। इसके बावजूद भी प्रशासनिक अधिकारी ऐसे पंचायत प्रतिनिधि के विरूद्ध पद से पृथक करने की कार्यवाई नहीं कर पाए हंै। उल्लेखनीय है कि वातावरण स्वच्छ रखने एवं खुले मैदान में शौचक्रिया से रोकने के उद्देश्य से सरकार तरह-तरह के कार्यक्रम तैयार करती रही है। निर्मल ग्राम योजना, निर्मल वाटिका, समग्र स्वच्छता एवं मर्यादा अभियान जैसी योजनाओं को लागू कर चुकी है ताकि किसी न किसी माध्यम से गरीब व्यक्ति भी शौचालय का निर्माण करा सके। मप्र पंचायत राज अधिनियम 1993 के अनुसार पंचायत प्रतिनिधि घोषित होने के 6 माह अवधि तक संबंधित प्रतिनिधि के घर शौचालय का निर्माण कराना आवश्यक है इसके बाद भी जिले के अधिकांश जनप्रतिनिधि अब तक शौचालय का निर्माण नहीं करा सके हंै। ऐसे प्रतिनिधियों के विरूद्ध प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा पद से पृथक करने संबंधी कोई कार्यवाई करना तो दूर रहा इस संबंध में नोटिस तक जारी नहीं की जा रही है।
जिला प्रशासन की लापरवाही का ही परिणाम है कि जिले की 60 फीसदी ग्राम पंचायतें ऐसी है जहां पर योजना लागू होने के 12 वर्ष बाद भी शौचालय निर्माण कराने के लिए सरपंच-सचिव द्वारा विचार तक नहीं किया जा रहा है। खासतौर पर रामपुर नैकिन विकासखण्ड अंतर्गत ग्राम पंचायतों झगरी, गुजरेड़, अमिलहा, खड्डीकला, मोहनी रतवार, पैपखरा, सतोहरी सहित 50 ग्राम पंचायतों के पंचों के घरों में शौचालय का निर्माण अब तक नहीं हो सका है। इसी तरह जनपद सीधी अंतर्गत ऐंठी, खिरखोरी सहित दर्जनों ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि खुले मैदान में शौचक्रिया करने के लिए मजबूर हैं। साथ ही जनपद पंचायत मझौली, सीधी एवं जनपद पंचायत कुसमी की दर्जनों ग्राम पंचायतों में यही हालत बनी हुई है। जबकि जनपद पंचायत सिहावल की अधिकांश ग्राम पंचायतों में शौचालय निर्माण की कार्यवाही प्रक्रियाधीन बताई जा रही है।
पंचायत प्रतिनिधियों को शौचालय निर्माण कराने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा कड़े निर्देश नहीं दिए जा रहे है और न ही शौचालय न बनवाने वाले पंचों एवं जनपद सदस्यों को पद से पृथक करने की कार्यवाही संबंधी जानकारी ही दी जाती है। यही वजह है कि पंचायत प्रतिनिधि शौचालय निर्माण कराने का विचार तक नहीं बना पा रहे है। पंचायत राज अधिनियम में भले ही प्रतिनिधियों को शौचालय का निर्माण कराना अनिवार्य बताया गया है लेकिन प्रशासनिक अधिकारी इस नियम को कभी भी महत्व नहीं दिए। यही वजह है कि जिले के सैकड़ा भर पंच एवं जनपद सदस्यों सहित सरपंचों के घर में शौचालय नही ंबन पाए हैं और न ही इसके बाद कोई कार्यवाई ही की गई। प्रशासनिक अधिकारी अधिनियम में वर्णित निर्देशों को नजर अंदाज करते रहे है। जिला पंचायत के मर्यादा अभियान शाखा में अब तक यह जानकारी उपलब्ध नहीं है कि जिले की किन-किन ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों के घरों में शौचालय बने हैं या नहीं बनाए गए हैं। संबंधित शाखा से बताया जाता है कि अधिकांश प्रतिनिधियों के घरों में शौचालय नहीं बने हैं। बावजूद इसके पद से पृथक करने की कार्यवाई करना आवश्यक नहीं माना जा रहा है।
खंडवा में शौचालय निर्माण के नाम पर बड़ा घोटाला
एक ओर जहां प्रधानमंत्री द्वारा देश में स्वच्छ भारत का सपना लेकर भारत निर्माण अभियान चलाया जा रहा हैं जिसमें देश के प्रत्येक गांव को भी जोड़ा गया हैं। वही दूसरी ओर उनके इस सपने को योजना को अमलीजामा पहनाने वाले अधिकारियों द्वारा धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा हैं। वैसे तो इस योजना को मूर्त रूप देने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं लेकिन इन योजनाओं में केवल भ्रष्टाचार ही पनप रहा हैं। ऐसा ही एक मामला खंडवा जिले के विकासखंड खालवा, हरसूद का हैं जिसमें निर्मल भारत अभियान एवं मनरेगा योजनान्तर्गत तैयार की गई मर्यादा उपयोजना अंतर्गत निर्माण किए जा रहें हैं शौचालयों का हैं।
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अनुसार शौचालय निर्माण के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। जिसमें व्यक्तिगत पारिवारिक शौचालय निर्माण हेतु प्रोत्साहन राशि 4600 रूपए का प्रावधान निहित था। जिसमें केन्द्रांश 3200 रूपए एवं राज्यांश 1400 रूपए एवं हितग्राही का अंशदान 900 रूपए उल्लेखित था। मनरेगा से अंशदान के रूप में 4400 रूपए निर्धारित किए गए हैं। कुल मिलाकर घरेलू शौचालय की लागत 9900 रूपए भारत सरकार एवं मप्र शासन की सहमति से तय हुई थी। मनरेगा योजना से अकुशल श्रम हेतु 20 मानव दिवस हेतु 2640 रूपए एवं मिस्त्री, प्लंबर, मेट की मजदूरी एवं प्रोत्साहन राशि 1760 रूपए शामिल हैं। 5 दिवस मिस्त्री के लिए 1460 रूपए एवं 300 रूपए मेट प्रोत्साहन राशि का निर्देशन शासन स्तर से किया गया था। निर्मल भारत अभियान से सामग्री हेतु 4600 रूपए का प्रावधान था। जिसमें 900 रूपए हितग्राही का अंशदान मिलाकर यह आकलन 5500 रूपए किया गया था। कुल मिलाकर शौचालय हेतु 9900 रूपए निर्माण हेतु प्राक्लन राज्य स्तर पर तैयार करके ड्राईंग एवं मार्गदर्शन शासन के पत्र के साथ प्राप्त होने के साथ दिशा-निर्देश दिए गए थे। भ्रष्टाचार से जुडे इस गंभीर मामले को शिकायतकर्ता गोपाल राठौर द्वारा पंचायतो के निरीक्षण के दौरान नियम विरूद्ध बनाए गए जर्जर शौचालयों को देखने के बाद प्रकाश में लाया गया है। जिला दर अनुसूची अनुसार कार्यपालन यंत्री द्वारा मानक प्राकलन तैयार करके जिला कार्यक्रम समन्वयक के माध्यम से सभी पंचायतों को उपलब्ध कराए गए थे जिसे तकनीकी स्वीकृति मानकर कार्य करवाए जाने के दिशा निर्देश जारी किए गए थे।
तकनीकी दिशा निर्देशों के अनुसार कार्य में ईंट की चुनाई करके छत पर एसी सीट का प्रावधान, 2 लीच पीट की जालीदार चिनाई सीमेंंट मसालों से करना थी। साइड में एक पानी की टंकी जो कि ईंट से निर्मित की जाना थी। पूरे शौचालय को प्लास्टर करना था। एक दरवाजा बिना चौखट का लगाने के अलावा पानी की टंकी में पाईप व दो टोटी लगाना था।
जनपद खालवा के सीईओ सौरभ सिंह राठौर ने शासन के दिशा-निर्देशों का पालन न करते हुए मनमाने ढंग से सचिवों पर बाह्य एजेंसियो को भुगतान करने के लिए दबाव बनाया। खालवा अंतर्गत रेडीमेड शौचालय प्रदाय करवाए गए। ग्राम पंचायत रोशनी, मलगांव में इस तरह के शौचालय हितग्राहियों को प्रदाय किए गए हैं जिनकी वर्तमान स्थिति दयनीय हैं। इन शौचालयों के निर्माण में लोहे की 20 एमएम पतली चादर, प्लेन एसी सीट को फेब्रिकेशन वर्क करके नट बोल्ट के माध्यम से कसा गया हैं। इसमें लोहा सरिया कुछ भी नही लगाया हैं। एसी सीट भी छत की मानकों के अनुसार नहीं हैं। कुल मिलाकर बाह्य एजेंसियों द्वारा प्रदाय किए गए शौचालयों में मनरेगा के मार्गदर्शी दिशा निर्देशों की पूर्ति नहीं होती हैं। योजना के मार्गदर्शी सिद्घांतो से हटकर बिना जिला पंचायत एवं कलेक्टर से अनुमोदन लिए बिना ही एनजीओ से इन शौचालयों को ग्राम पंचायतों में प्रदाय करवाया गया हैं। जो कि शासन के दिशा-निर्देशो के विपरीत है।
राशि की गई बंदरबाट
ग्राम पंचायत स्तर पर प्रत्येक शौचालय हेतु अकुशल श्रम के तौर पर 2460 रूपए के फर्जी मस्टर भरे गए हैं और मिस्त्री, प्लंबर के नाम से भी 1760 रूपए के फर्जी बिल लगाकर राशि का आहरण किया गया हैं। ग्राम पंचायतों को मानकों से हटकर प्रदाय किए गए शौचालय की बाजार कीमत एवं दर अनुसूची से भी प्राकलन बनवाया जाए तो इस शौचालय पर 5400 रूपए से ज्यादा खर्च नहीं होगा। इस तरह मनरेगा के सिद्घांतों से हटकर राशि की बंदरबांट जनपद स्तर पर सीईओ सौरभसिंह राठौर द्वारा की गई है। भ्रष्टाचार से जुडे इस गंभीर मामले मेंं शिकायतकर्ता गोपाल राठौर द्वारा बताया गया कि इस सारे मामले की शिकायत संभागायुक्त इंदौर, अपर सचिव पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, जिला पंचायत के सीईओ से भी की गई हैं। जिसमें जिला पंचायत सीईओ द्वारा इस संबंध में कलेक्टर द्वारा दल गठित कर जांच करने की बात कही गई।
कागजों पर बना दिए शौचालय
इसी तरह रहली में भी निर्मल भारत अभियान में भ्रष्टाचार सामने आया है। शासन की इस महत्वपूर्ण योजना को निर्माण एजेंसी द्वारा जमकर चूना लगाया जा रहा है। रहली ब्लाक में शौचालयों का निर्माण पंचायतों के माध्यम से किया जा रहा है लेकिन अधिकांश पंचायतों में राशि का दुरूपयोग कर शासन की मंशा पर पानी फेरा जा रहा है। निर्मल भारत अभियान में लाखों का घोटाला प्रमाणित होने के बाद भी संबंधित अधिकारियों द्वारा दोषियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही नहीं कि जा रही है, सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाकर औपचारिकता पूरी की जा रही है। ब्लाक के दस सरपंचो एवं सचिवों द्वारा शौचालयों के निर्माण की लाखो रूपए की राशि आहरित कर शौचालयों का निर्माण नहीं कराया गया है। जनपद द्वारा कई बार सरपंच-सचिव को नोटिस जारी किए गए परन्तु इसके खिलाफ कार्यवाही नहीं किया जाना संदिग्ध है। विभागीय सूत्रों के अनुसार इस गडबडी में संबंधित अधिकारी भी भागीदार है और इसी कारण सरपंचों सचिवों पर कार्यवाही नहीं की जा रही है। ब्लाक की इकलौती पंचायत जरिया खिरिया के सरपंच सचिव पर ही एफआईआर दर्ज कराई गई है बाकी दोषी सरपंचों पर कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही इसका जबाब देने को कोई तैयार नहीं है।
ग्राम पंचायत सागौनी बुदेला, खैराना, रमखिरिया, चौका गढाकोटा, बोरई, बसारी, उदयपुरा, छपरा, पटना बुर्जग के सरपंचो-सचिवो को लगभग डेढ़ माह पूर्व नोटिस जारी कर सात दिवस के अंदर राशि जमा करने के निर्देश जारी किए गए थे। राशि जमा नहीं करने पर एफ आईआर दर्ज करने की चेतावनी दी गई थी परन्तु सरपंचो-सचिवों द्वारा समय सीमा गुजर जाने के बाद भी न तो राशि जमा कराई गई है और ना ही शौचालयों का निर्माण कराया गया है। उक्त पंचायतों में पांच-पांच लाख रूपए से अधिक का फर्जीवाड़ा किया गया है। समग्र स्वच्छता अभियान के ब्लाक समन्वयक अनुपम सराफ का कहना है कि नोटिस के बाद भी सरपंच-सचिवों ने राशि जमा नहीं कराई है। सब इंजीनियार के साथ मौका मुआयना कर रिपोर्ट तैयार की जा रही है शीघ्र ही एफआईआर दर्ज कर कार्यवाई की जाएगी।
सरकार ने पंचायतों से वापस मंगाई राशि
प्रदेश में यह अपनी तरह का पहला मामला है जब एक बार राशि आवंटित होने के बाद सरकार ने उसे वापस बुलाया है। अब गांवों में होने वाले कामों का फिर से सर्वे कराकर यह राशि दी जाएगी। गौरतलब है कि प्रदेश सरकार इस समय स्वच्छता अभियान पर खासा जोर दे रही है। सरकार ने गांवों में रहने वाले गरीब लोगों को घरों में शौचालय बनवाने के लिए बीपीएल कार्डधारकों को 12 हजार रुपए देने का तय किया है। इसके अलावा प्रत्येक ग्राम में सार्वजनिक शौचालय बनवाने की भी सरकार की योजना है। पिछले महीने 475 करोड़ की राशि ग्राम पंचायतों के लिए जारी की गई थी। यह राशि ग्राम पंचायतों में पहुंचते ही सरपंच इस राशि से शौचालय बनवाने की जगह दूसरे कामों में खर्च करने लगे। इसकी भनक जैसे ही पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव को लगी उन्होंने सभी जिला पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को निर्देश दिए कि सात दिन के भीतर सभी पंचायतों से सख्ती से राशि बुलाकर उसे सरकारी खजाने में जमा किया जाए। मंत्री के आदेश मिलते ही सीईओ सक्रिय हुए और पंचायतों से राशि वापस बुला ली। अब यह राशि जिला पंचायतों के खाते में जमा है। सतना कलेक्टर संतोष मिश्रा कहते हैं कि रिकवरी की एनओसी की बाध्यता के अच्छे नतीजे आए हैं। अकेले शौचालय निर्माण मद में फंसी 9 करोड़ रुपए की वसूली कराई गई है। पर यह रकम पर्याप्त नहीं है। जल्द ही सख्त अभियान चला कर दोषियों से वसूली की जाएगी। जरुरत पड़ी तो पुलिस कार्यवाही भी की जाएगी।
विभाग के आदेश के बाद भी राशि न लौटाने वाली एक सौ दस पंचायतों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही की तैयारी कर ली गई है। इन पंचायतों को आरआरसी के तहत रिकवरी के नोटिस जारी किए गए हैं। नोटिस के बाद भी राशि न लौटने पर सरपंच की सम्पत्ति की कुर्की कर राशि वसूल की जाएगी।
पैसों का पॉवरप्ले बनी पंचायतें
मध्य प्रदेश पहला राज्य है, जहां संविधान संशोधन के बाद सबसे पहले पंचायत चुनाव कराए गए थे। कभी पिछड़े एवं वंचित वर्ग के राजनीतिक एवं सामाजिक सशक्तीकरण को लेकर चर्चित हुईं, सूबे की पंचायतें अब आर्थिक अनियमितता एवं भ्रष्टाचार को लेकर चर्चा में हैं। स्थानीय निधि संपरीक्षा द्वारा पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के प्रमुख को सौंपी गई समेकित ऑडिट रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि पंचायतें न तो ऑडिट कराने में रुचि ले रही हैं, न ही इसमें सहयोग कर रही हैं। यहां तक कि हिसाब-किताब रखने की जिम्मेदारियों से भी बच रही हैं। ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि पंचायतों में करोड़ों की अनियमितता हुई है। रिपोर्ट में साफ-साफ कहा गया है, 'अधिकतर जगहों पर मनरेगा के अभिलेख स्थानीय निधि संपरीक्षा विभाग को अंकेक्षण के लिए उपलब्ध नहीं कराने से शासन की इस सबसे महत्वपूर्ण एवं महत्वकांक्षी योजना का विधिवत अंकेक्षण संपादित नहीं हो पा रहा है।Ó
शुरुआती दौर में आर्थिक मामलों में पंचायतों के अधिकार सीमित थे, पर पिछले कुछ साल से पंचायतों के जरिए करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। मनरेगा आने के बाद पंचायतों में पैसों का प्रवाह बहुत तेजी से बढ़ा है, पर ग्राम पंचायतों की ऑडिट स्वंतत्र एजेंसियों से कराने का प्रयास कभी नहीं किया गया। 11वें वित्त आयोग की अनुशंसा के बाद, आखिरकार सूबे के वित्त विभाग को ग्राम पंचायतों एवं ग्राम कोषों का ऑडिट नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के पर्यवेक्षण में स्थानीय निधि संपरीक्षा के जरिए कराने का आदेश निकालना पड़ा। इस आदेश के बाद स्थानीय निधि संपरीक्षा ने ग्राम पंचायतों एवं ग्राम कोषों के अलावा जिला एवं जनपद पंचायतों की भी ऑडिट शुरू की। एक ओर, राज्य में ऑडिटरों की भारी कमी है, जिसकी वजह से सभी पंचायतों की ऑडिट संभव ही नहीं है, तो दूसरी ओर कई पंचायतें ऑडिट में सहयोग ही नहीं करना चाहतीं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरूण यादव कहते हैं, 'यदि प्रदेश के सभी पंचायतों की ऑडिट हो तो वित्तीय अनियमितताओं के जो मामले सामने आएंगे, उनमें अरबों रुपये के भ्रष्टाचार का खुलासा होगा। सरकार का विकास से कोई लेना-देना नहीं है। वह यात्राओं में उलझी हुई है। इसका फायदा मैदानी अमला उठा रहा है। विकास कार्यों एवं मनरेगा के लिए मिलने वाली राशि में भारी भ्रष्टाचार हो रहा है।Ó
पंचायतों में 9,388 लाख का अनियमित भुगतान
प्रदेश की पंचायतें भ्रष्टाचार एवं अनियमितता का ठीहा बन गई हैं। त्रिस्तरीय पंचायतों में कुल 9,388 लाख 12 हजार रुपए का अनियमित भुगतान किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 'ऐसे समस्त भुगतान, जो कि स्थापित नियमों के विपरीत किए गए हैं, अनियमित भुगतान हैं।Ó ग्राम पंचायतों में अनियमित ऑडिट आपत्तियों की संख्या 17,178 है, जिसमें 8,944 लाख 89 हजार रुपये का अनियमित भुगतान हुआ है। इस मामले में पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव के क्षेत्र-सागर संभाग में सबसे ज्यादा 3,404 लाख 76 हजार रुपए का अनियमित भुगतान हुआ है। जनपद पंचायतों में 408 लाख 64 हजार रुपए का अनियमित भुगतान एवं जिला पंचायतों में 34 लाख 59 हजार रुपए का अनियमित भुगतान हुआ है। अनियमित भुगतान की वजह से भ्रष्टाचार की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। पंचायतों में 41.15 लाख रुपए के गबन का मामला सामने आया है। इसमें सरपंच एवं सचिव ने मिलकर कई तरह की तिकड़में लगाईं। गबन के सबसे अधिक मामले इंदौर एवं ग्वालियर संभाग में उजागर हुए हैं। 50 जिला पंचायतों में से महज आठ का अंकेक्षण होने से, गबन का एक प्रकरण सिर्फ रीवा से सामने आया है।
ग्राम पंचायतों द्वारा 16,733 लाख 78 हजार रुपए की अनुदान राशि खर्च ही नहीं की गई। इस मामले में जनपद एवं जिला पंचायतों की भूमिका नकारात्मक रही है। रिपोर्ट में टिप्पणी की गई है, 'केंद्र एवं राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान राशि का उपयोग न हो पाना अत्यंत गंभीर बात है, क्योंकि यह राशि 'राज्य के सर्वांगीण विकासÓ के लिए है। राशि का उपयोग नहीं होने का प्रमुख कारण त्रिस्तरीय पंचायती राज की प्रमुख संस्था जिला एवं जनपद पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों द्वारा अनुदान राशि को समय से ग्राम पंचायतों को उपलब्ध नहीं कराना एवं ग्रामीण यांत्रिकी विभाग के अधीन तकनीकी सेवाओं के लाभ को ग्राम पंचायत एवं ग्राम सभा स्तर तक नहीं पहुंचाया जाना है।Ó इस मामले में भी पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री का क्षेत्र-सागर संभाग आगे है, जहां 6,423 लाख 58 हजार रुपए की अनुदान राशि खर्च नहीं हो पाई। जनपद पंचायत, अनुदान राशि ग्राम पंचायतों को देने के बजाए ब्याज प्राप्ति के लिए खातों में रखते हैं, इसे अत्यंत आपत्तिजनक माना गया है। इन कमियों को छुपाने के लिए जिला पंचायतों ने ऑडिट के लिए मेमो का उत्तर देना तक मुनासिब नहीं समझा।
पंचायतों ने नियम के विपरीत जाकर अग्रिम भुगतान करने में भी दिल खोलकर उदारता दिखाई। इस कारण 716 लाख 88 हजार रुपए अवशेष अग्रिम राशि है। कई निकायों में यह 20-25 साल से लंबित है। ग्राम पंचायतों की वित्तीय एवं कार्य अनियमितता के कारण 132.29 लाख रुपए की राजस्व की हानि भी हुई है। ग्राम पंचायतें नियम के विपरीत जाकर अपने को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा रही हैं। यह भी देखने में आया है कि व्यय करने के मामले में पंचायतें नियमों से परे जाकर बड़े पैमाने पर खर्च कर रही हैं, जो कि एक तरह का भ्रष्टाचार ही है। व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाकर भी जनपद पंचायतों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
अब एमएफएस के जरिए होगा पैमेन्ट
ग्रामीण विकास विभाग ने तय किया है कि अब निर्मल भारत अभियान के पूरे कार्यक्रम की फिर से समीक्षा की जाएगी। इसके बाद ही राशि जारी की जाएगी। यह भी तय किया गया है कि राशि पंचायतों को देने के बजाए अब इलैक्ट्रानिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम (एमएफएस) के जरिए सीधे हितग्राही के खाते में शौचालयों के निर्माण के लिए दी जाएगी। इस राशि के तहत होने वाले अन्य कामों का उपयंत्री और पंचायत समन्वय अधिकारी भौतिक सत्यपान करेंगे इसके बाद ही अतिरिक्त राशि जारी की जाएगी। इस संदर्भ में पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव कहते हैं कि निर्मल भारत अभियान के तहत पंचायतों को दी गई राशि के भ्रष्टाचार की शिकायतें आ रही थीं। राशि का कई पंचायतें गलत उपयोग कर रही थीं। इसलिए राशि वापस बुलवा ली है, अब योजना की फिर से समीक्षा कर जारी किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्र में अब तक लगभग 63 प्रतिशत परिवार शौचालय की सुविधा से वंचित हैं। इस दिशा में कुल शौचालय विहीन परिवारों में से वर्ष 2015-16 में 20 प्रतिशत, वर्ष 2016-17 में 35 प्रतिशत एवं 2017-18 में शेष 45 प्रतिशत परिवारों को शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। संपूर्ण राज्य को 31 मार्च 2018 तक खुले में शौच से मुक्त किए जाने की कार्य योजना बनाई गई है।
1600 करोड़ की दरकार, कई योजना में पैसा नहीं
प्रदेश में दो महीने से अधिक समय तक चले पंचायत चुनावों की वजह से पंचायतों में पैसे का टोटा पड़ गया है। विभिन्न कार्यो सहित कई योजनाओं में बजट जारी करने पर लगाई गई रोक के कारण अब पंचायतों को 1600 करोड़ की दरकार है। वैसे विभाग ने अक्टूबर-नवंबर से ही आवंटन पर रोक लगा दी थी, जबकि पंचायतों के लिए 1830 करोड़ 92 लाख रुपए का आवंटन होना था, जिसमें से पंचायतों को 230 करोड़ 71 लाख की मिल सके, जिसके कारण पंचायतों में कई योजनाओं के कार्यो पर विपरीत प्रभाव पड़ा। वित्तीय वर्ष 2014-15 के लिए राज्य सरकार ने पंचायतों के लिए 1830 करोड़ 92 लाख का बजट जारी किया था, लेकिन पंचायत चुनावों के चलते कई योजनाओं पर आवंटन रोक दिया गया। खासकर पंच-परमेश्वर योजना, मुख्यमंत्री हाट बाजार योजना, कपिल धारा योजना आदि शामिल हैं। केंद्र प्रवर्तित योजना में राज्य सरकार को 1223 करोड़ 70 लाख रुपए मिले थे, जिसमें से आवंटन 388 करोड़ का किया गया और 746 करोड़ 64 लाख रुपए की राशि की अभी दरकार है। पंचायत सचिवों का प्रशिक्षण, पंचायतराज संस्थाओं को प्रभार के मामले में 167.90 करोड़ में से 24.37 करोड़ की राशि मिल सकी। 13वें वित्त आयोग से अनुशंसित योजनाओं के लिए भी पैसा नहीं मिल सका, जबकि गौण खनिज से प्राप्त होने वाली 340 करोड़ 320 करोड़ जारी किए गए। स्टाम्प शुल्क से वसूली से मिलने वाली 342.37 करोड़ में से मात्र 46 करोड़ ही आवंटित किए जा सके और 275.83 करोड़ की राशि की पंचायतों को दरकार है, पंचायत सचिवालयों के संचालन के लिए 89 करोड़ में से 83.78 करोड़ की दरकार पंचायतों को है, जबकि अनुरक्षण के लिए अनुदान के रूप में 10 करोड़, पेयजल के लिए विद्युत व्यय की पूर्ति के लिए 40 करोड़ अटका पड़ा है। साथ ही राजीव गांधी पंचायत सशक्तिकरण योजना में मिलने वाली 72.14 करोड़ की राशि का प्रावधान तो किया गया, मगर राशि जारी नहीं की गई। अब नए वित्तीय वर्ष में इन लटकी हुई योजनाओं के लिए फंड जारी किया जाएगा।
लक्ष्य से भटक गई मप्र सरकार की मर्यादा
मध्यप्रदेश में स्वच्छता के लिए चलाए गए अभियान को भ्रष्टाचार की बुरी नजर लग गई है। इसका परिणाम यह हुआ है कि स्वच्छता के लिए स्वीकृत की गई राशि भ्रष्ट कर्मचारी हजम कर रहे हैं। निर्मल भारत अभियान से लेकर स्वच्छता अभियान तक के नाम पर बड़ी रकम केन्द्र और राज्य शासन की ओर से स्वीकृत की गई थी। परन्तु गांव शहर के गली मुहल्लों से लेकर पाठशाला तक हर तरफ आज भी पर्याप्त साफ-सफाई नजर नहीं आ रही है। 2003 में केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना को मप्र सरकार मर्यादा योजना के नाम से चला रही है उसने शौचालय बनाने का जिम्मा ग्राम पंचायतों को दे रखा है पंच-सरपंच मिलकर गरीबों के इन शौचालयों की दीवारें, छतें, पानी की टंकियां कमोड सैप्टिक टैंक और मौका लगा तो पूरा का पूरा शौचालय ही डकार गए हैं। गांवों में मौजूद ऐसे आधे-अधूरे शौचालयों के अवशेष इस योजना में फैले भ्रष्टाचार को उजागर करते हैं इनमें से ज्यादातर कंडे या भूसा भरने के काम में आ रहे हैं। जिनके पास पैसे थे या जिन्हें शौचालय की जरूरत थी उन्होंने अपने पैसे लगाकर ऐसे आधे-अधूरे शौचालयों को उपयोगी बना लिया है।
पूरी दुनिया में खुले शौच के लिए होने वाली बदनामी से परेशान भारत सरकार ने 2003 में समग्र स्वच्छता अभियान के नाम से गरीबी की रेखा से नीचे के परिवारों के कच्चे-पक्के घरों में शौचालय बनाने की योजना शुरू की थी। सरकार इन बीपीएल परिवारों को घर में शौचालय बनाने के लिए 500 रुपए की प्रोत्साहन राशि देती थी जो धीरे-धीरे बढ़कर 1200 रुपए और 2012 तक 3200 रुपए कर दी गई थी। तब माना गया था कि एक छोटा सा चारदीवारों वाली एक छत एक कमोड, एक सैप्टिक टैंक, एक पानी की टंकी युक्त शौचालय 3500 रुपए में बनकर तैयार होता है। इसमें 300 रुपए का इंतजाम उस व्यक्ति को करना होता था जिसके घर में शौचालय बन रहा होता था। बाकी 3200 रुपए सरकार देती थी।
केंद्र द्वारा 2012 में इस अभियान का नाम संशोधित करके निर्मल भारत अभियान कर दिया गया। मप्र सरकार ने इसे मर्यादा अभियान के नाम से लागू किया। प्रोत्साहन राशि 3200 रुपए से बढ़ाकर 4600 रुपए हो गई साथ में मनरेगा से इसमें 4400 रुपए और जोड़े गए। हितग्राही का अंशदान बढ़ाकर 900 रुपए कर दिया गया। इस तरह शौचालय की लागत 9900 रुपए हो गई। 2014 में इसमें 1000 रुपए और बढ़ाकर 10900 रुपए कर दिया गया पहले जो योजना केवल बीपीएल परिवारों के लिए थी उसमें एपीएल, अनुजाति, अनु.जनजाति, निषक्तजन, भूमिहीन किसान, लघु सीमांत किसान परिवारों को भी इससे जोड़ दिया गया। साथ ही शौचालय निर्माण की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों को सौंप दी गई जिन्हें अपने गांव के जरूरतमंदों के घरों में उनसे 900 रुपए जमा कराकर उनके लिए शौचालय बनवाने थे। लोग 900 रुपए नगद या शौचालय निर्माण में मजदूरी करके भी अपने इस अंशदान का भुगतान कर सकते थे।
स्कूलों में शौचालय के लिए 600 करोड़ का खर्चा
मप्र के 40 हजार स्कूलों में शौचालय निर्माण एवं पुननिर्माण की तैयारियां शुरू हो गईं हैं। इसके लिए करीब 600 करोड़ रुपया खर्च किया जाएगा। सरकार कई अलग अलग माध्यमों से पैसा जुटाने की तैयारी कर रही है, शौचालय इस तरह से बनाने का प्रयास है कि मोदी के स्वच्छता अभियान में अव्वल नंबर मिल जाए। प्रदेश के शौचालय विहीन स्कूलों में अब कॉर्पोरेट सेक्टर और सरकारी कंपनियों की मदद से टॉयलेट बनेंगे। राज्य सरकार धन इकट्ठा करने के लिए मुख्यमंत्री स्वच्छता कोष बना रही है। केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम भी इस अभियान में राज्य सरकार के साथ रहे हैं। सांसद और विधायक निधि का उपयोग भी इसमें किया जाएगा। वर्तमान में राज्य के एक तिहाई सरकारी स्कूलों में टॉयलेट नहीं है या फिर उपयोग करने लायक नहीं बचे। एक रिपोर्ट के मुताबिक छात्राओं का पढ़ाई बीच में छोडऩे का एक कारण स्कूलों में टॉयलेट नहीं होना भी सामने आया है। प्रदेश में प्राथमिक से लेकर हायर सेकंडरी स्तर के स्कूलों में अभी 17, 851 टॉयलेट्स की आवश्यकता है। इनके निर्माण में लगभग तीन सौ करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसके अलावा 23,359 स्कूलों में बने टॉयलेट उपयोग में नहीं आते। इनके पुनर्निर्माण पर लगभग 260 करोड़ रुपए खर्च संभावित है। केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा मध्यप्रदेश में सीएसआर (कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) के अंतर्गत 13363 शौचालयों के निर्माण पर सहमति दे दी है। स्कूल शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार कोल इंडिया लिमिटेड, नेशनल हाइड्रो पॉवर कॉरपोरेशन, गेल, एनटीपीसी आदि ने स्कूलों का चयन भी कर लिया है। केंद्र सरकार के कुछ मंत्रालयों ने भी इसमें रुचि दिखाई है।
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