शुक्रवार, 15 मई 2015

ऐसे में तो हाउसिंग बोर्ड और बीडीए में डल जाएगा ताला

6,000 करोड़ का देना होगा मुआवजा
भोपाल। नए भूमि अधिग्रहण कानून के चलते भोपाल विकास प्राधिकरण के साथ-साथ हाउसिंग बोर्ड जैसी संस्थाओं में भी ताले डलने की नौबत आ गई है। प्राधिकरण की तमाम योजनाओं में विकास कार्य ठप पड़े हैं और अनुबंधित जमीनें भी हासिल नहीं हो पा रही, क्योंकि किसानों के साथ-साथ अन्य जमीन मालिकों ने समय सीमा में विकसित भूखंड न मिलने पर अब दो से चार गुना नकद मुआवजे की मांग शुरू कर दी है। प्राधिकरण की योजनाओं में लगभग 5 हजार एकड़ जमीन अधिग्रहित की जाना है और नए कानून के मुताबिक इनका नकद मुआवजा 6 हजार करोड़ रुपए से अधिक बनता है जो प्राधिकरण किसी सूरत में चुका नहीं सकता, जिसके चलते आने वाले दिनों में प्राधिकरण ही ठप हो जाएगा। यही स्थिति हाउसिंग बोर्ड से लेकर अन्य योजनाओं और एकेवीएन व उद्योग विभाग की भी रहेगी, क्योंकि वे भी भारी-भरकम नकद मुआवजा देकर जमीनें नहीं अधिग्रहित कर पाएंगे। 5 अप्रैल को अध्यादेश की अवधि समाप्त हो रही थी, उसके पहले उसे दोबारा मंजूरी देकर और 6 महीने का समय ले लिया ताकि राज्यसभा से इसे मंजूर करवाने के प्रयास किए जाएं। भोपाल में ही विकास प्राधिकरण इस नए कानून के आने के बाद से हाथ पर हाथ धरे बैठा है और जिन जमीनों का अनुबंध कर लिया गया उनके भी मालिकों और किसानों ने दो से चार गुना नकद मुआवजे की मांग शुरू कर दी। अगर कांग्रेस का ही कानून लागू रहता है तो भोपाल विकास प्राधिकरण सहित हाउसिंग बोर्ड और अन्य संस्थाओं में ताले डल जाएंगे और उद्योगों के लिए भी एकेवीएन जमीनें किसी सूरत में नहीं ले सकेगा। किसानों की मूल मांग ही यही थी कि उन्हें बाजार दर के हिसाब से मुआवजा दिया जाए, तो वे अपनी जमीनें सहर्ष देने को तैयार हैं। कांग्रेस शासन ने जो भूमि अधिग्रहण बिल 2013 लागू किया, उसमें किसानों का मुआवजा अच्छा खासा कर दिया। शहरी क्षेत्र में बाजार दर यानी गाइड लाइन से दोगुना और ग्रामीण क्षेत्र में 4 गुना तक मुआवजा देने का प्रावधान किया है। नतीजतन, मोदी सरकार ने अध्यादेश के जरिए इसके जटिल प्रावधानों को खत्म करने का निर्णय लिया। भाजपा का कहना है कि 32 राज्यों की मांग पर ये अध्यादेश लाया गया है और इसमें किसानों का मुआवजा एक रुपया भी नहीं घटाया गया है। औद्योगिक केन्द्र विकास निगम, जिसने तमाम औद्योगिक क्षेत्रों को उद्योग विकास के साथ विकसित किया है, अब उसे दिल्ली, मुंबई इंडस्ट्रीयल कॉरिडोर से लेकर पीथमपुर, बेटमा क्लस्टर और अन्य तमाम प्रोजेक्टों के लिए जमीनें चाहिए जो हासिल ही नहीं हो पा रही है। अब तक नकद नहीं, विकसित भूखंड की नीति कांग्रेस का बनाया भूमि अधिग्रहण कानून भोपाल के ही सबसे बड़े कॉलोनाइजर विकास प्राधिकरण को भारी पड़ रहा है। अभी तक भोपाल विकास प्राधिकरण जमीन मालिकों और किसानों के साथ नकद मुआवजे की बजाए विकसित भूखंड देने के अनुबंध करता रहा और यह फॉर्मूला अत्यंत कारगर भी रहा, जिसे अन्य राज्यों द्वारा अपनाए जाने की बात भी सामने आई। इसी के चलते प्राधिकरण ने जमीनें अनुबंध के जरिए लेकर सौंप दी, मगर नया कानून आने के बाद जमीन मालिकों और किसानों की भी नियत बदल गई और विकसित भूखंड की बजाय उन्होंने दो से चार गुना नकद मुआवजा मांगना शुरू कर दिया, जिसके चलते प्राधिकरण की हाल-फिलहाल की घोषित योजनाएं संकट में आ गईं। जिन किसानों ने अनुबंध कर लिए उन्होंने भी प्राधिकरण को नोटिस थमा दिए कि विकसित भूखंड नहीं चाहिए और नकद मुआवजा ही दिया जाए। 600 करोड़ की प्रापॅर्टी बेचने बोर्ड जारी करेगा विज्ञापन उधर, हाउसिंग बोर्ड ने राजधानी में काफी समय से खाली पड़ी प्रॉपटी बेचने के लिए जल्द ही विज्ञापन जारी करने की बात कही है। पूरे मप्र की बात करें तो राजधनी में विभिन्न लोकेशनों में लगभग 17 करोड़ रुपए की प्रापॅर्टी खाली पड़ी हुई है। हालांकि शहर में 7 करोड़ से अधिक की प्रापॅर्टी बोर्ड ने हाल ही में बेच दी है। अब बची हुई प्रॉपर्टी बेचने के लिए विज्ञापन जारी किया जाएगा। इसी प्रकार पूरे मप्र में विज्ञापन जारी कर 600 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी बेची जाएगी। गौरतलब है कि पूरे प्रदेश में यह प्रॉपर्टी लगभग पांच साल से खाली पड़ी हुई है। इस कारण बोर्ड को राजस्व में भी नुकसान हो रहा है। इसमें वह प्रॉपर्टी भी शामिल है, जो किराए पर चल रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, हाउसिंग बोर्ड की प्रॉपर्टी के दाम अधिक होने से कई स्थानों पर ग्राहकों ने खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। इससे बोर्ड को घाटा भी सहना पड़ा था। इस बार बोर्ड ने प्रॉपर्टी बेचने के लिए 25 प्रतिशत राशि कम की है। 25 प्रतिशत राशि कम करने से प्रॉपर्टी जल्द बिकने के आसार हैं। गौरतलब है कि हाउसिंग बोर्ड की कई योजनाएं अटकी पड़ी हुई हैं। वहीं कई योजनाओं का काम समयसीमा में पूर्ण न होने से भी घाटा उठाना पड़ रहा है। इस बार कलेक्टर गाइड लाइन के तहत भूमि के दाम न बढ़ाने से बोर्ड ने राहत की सांस ली है, क्योंकि कलेक्टर गाइड लाइन के हिसाब से बोर्ड हितग्राहियों से राशि वसूलता है, जिससे हितग्राहियों को नुकसान उठाना पड़ता है। भोपाल में खाली थी 17 करोड़ की प्रॉपर्टी पूरे प्रदेश की बात करें तो हाउसिंग बोर्ड की भोपाल में 17 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी खाली पड़ी थी। मात्र 18 दिनों में बोर्ड ने 17 करोड़ मेें से 6 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी बेच दी है। प्रॉपर्टी बेचने के लिए बोर्ड द्वारा समय -समय पर निविदाएं और ऑफर बुलाए जाते हैं। इसी के आधार पर प्रॉपर्टी बेची जा रही है। सूत्रों की मानें तो 25 प्रतिशत दाम कम करने से प्रॉपर्टी खरीदने के लिए ग्राहक भी मिल रहे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि प्रदेश में अच्छा रिस्पांस मिलेगा। कम दाम में बेची जा रही संपत्ति हाउसिंग बोर्ड ने पुरानी प्रॉपर्टी बेचने के लिए 25 प्रतिशत दाम किए हैं। दाम कम करने का फायदा बोर्ड को मिलने की संभावना है। इससे ग्राहक को फायदा है। शहर के तमाम प्राइम लोकेशन में बोर्ड की संपत्ति खाली पड़ी हुई है। दाम ज्यादा होने से ग्राहकों ने प्रॉपर्टी खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। इसलिए बोर्ड को करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ रहा था। मुख्य संपदा अधिकारी, हाउसिंग बोर्ड अखिल वर्मा कहते हैं कि हाउसिंग बोर्ड ने पूरे प्रदेश में 25 प्रतिशत राशि कम कर लगभग 600 करोड़ रुपए की प्रॉपटी बेचने का निर्णय लिया है। इसकी शुरुआत भोपाल से हो चुकी है। अन्य शहरों में जल्द ही निविदाएं बुलाई जाएंगी। हाउसिंग बोर्ड के संपत्ति अधिकारी सुनील चेलानी कहते हैं कि हाउसिंग बोर्ड ने भोपाल में 17 करोड़ रुपए की खाली प्रॉपर्टी में से 6 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी बेच दी है। उम्मीद है कि 11 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी जल्द बेच दी जाएगी। नगर तथा ग्राम निवेश में अब फाइलों की आवक बंद इधर, नगरीय विकास एवं पर्यावरण विभाग ने इस संबंध में एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है, जिसमें अब यह जिम्मा नगर निगम की कॉलोनी सेल को सौंपा गया है जहां एकल खिड़की पर अब इन प्रकरणों की फाइलों की आवक होगी और वहीं से नगर तथा ग्राम निवेश के अलावा एनओसी के लिए प्राधिकरण, नजूल, सिलिंग व अन्य विभागों को पत्र लिखे जाएंगे। इससे टाउनशिप व बहुमंजिला इमारतों से लेकर सभी तरह के अभिन्यासों की मंजूरी के प्रकरण अब सीधे नगर तथा ग्राम निवेश में जमा नहीं होंगे। उल्लेखनीय है कि जब भी इन्वेस्टर्स समिट या ऐसे आयोजन होते हैं तो उसमें एकल खिड़की यानि सिंगल विंडो का हल्ला मचाया जाता है और मुख्यमंत्री से लेकर सभी आला अफसर ये दावे करते हैं कि निवेशकों और प्रोजेक्ट लाने वालों को सारी अनुमतियां एकल खिड़की के माध्यम से ही उपलब्ध कराई जाएंगी। हालांकि भोपाल सहित पूरे मध्यप्रदेश में एकल खिड़की का दावा तो पिछले कई सालों से किया जा रहा है, मगर लाल फीताशाही के चलते ये एकल खिड़कियां भी अन्य विभागों के साथ-साथ एक अन्य खिड़की के रूप में ही जानी जाने लगी और खुद मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने इस बात को स्वीकार भी किया है कि सिंगल विंडो मीन्स वन अनदर विंडो। पिछले दिनों ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में प्राप्त प्रस्तावों और निवेशकों से सीधी चर्चा के दौरान एक नया शब्द शासन ने ईजाद किया जिसको नाम दिया ईज ऑफ डुइंग बिजनेस, जिसके चलते पूरे मध्यप्रदेश में नगर निगम क्षेत्रों में मध्यप्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम 1973 के अंतर्गत कॉलोनी के ले-आउट की विकास अनुज्ञा तथा मध्यप्रदेश नगर पालिक अधिनियम 1956 के तहत बिल्डिंग परमिशन तथा मध्यप्रदेश नगर पालिका (कॉलोनाइजर का रजिस्ट्रीकरण निवर्धन तथा शर्तें) नियम 1998 के तहत विकास की अनुमति प्रदान करने के लिए सिंगल डोर प्रणाली की व्यवस्था लागू की जाती है। नगरीय विकास एवं पर्यावरण विभाग की उपसचिव वर्षा नावलेकर ने विधिवत आदेश भी जारी कर दिया, जिसके चलते अब भोपाल के नगर तथा ग्राम निवेश कार्यालय में भी किसी भी तरह के नए अभिन्यास अथवा संशोधन या बहुमंजिला इमारतों के हाईराइज वाले प्रकरणों की फाइलें लेना बंद कर दी गई हैं। अब नगर तथा ग्राम निवेश से संबंधित सारे प्रकरणों को निगम के कॉलोनी सेल की एकल खिड़की पर ही जमा कराना होंगे। नगर तथा ग्राम निवेश में इन्वर्ट का काम बंद हो गया है और सिर्फ अभिन्यास मंजूरी के बाद उसका डिस्पेच वहां से होगा। अभी नगर निगम के कॉलोनी सेल ने एकल खिड़की का सेटअप तैयार नहीं किया है और इसकी तैयारी चल रही है। वैसे इस आदेश को लागू करने के बाद से अभी तक एक भी प्रकरण आवक नहीं हुआ है, लेकिन नगर तथा ग्राम निवेश ने अवश्य 1 अप्रैल से ही फाइलें आवक करना बंद कर दी। अब नए आदेश के तहत नगर निगम की एकल खिड़की में जमा होने वाले इन आवेदनों को अलग-अलग विभागों में भेजा जाएगा। निगम सबसे पहले नगर तथा ग्राम निवेश को फाइल भेजेगा और साथ ही इंदौर विकास प्राधिकरण से मांगी जाने वाली एनओसी के साथ-साथ सीलिंग, डायवर्शन के साथ-साथ अन्य एनओसी के लिए भी पत्र संबंधित विभागों को लिखेगा। इनमें नगर निगम क्षेत्र में विकसित होने वाली कॉलोनियों के अभिन्यास, बहुमंजिला बिल्डिंगों के आवेदन और अभिन्यास संशोधन के लिए धारा 29(1) में लिए जाने वाले आवेदन भी शामिल रहेंगे। इसके साथ ही नगरीय विकास एवं पर्यावरण विभाग ने यह भी स्पष्ट कहा है कि इन आवेदनों की समीक्षा हर 15 दिन में अनिवार्य रूप से सक्षम प्राधिकारी जो कि नगर निगम के आयुक्त होंगे, द्वारा की जाएगी, जिसमें संबंधित विभागों के अधिकारी मौजूद रहेंगे। नगर तथा ग्राम निवेश, कलेक्टर कार्यालय, प्राधिकरण और हाउसिंग बोर्ड के अधिकारियों को इसमें शामिल किया गया है। उक्त विभागों के प्रतिनिधि मध्यप्रदेश नगर तथा ग्राम अधिनियम 1973, मध्यप्रदेश नगर पालिक अधिनियम 1956 तथा मध्यप्रदेश नगर पालिक नियम 1998 के अंतर्गत प्राप्त आवेदनों पर समय सीमा में अनापत्ति व अनुज्ञा उपलब्ध कराएंगे और अगर अनापत्ति और अनुज्ञा नहीं दी जा सकती तो उसकी भी लिखित जानकारी समीक्षा बैठक में प्रस्तुत करना जरूरी रहेगा। इतना ही नहीं इन सभी कार्रवाई को ऑनलाइन करने को भी कहा गया है ताकि सभी विभागों से ऑनलाइन ही पत्राचार किया जा सके और इसकी व्यवस्था भी नगर निगम को ही करना होगी। हालांकि अभी नगर निगम भवन अनुज्ञा के नक्शे ऑनलाइन लेता है, मगर अब कॉलोनी सेल में तैयार की जाने वाली एकल खिड़की के लिए भी ऑनलाइन सिस्टम तैयार करना होगा, जिसकी तैयारी नगर निगम ने शुरू कर दी है। शासन की मंशा है कि अभिन्यास मंजूरी और भवन निर्माण मंजूरी में लगने वाले विलंंब को खत्म किया जा सके और अब ये सारी प्रक्रिया एकल खिड़की के माध्यम से ही की जाए और इससे भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगाने का दावा किया गया है, क्योंकि रियल एस्टेट के तमाम कारोबारी और निवेशक आरोप लगाते रहे हैं कि इन अनुमतियों की एवज में लाखों रुपए खर्च करना पड़ते हैं। मगर अब इन अनुमतियों की समय सीमा तय कर दी गई है और अनुमति ना दिए जाने की जानकारी भी आवेदक को लिखित में मिल जाएगी।हर 15 दिन में प्रकरणों की समीक्षा अनिवार्य एकल खिड़की पर जितने भी प्रकरण नगर निगम के कॉलोनी सेल को प्राप्त होंगे उनकी समीक्षा हर 15 दिन में करना अनिवार्य रहेगा। यह समीक्षा सक्षम प्राधिकारी जो कि नगर निगम आयुक्त होंगे, उनके द्वारा की जाएगी और इस समीक्षा बैठक में नगर तथा ग्राम निवेश, कलेक्टर कार्यालय से नजूल अधिकारी, व्यपवर्तन यानी डायवर्शन की अनुमति देने वाले एसडीओ, विकास प्राधिकरण और हाउसिंग बोर्ड के अधिकारी मौजूद रहेंगे और वे एक-एक प्रकरण के संबंध में इसी समीक्षा बैठक में जानकारी भी देंगे। सभी विभागों से ली जाने वाली एनओसी भी अब समय सीमा में प्राप्त होगी और यह भी तय किया जाएगा कि अधिनियम और नियम में जिन-जिन कार्यों के लिए समयावधि तय की गई है वह उसी प्रक्रिया के तहत हो और प्राप्त आवेदनों का निराकरण का प्रारुप संबंधित विभागों के नियमों के अधीन रहेगा।

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