हमे पता नहीं कहां हो रहा सर्वे ओलावृष्टि और बारिश से फसल बर्बाद होने के बाद तबाह किसानों को मुआवजा देने के लिए शासन और प्रशासन ने अपने-अपने स्तर पर घोषणा तो कर दिया है,लेकिन किसानों के खेतों पर सर्वे करने के लिए अभी तक कोई नहीं पहुंचा है। भोपाल जिले के कुछ गांवों का दौरा कर सर्वे के बारे में किसानों से पूछा गया तो उन्होंने ही सवाल पूछ लिया कि आखिर सर्वे हो कहां रहा है? ज्यादातर किसान कह रहे हैं कि उनके यहां सर्वे के लिए कोई नहीं आया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्देश पर कलेक्टर ने जिला प्रशासन और कृषि विभाग के अधिकारियों को ओला और बारिश में हुए नुकसान का आकलन करने के निर्देश दिए थे। उसके बाद से सर्वे शुरू हुआ है। जिला प्रशासन का दावा है कि टीमों ने क्षेत्र में सर्वे कर लिया है, लेकिन अधिकांश क्षेत्रों में टीमें नहीं पहुंचने की बात कह रहे हैं। तूमड़ा गांव के निवासी नर्मदा पटेल ने बताया कलेक्टर साहब ने कहा था कि जल्द ही टीम सर्वे करने जाएगी। क्षेत्र में हजारों एकड़ फसल तबाह हो गई है, लेकिन अभी तक कोई सर्वे करने नहीं पहुंचा। खेतों में पानी भरने से फसल खराब हो गई है, लेकिन सर्वे के लिए कोई नहीं आया। कांहासैया निवासी कमल ने बताया, एक एकड़ में गेहूं बोया था। फसल बर्बाद हो गई। पटवारी कह रहा है, गेहूं के सर्वे का निर्देश नहीं है। इसी गांव के निवासी संतोष पटेल का तीन एकड़ में बोया चना बर्बाद हो गया है। रामकेश पटेल का नौ एकड़ चना खराब हुआ है। इन्होंने बताया कि पटवारी आया था, लेकिन सर्वे किए बिना ही लौट गया। परवलिया सड़क निवासी ब्रजमोहन ने कहा कि सर्वे अभी किया गया है, जबकि फसल चार दिन बाद सूखेगी। अभी नुकसान मामूली दिख रहा है। लक्ष्मण ने बताया उनका 2.5 एकड़ चना बर्बाद हो गया, लेकिन सर्वे नहीं हुआ।अम्बिका शुक्ला ने बताया कि पटवारी को सर्वे के लिए फोन किया, तो उसने कह दिया कि आदेश नहीं मिला है। छांद निवासी राजा खान ने बताया कि उनकी दस एकड़ से ज्यादा फसल तबाह हो गई है, लेकिन अभी तक गांव में सर्वे करने कोई नहीं पहुंचा। इसी तरह जिले के ललोई,जमूसर खुर्द,आदमपुर छावनी आदि गांवों में दलहनी फसलें ओला, पानी से चौपट हो गई हैं। ओला पानी से क्षेत्र में दलहनी फसलों को सौ प्रतिशत नुकसान पहुंचा है, तो गेहूं की फसल खेतों में बिछ गई है। तिल-तिल मरती फसल देख रो रहे किसान बड़ी मेहनत से फसल बोई। देखभाल की और बारिश का पानी भरने के कारण अब फसल तिल-तिल करके सूख रही है। किसानों को पता है कि पानी सूखने तक फसल नष्ट हो जाएगी और इसके कारण उनके आंसू नहीं रूक रहे हैं। यह हाल हुजूर तहसील के कई गांवों का है। खेतों में पानी भरने से गेहूं के पौधों की जड़ें सड़ गई हैं और पत्तियां पीली पडऩे लगी हैं। किसानों का कहना है कि जड़ें सड़ गई हैं, इसलिए अब इन पौधों का सूखना भी तय है। मटर सूखी और टमाटर के पौधे काले-मटर के पौधे भी सूख गए हैं। फलियां पानी में डूबने के कारण सड़ गई हैं। उनमें कीड़े लगने लगे हैं। टमाटर और आलू के पौधे भी सूखकर काले हो गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पटवारी ने गेहूं में नुकसान न होने की बात कहकर सर्वे से इनकार कर दिया है, जबकि खेतों में अभी भी पानी भरा है। पौधे सूख रहे हैं। सब्जियों के नुकसान के लिए यह कहकर टाला जा रहा है कि सिर्फ दलहन के सर्वे का आदेश है। जिला प्रशासन का दावा है कि तहसीलदार तथा राजस्व व कृषि विभाग की टीम गांवों में जाकर नष्ट हुई फसल का सर्वे किया है। सात दिन में सर्वे पूरा करने के लिए कहा गया था। हुजूर तहसील के ग्रामीण इलाकों में हुई ओलावृष्टि के बाद तूमड़ा, र्इंटखेड़ी राजस्व सर्किल के अंतर्गत आने वाले गांवों की फसल पर सीधा असर पड़ा है। अब कैसे होगी बेटी की शादी और बेटे की पढ़ाई मौसम की मार झेल रहे किसान अब कर्ज में डूबते जा रहे हैं, खासतौर से छोटे किसानों के लिए मौसम अभिशाप बनकर सामने आ रहा है। स्थिति यह है कि किसान को फसल लगाने के लिए वर्ष में दो बार कर्ज लेना पड़ा, पहले कर्ज लेकर फसल लगाई। सोचा कि फसल आने पर कर्ज भी चुक जाएगा और घर की हालत भी बदल जाएगी, लेकिन शायद कुदरत को यह मंजूर न था और किसान की पहली फसल बारिश की भेंट चढ़ गई। कर्ज का बोझ बढ़ता गया और कर्ज को चुकाने के लिए किसान अगले सीजन पर फिर कर्ज लेकर रबी की फसल बो दी, लेकिन इस बार भी मौसम की बेरूखी किसान को भारी पड़ गई और दोबारा कर्ज लेकर किसान मुसीबतों में फंस गया। जी हां, हम बात कर रहे हैं क्षेत्र के उन किसानों की जिन्होंने कर्ज लेकर पहले खरीब की फसल बोई और अब रबी की फसल को मौसम की वजह से बर्बाद होता देख रहे हैं। ऐसे ही एक मामला जिले की बैरसिया तहसिल अंतर्गत आने वाले जमुसर खुर्द गांव निवासी लीलाराम का है। जिसने बीज और खाद के लिए कर्ज लेकर जुलाई माह में अपनी 5 एकड़ जमीन में सोयाबीन बोया लेकिन अत्याधिक बारिश की वजह से सोयाबीन की फसल खेत में ही सड़ गई और लीलाराम की उस उम्मीद पर पानी फिर गया। लीलाराम को उम्मीद थी वह फसल आने पर वह अपनी लाडली की शादी धूमधाम करेगा और अन्य बच्चों की परवरिश भी ठीक से हो जाएगी। रबी का सीजन आते ही पहले से कर्ज में डूबे लीलाराम ने एक बार फिर किसानी जुआ खेलने की सोचकर खाद,बीज खरीदने सेवा सहकारी बैंक से कर्ज ले लिया। उसने बैंक से 12 हजार रुपए खाद के नाम पर कर्ज लिया और 35 हजार रुपए फसल की लागत के लिए कर्ज ले लिया। कर्ज लेकर उसने गेहूं की बुवाई की, लेकिन बेमौसम हुई बारिश से उसकी फसल काली पड़ गई है और खेत से बीज निकलना भी मुश्किल है। लीलाराम के सामने अब घर चलाने के भी लाले पड़ गए हैं और अब ऐसे में उसकी बेटी के विवाह और पुत्र सोनू की पढ़ाई की चिंता सताने लगी है। गौरतलब हो कि सोयाबीन की फसल खराब होने पर सुखदेव के लाख प्रयासों के बाद भी उसकी जमीन का सर्वे नहीं किया गया और न ही मुआवजा संबंधी कार्रवाई की गई। इस संबंध में उसने जनसुनवाई समेत कई बार अधिकारियों के चक्कर काटे। कैसे हो बेटे का इलाज चार एकड़ की भूमि की खेती के सहारे अपने जीवन की गाड़ी चला रहे गुढारीघाट निवासी किसान भंवर लाल का कहना है कि खरीफ सीजन में बैंक से सोयाबीन की खेती के लिए 50 किलो सोयाबीन का बीज, खाद का कर्ज लेकर बोवनी की, लेकिन अधिक बारिश से फसल चौपट हो गई। पुन: हौसला करके 50 हजार का पुन: बैंक से कर्ज उठाकर इस सीजन में चनें और गेंहू की खेती की। जिसमें खराब मौसम की वजह से फसल में पाला लगने जाने से चने की फसल चौपट हो गई। उसने ने बताया कि उसका बेटा बेनी बीमारी से ग्रसित है और अब उसकी बीमारी के इलाज का भी इंतजाम नहीं है। इस तरह से देखा जा रहा है किसानों ने कर्ज लेकर फसलें बोईं लेकिन मौसम ने उनके कर्जे को चुकवाने की जगह और बढ़ा दिया। जिले में पिछले साल रबी मौसम की फसलों पर भी ओलों और अतिवृष्टि की ऐसी मार पड़ी थी कि किसानों के खेतों में चारों ओर बर्बादी फैल गई थी। गेहूं, चना और मसूर की फसलें बुरी तरह से प्रभावित हुईं और किसान तंगहाल हो गए थे। इसके बाद किसानों को खरीफ मौसम की फसलों से कुछ उम्मीद बंधी थी लेकिन लगातार बारिश से किसानों के खेतों में लगी धान, मक्का, ज्वार और सोयाबीन की फसलें पूरी तरह से चौपट हो गईं थी। किसानों को उम्मीद थी कि फसल बीमा का उन्हें लाभ मिल जाएगा लेकिन पूरा साल गुजर जाने के बाद भी राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं बच पाई है। किसानों के कर्ज की वसूली स्थगित प्रदेश सरकार ने फिलहाल ओला और बेमौसम बरसात से फसलों को हुए नुकसान के चलते 50 प्रतिशत से ज्यादा नुकसान उठाने वाले किसानों के कर्ज की वसूली स्थगित कर दी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि अल्पावधि ऋणों को मध्यावधि ऋणों में बदल दिया जाएगा और उनका ब्याज सरकार देगी। प्रभावित किसानों को खाद, बीज जीरो प्रतिशत ब्याज दर पर मिलेगा। मुख्यमंत्री का कहना है कि राज्य सरकार ने प्रभावित किसानों की मदद के लिए फौरी तौर पर 500 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। जितनी भी आवश्यकता होगी, उतनी राशि दी जाएगी। किसानों को फसल बीमा लाभ दिलवाने के लिए सभी कदम उठाए जायेंगे, जिससे नुकसान की काफी हद तक भरपाई हो सकेगी। वह कहते हैं कि पिछले साल प्रदेश में किसानों को 2187 करोड़ की राशि फसल बीमा में दिलवाई गई, जो देश में सबसे ज्यादा है। इस बार 50 प्रतिशत से अधिक नुकसान पर 15 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर और सब्जी तथा मसालों की फसलों के नुकसान पर 26 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से राहत दी जाएगी। व्यक्ति की मृत्यु पर 1.5 लाख, पशुओं की मृत्यु पर 16 हजार 500 और छोटे जानवरों की मृत्यु पर 10 हजार रुपए की सहायता दी जाएगी। प्रभावित किसानों की बेटी की शादी के लिए 25 हजार रुपए की सहायता दी जाएगी। जिन किसानों की पूरी फसल नष्ट हो गई है, उन्हें अगली फसल तक गेहूं, चावल और नमक एक रुपए प्रति किलो की दर से दिया जाएगा। ---
शुक्रवार, 27 मार्च 2015
करोड़ों का प्रीमियम वसूला, धेला भर भी नहीं दिया लाभ
किसानों का 12,0000,00,000 हड़पा बीमा कंपनियों ने
मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी 6 लाख किसानों को फसल बीमा राशि का इंतजार
भोपाल। यह लगातार तीसरा वर्ष है जब रवि फसलों के पकने और कटने के समय अतिवृष्टि एवं ओलावृष्टि हुई है और किसानों की फसल खेत में ही बर्बाद हो गई है। पिछली दो बार की तरह इस बार भी मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके मंत्रिमंडल के सदस्य खेतों में घूम-घूमकर किसानों के आंसू पोछने को उपक्रम (इसका अर्थ अपनी-अपनी समझ के अनुसार लगाने के लिए आप स्वतंत्र हैं )कर रहे हैं। मुख्यमंत्री किसानों को तत्काल राहत राशि मुहैया कराने की घोषणा कर रहे हैं, अफसरों को तरह-तरह का निर्देश दे रहे हैं, बर्बाद फसलों का सर्वे करने के लिए अलग-अलग तरीके सुझा रहे हैं। यहीं नहीं वे राष्ट्रीय फसल बीमा का लाभ दिलाने की घोषणा कर रहे हैं। वह कहते फिर रहे हैं कि वर्ष 2013 में खरीफ सत्र के दौरान फसलों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए 2187 करोड़ रुपए की बीमा राशि का भुगतान करवा दिया हूं, लेकिन किसान आज भी बीमा राशि के लिए बैंकों का चक्कर लगा रहे हैं। आलम यह है कि पिछले 14 साल में फसल बीमा के लिए प्रदेश के 3 करोड़ 27 लाख किसानों से प्रीमियम के रूप में 12 अरब 44 करोड़ रूपए वसूले गए, लेकिन मौसम की मार पर फायदा मात्र 65 लाख किसानों को ही मिला और वह भी कौडिय़ों में। जिसका परिणाम यह हो रहा है कि पिछले आठ साल में कर्ज के बोझ के तले प्रदेश में करीब साढ़े नौ हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं। फसल बीमा कराने वाले किसानों का कहना है कि अगर हमारी बर्बाद हुई फसलों की बीमा राशि ही मिल जाए तो हम सरकार के मुआवजे की आस में नहीं रहेंगे।
आसमानी कहर से हुई बर्बादी की भरपाई करने का दावा कर किसानों से हर साल फसल बीमा के प्रीमियम के नाम पर करोड़ों की उगाही करने के बाद भी उन्हें धेला भर की मदद नहीं दी जा रही है। पूरा साल गुजर जाने के बाद भी जिले में किसानों को फसल बीमा की राशि नही दी गई है। सुनियोजित तरीके से की जा रही ठगी के कारण लगातार तीसरी फसल बर्बाद हो जाने के बाद जिले के किसानों का गुस्सा अब फसल बीमा करने वाली सहकारी समितियों के कर्ताधर्ताओं के खिलाफ पनप रहा है। जिम्मेदार अफसर सारा दोष शासन की प्रक्रिया पर मढ़ रहे हैं तो सत्ताधारी दल और विपक्ष किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने में खुद को असहाय महसूस कर रहा है।
वर्ष 2013-14 में जहां प्रदेश में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से 49 जिलों के 9,584 गांवों की करीब 10 हजार करोड़ रूपए की फसल तबाह हो गई थी। वहीं इस बार सरकारी आंकलन से 15 और कृषि व मौसम विशेषज्ञों के अनुसार 39 जिलों में फसलों को नुकसान पहुंचा है। प्रदेश सरकार ने किसानों को त्वरित राहत पहुंचाने के लिए 500 करोड़ रूपए की राहत राशि की घोषणा कर दी है, लेकिन अभी न तो कोई बैंक और न ही सहकारी समिति किसानों को राहत देने सामने आई है।
फसल बीमा के नाम पर ठगी का खेल
करीब एक दशक पहले शुरू हुई राष्ट्रीय फसल बीमा योजना का सीधा-सीधा मकसद फसल नष्ट होने की स्थिति में क्षतिपूर्ति करना और किसान को मदद पहुंचाना है। अपने घोषित मकसद की वजह से जाहिर है कि यह योजना काफी लोकलुभावनी दिखाई देती है, लेकिन हकीकत इसके उलट है। बीमा कंपनियों ने बड़ी चालाकी से इसकी ऐसी शर्तें तय की हैं कि हर्जाने का दावा मान्य होने पर कंपनियों को बहुत मामूली भुगतान करना पड़े। मुआवजा भी तब मिलता है, जब तालुका या प्रखंड स्तर पर फसल बर्बाद हुई हो। इससे कम क्षेत्र में नुकसान होने पर भरपाई नहीं की जाती। इतना सब कुछ पक्ष में होने के बाद भी कंपनियों की नीयत किसानों को फायदा देने की नहीं है। फसल बीमा का अग्रिम प्रीमियम वसूल करने वाली बीमा कंपनियां जरूरत पडऩे पर दावा राशि का भुगतान करने में भी आनाकानी करती हैं।
पहले तो किसानों को बिना बताए उनके खातों से फसल बीमा प्रीमियम काट लिया जाता है। जब सूखा या ओलावृष्टि आदि से फसल बर्बाद होती है कई फसलों को गैर अधिसूचित बताकर बीमा कंपनी मुआवजा नहीं देती। लेकिन जो फसलें अधिसूचित हैं उनका मुआवजा देने में भी आनाकानी की जाती है। पिछले साल ओलावृष्टि से बर्बाद हुई गेहूं की फसल के किसानों को अब तक मुआवजे का इंतजार है। हालांकि कृषि महकमा और बीमा कंपनी अपने-अपने स्तर से सर्वे कर चुके हैं। वैसे तो राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना किसानों की भलाई के लिए लागू की गई है। इसलिए किसानों को फसल सुरक्षा करने के उद्देश्य से उनके बैंक खाते से संबंधित बैंक या सहकारी समितियां फसल बीमा का प्रीमियम काट लेती हैं। इस प्रीमियम में आधी धनराशि किसान की होती है और आधी राशि केंद्र और राज्य सरकार समान रूप से वहन करती हैं। लेकिन जब मौसम की प्रतिकूलता और ओलावृष्टि से फसल बर्बाद होती है किसानों को उसका मुआवजा तक नहीं दिया जाता।
किसान को मिलता है सिर्फ 50 पैसे मुआवजा
राज्य के 39 जिलों में हुई ओलावृष्टि से सैकड़ों करोड़ रूपए की फसल बर्बाद हो गई है। हालांकि, किसानों के पास बीमा है, लेकिन इसका फायदा उन्हें नहीं मिलने वाला है। पिछले 14 साल का अनुभव बताता है कि बीमा होने के बावजूद किसानों के हाथ कुछ नहीं लगता है, जबकि कंपनियां हजारों करोड़ रुपए कमा रही हैं। बीमा योजना में भारी खामियां है, जिसका लाभ कंपनियां उठा रही हैं और लाखों की बर्बादी झेलने वाले किसान को भरपाई के नाम पर सिर्फ 50-50 पैसे मिल रहे हैं। जानकारी के अनुसार, 'फसल बीमाÓ करने वाली कंपनियों ने पिछले 14 साल में प्रदेश के 3 करोड़ 27 लाख किसानों से प्रीमियम के रूप में 12 अरब 44 करोड़ रूपए कमाए हैं। गौरतलब है कि कंपनियां केंद्रीय सहकारी बैंकों और उनकी शाखाओं के माध्यम से बीमा करती हैं। किसान अगर फसल का बीमा नहीं करवाएं तो ये बैंक उन्हें कर्ज भी नहीं देते हैं। किसानों का कहना है कि सरकार की गलत योजना से बीमा कंपनियां सीधे तौर पर 65 प्रतिशत से ज्यादा पैसा अपनी जेब में डाल लेती हैं और किसानों को लाखों रुपए की फसल नष्ट होने के बदले में कभी 50 तो कभी 80 पैसे का मुआवजा देकर पल्ला झाड़ लेती हैं। किसानों के प्रतिनिधियों का कहना है कि बीमा कंपनियां फसल बर्बाद होने पर किसानों को प्रीमियम से भी कम राशि का क्लेम देती हैं। यानी वे किसानों से प्रीमियम का पैसा भी हजम कर जाती हैं और मुआवजे की राशि भी खा जाती हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2010 में फसल बीमा के तहत प्रदेश के किसानों ने खरीफ फसलों के लिए 11374.53 लाख स्पए प्रीमियम के तौर पर जमा कराया था,जबकि उन्हें लगभग आधी रकम लगभग 5416.28 लाख रूपए ही दावे के अंतर्गत मिल सके। इसी तरह वर्ष 2012-13 में खरीफ -के लिए 20781.50 लाख रूपए प्रीमिय जमा हुआ और फसल खराब होने पर मिले मात्र 7507.77 लाख रूपए। इस तरह बीमा कंपनिया किसानों को ठग रही हैं।
बीमा कंपनियों को कोई नुकसान नहीं
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना के अंतर्गत एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी के पास किसानों का बीमा होता है। प्रदेश के जिला सहकारी बैंक और प्राथमिक सहकारी समितियों के जरिए जो किसान अल्पकालीन कृषि ऋण लेते है उनके ऋण की राशि को ही बीमा राशि मानते हुए उसका डेढ़ से साढ़े तीन प्रतिशत तक प्रीमियम राशि शुरूआत में ही काट ली जाती है। बीमा कंपनी केवल उस सीमा तक नुकसान की भरपाई करती है जितनी उन्हें प्रीमियम के रूप में प्राप्त हुई। दावे की राशि ज्यादा होने पर राज्य और केंद्र सरकार आधा-आधा वहन करती है। इस कारण बीमा कंपनी को इसमें कोई नुकसान नहीं होगा। बल्कि जिस वर्ष में ज्यादा प्रीमियम मिलता है और दावा भुगतान कम किया जाता है उस वर्ष उन्हें फायदा होता है।
ऐसे फंसाया जाता है पेंच
फसल बीमा योजना की सबसे बड़ी गड़बड़, योजना का स्वैच्छिक और अनिवार्य होना है। जो भी किसान बैंक या सहकारी संस्था से ऋण लेता है, बैंक उससे बिना पूछे अनिवार्य रूप से प्रीमियम काट लेता है। उसे कोई जानकारी, रसीद या पॉलिसी का कागज नहीं दिया जाता। जिसके चलते किसान को मालूम ही नहीं चलता कि उसकी फसल का बीमा हुआ भी है,या नहीं। मौसम आधारित फसल बीमा योजनाएं हमारे मुल्क में पश्चिम मुल्कों से आई हैं। और सब जानते हैं,कि इसमें विश्व बैंक की सिफारिशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बहुत बड़ा दबाव था। पश्चिमी मुल्कों और हमारे यहां की परिस्थितियों में यदि अंतर करके देखें, तो इसमें बुनियादी फर्क है। यूरोपीय मुल्कों में जहां सैंकड़ो-हजारों एकड़ जमीन के किसान और कंपनियां बहुतायत में हैं, तो हमारे यहां छोटे-छोटे काश्तकार हैं। एक बात और। वहां के किसान संतुष्ट होकर स्वेच्छा से अपनी फसल का बीमा करवाते हैं,लेकिन हमारी सरकारों ने इस बीमे को जबर्दस्ती किसानों पर थोपा है। किसान चाहे न चाहे,उसे बीमा करवाना ही पड़ेगा। आलम यह है कि हमारे यहां सभी फसल बीमा योजनाएं सरकार के अनुदान और सहयोग से क्रियान्वित हो रही हैं। उसके बाद भी तस्वीर कुछ इस तरह से है, पैसा किसान व सरकार का, मुनाफा कंपनियों का और नुक्सान सिर्फ व सिर्फ किसान का। कुल मिलाकर, सरकारों के तमाम दावों और वादो के बाद भी फसल बीमा योजना किसानों के लिए सिर्फ एक छलावा साबित हुई है। लगातार हो रही किसानों की आत्महत्याएं, फसल बीमा योजना की नाकामी को उजागर करती हैं। बीमा कंपनी द्वारा किसानों की फसल का बीमा व्यक्तिगत होता है। लेकिन फसल के नुकसान होने पर मुआवजा सामूहिक मिलता है। प्राकृतिक आपदा के बाद 3 और 5 साल के औसत उत्पादन के आधार पर नुकसान का आकलन होता है। अधिकांश फसल कटाई प्रयोग किसान के सामने नहीं होते। मौसम खराबी का आंकलन करने के लिए हर जगह पर्याप्त लैब और उपकरणों का अभाव है। अऋणी किसानों को नहीं मिल पाता बीमा योजना का लाभ। विडंबना की बात यह है कि एक तरफ किसानों को यहां फसल बीमा का फायदा नहीं मिला,तो दूसरी तरफ बैंक अधिकारी किसानों को कर्ज वसूली के लिए परेशान कर रहे हैं। किसानों पर दंड व ब्याज लगाया जा रहा है।
सरकार की आर्थिक सेहत बिगड़ी
करीब एक लाख करोड़ के कर्ज में डूबे प्रदेश की वित्तीय स्थिति पहले ही गड़बड़ चल रही थी, अब असमय बारिश और ओलावृष्टि ने सरकार की आर्थिक सेहत पर सीधा असर डाला है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की है कि किसानों की मदद को पूरा करने के लिए विभागों के बजट में कटौती की जरूरत पड़ी तो वह भी किया जाएगा। जानकारी के अनुसार सरकार पीडब्ल्यूडी, पीएचई, पर्यटन, खेलकूद, उद्योग संवर्धन, पुलिस इत्यादि महकमे के बजट से कटौती कर किसानों को राहत राशि उपलब्ध कराने की तैयारी कर रही है। यदि यहां से भी व्यवस्था पूरी नहीं हुई तो विकास कार्यो को रोककर राशि जुटाई जाएगी। प्रदेश की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। ओला-पाला से खरीफ की फसल चौपट होने के बाद जैसे-तैसे किसानों ने हिम्मत कर फिर फसल बोई, फसल पक कर तैयार हुई और फिर प्रकृति की मार से फसल बर्बाद हो गई।
कर्ज के जाल में किसान
किसानों की आत्महत्या के पीछे कर्ज एक बड़ा कारण है। लघु और सीमांत किसानों के लिए बगैर कर्ज से खेती करना लगभग असंभव हो गया है। बैंकों से मिलने वाला कर्ज अपर्याप्त तो है ही, साथ ही उसे पाने के लिए खूब भागदौड़ करनी पड़ती है। इस दशा में किसान आसानी से साहूकारी कर्ज के चंगुल में फस जाते हैं। यदि हम पूरे मध्यप्रदेश में किसानों पर कर्ज की मात्रा का आकलन करेंं तो पाते हैं कि प्रदेश के किसान करीब दस हजार करोड़ रूपए से भी ज्यादा के कर्जदार हैं। क्योंकि अपेक्स बैंक के रिकॉर्ड में किसानों पर साढ़े सात हजार करोड़ रूपए कर्ज के रूप में दर्ज हैं। इसमें कम से कम ढाई हजार करोड़ का साहूकारी कर्ज जोड़ दें तो यह आंकड़ा दस हजार करोड़ को पार कर लेता है। सन् 2006 में गठित राधाकृष्णन समिति ने भी किसानों की आत्महत्या के लिए कर्ज को एक मुख्य कारण माना है। मध्यप्रदेश में आत्महत्या करने वाले किसान 20 हजार से लेकर 3 लाख रूपए तक के साहूकारी कर्ज में दबे थे। साहूकारी कर्ज की ब्याजदर इतनी ज्यादा होती है कि सालभर के अंदर ही कर्ज की मात्रा दुगनी हो जाती है। ऐसे में यदि फसल खराब हो जाए तो आने वाले समय में यह संकट और भी बढ़ जाता है।
3 माह से 6 लाख किसानों को फसल बीमा राशि का इंतजार
पिछले रबी सत्र में फसलों को हुए नुकसान की भरपाई के एवज में करीब 6 लाख किसानों को सरकार ने दिसंबर 2014 में फसल बीमा मद में करीब 609 करोड़ रुपए देने की घोषणा की थी, लेकिन तीन माह बाद भी किसानों को उक्त राशि नहीं मिल पाई है। राज्य किसान कल्याण और कृषि विकास विभाग के प्रमुख सचिव राजेश राजोरा ने कहा, 'दावा निपटान समिति जल्द ही दावों की समीक्षा करेगी और इस बात की पूरी संभावना है कि 2013-14 के रबी सत्र के लिए 608 करोड़ रुपये का दावा निपटा लिया जाएगा। इससे गेहूं और चना की फसल को नुकसान के एवज में करीब 5.77 लाख किसानों को मुआवजा मिल सकता है। खरीफ सीजन 2013 के लिए फसल बीमा दावा को पहले ही निपटाया जा चुका है और इसके तहत किसानों के बीच 2187 करोड़ रुपए का मुआवजा वितरित किया गया है।
6 साल में वसूले 53 करोड़, बांटे 24 करोड़
मुख्यमंत्री प्रदेशभर में घूम-घूमकर किसानों को फसल बीमा का लाभ दिलाने का आश्वासन दे रहे हैं, जबकि किसानों को पिछले साल का बीमा अभी तक नहीं मिल सका है। मंदसौर जिले में फसल बीमा योजना के नाम पर किसानों से प्रीमियम तो ली जा रही है, लेकिन क्लेम के नियम-कायदे इतने उलझे हुए हैं कि समय पर दे ही नहीं रहे हैं। छह सालों में कंपनी ने किसानों से 53 करोड़ रुपए वसूले हैं पर बांटे केवल 24 करोड़ रुपए ही है। वर्ष 2012-13 में जिले में 99 हजार 694 किसानों ने प्रीमियम के रुप में 2.53 करोड़ रुपए जमा कराए थे लेकिन एक भी किसान को क्लेम नहीं मिला। वर्ष 2013-14 में तो 57692 में से सिर्फ 18 किसानों को क्लेम मिल पाया। रबी की फसल पर प्राकृतिक कहर टूटने के बाद किसानों को बीमा कंपनी एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया से उम्मीद थी लेकिन प्रीमियम वसूलने के बाद भी सिर्फ 37 लाख रुपए दिए गए। इस तरह से वर्ष 2014-15 में भी फसल बर्बाद होने के बाद किसान क्लेम का इंतजार कर रहे हैं। जिले में 2013 में खरीफ की फसल में अति बारिश से हुए नुकसान में जिलेभर के किसानों में से महज 74 को ही फसल बीमा योजना का लाभ मिला था, लेकिन उन्हें किस तरह मिला यह बात न तो कृषि विभाग कहने के लिए तैयार है और न ही लीड बैंक के कर्ताधर्ता। लीड बैंक के मुताबिक 2014 की रबी की फसल में हुए नुकसान के कई बीमा प्रकरण भोपाल इंश्योरेंस कंपनी को भेजे गए थे, लेकिन अभी तक उनका निराकरण नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री ने सबलगढ़ में इंश्योरेंस का प्रीमियम 31 मार्च तक जमा करवाकर बीमा लाभ दिलाने की घोषणा की है, लेकिन रबी की फसल का बीमा कराने की आखिरी तारीख 31 दिसंबर थी। ऐसे में अब किसानों की फसल का बीमा किस तरह होगा, यह लोगों की समझ में नहीं आ रहा है। जिले के कृषि विभाग के उप संचालक आरपी गोयल कहते हैं कि अंचल के किसान आमतौर पर फसल का बीमा नहीं कराते हैं। जब वे खाद या बैंक से लोन लेते हैं तो बैंक उनकी फसल का बीमा करा देती हैं। तत्कालीन कलेक्टर मदन कुमार के समय फसलों का बीमा कराने के लिए काफी प्रयास किए गए, लेकिन किसान बीमा कराने के लिए तैयार ही नहीं हुए। लीड बैंक मुरैना प्रबंधक टी शाह कहते हैं कि 2013 में खरीफ की फसल में हुए नुकसान के लिए जिले के 74 किसानों को फसल बीमा मिला था। 2014 के प्रकरण अभी भी इंश्योरेंस कंपनी में लटके हैं। निराकरण नहीं हुआ है।
शर्तों ने रोकी किसान की राहत
ओला और बारिश से रबी की फसलें चौपट होने के बाद किसानों को फसल बीमा योजना से भी उम्मीद नहीं है। बीमा की शर्तें ही किसानों के लिए मुसीबत बन रही हैं। किसानों से प्रीमियम तो पूरा वसूला जाता है लेकिन शर्तें इतनी सख्त कि क्लेम मिलना नामुमकिन ही होता है। इस पर भी यदि क्लेम मिल भी जाता है तो वो भी नहीं के बराबर ही होता है। प्रदेश में फसल बीमा के हालात ये हैं कि कई जिलों के किसान को तो दो साल में एक बार भी क्लेम नहीं मिला। कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन भी मानते हैं कि फसल बीमा में विसंगतियां हैं। किसानों को लाभ नहीं मिल रहा है। बावजूद इसके प्रदेश सरकार बीमा नियमों में सुधार की दिशा में अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी है। रायसेन जिले के संग्रामपुर गांव के लालाराम की 15 बीघा की फसल दो साल पहले ओलों से नष्ट हो गई थी। फसल बीमा था, दो हजार प्रीमियम भी जमा किया लेकिन उन्हें क्लेम की राशि महज 15 सौ रुपए ही मिली। विदिशा के बिलरई निवासी हरनाम सिंह रघुवंशी की अतिवृष्टि से पिछले साल 20 बीघा का सोयाबीन नष्ट हो गया था। फसल पर 50 हजार रुपए से अधिक की लागत आई और बीमा क्लेम महज 12 सौ रुपए ही मिला। बैतूल जिले के घोड़ाडोंगरी के कोयलारी गांव के किसान राजेश यादव की 25 बीघा की वर्ष 2013 की रबी और खरीफ की फसल ओला, बारिश के कारण बर्बाद हो गई थी। दोनों फसलों बीमा का क्लेम महज 12 सौ रुपए मिला।
बैतूल जिले में वर्ष 2013-14 में रबी और खरीफ मौसम की फसलों के लिये 68 हजार 608 किसानों से 4 करोड़ 18 लाख रुपए से अधिक राशि फसल बीमा का प्रीमियम जमा करने के लिए वसूल की गई है। सहकारी समितियों के माध्यम से जिले भर में रबी और खरीफ मौसम की फसलों के लिये खाद और बीज क्रय करने वाले किसानों से फसल बीमा के लिए प्रीमियम राशि की वसूली की गई है। जिले में पिछले साल की रबी और खरीफ मौसम की फसलों के लिये जमा किए गए प्रीमियम की बीमांकित राशि करीब सवा अरब रुपए है। दोनों फसलों को मौसम के कहर से हुए नुकसान के बाद प्रशासन द्वारा किए गए सर्वे में केवल खरीफ मौसम में सवा अरब से अधिक की क्षति का आंकलन किया गया था। सरकारी तौर पर तो किसानों को मुआवजा बांट दिया गया लेकिन फसल बीमा की राशि का आज तक किसान इंतजार कर रहे हैं। फसल बीमा के लिए जिले में एग्रीकल्चर इश्योरेंस कंपनी को अधिकृत किया गया है। इस कंपनी को किसानों की सूची और प्रीमियम की राशि भेज दी जाती है और फसल कटाई प्रयोग के अलावा आनावारी की रिपोर्ट के आधार पर कंपनी बीमा दावे स्वीकार करती है। फसल बीमा करने के लिये जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक के अलावा राष्ट्रीयकृत बैंकों से किसान क्रेडिट कार्ड बनाने वाले किसानों से भी प्रीमियम की वसूली की जाती है।
बैतूल जिले की शाहपुर तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम सोहागपुरढाना के कृषक राजेश सिनोटिया ने बताया कि उनके द्वारा सोसायटी में फसल बीमा का प्रीमियम तो जमा किया गया था। लेकिन आज तक लाभ नहीं मिल पाया है। उनके खेत के आसपास के सभी किसानों को बीमा का लाभ दिया गया लेकिन उन्हे लाभ नहीं मिल पाया है। राजेश ने बताया कि पिछले साल सोयाबीन की फसल अधिक बारिश होने और गेहूं की फसल ओलावृष्टि होने की वजह से पूरी तरह से बर्बाद हो गई थी। तमाम जगह शिकायत करने के बाद भी केवल यह आश्वासन दिया जा रहा है कि बीमा कंपनी के द्वारा अभी राशि नहीं दी गई है। फसल बीमा के नाम पर किसानों से हो रही ठगी के मामले में आठनेर ब्लाक सबसे अव्वल है। इस ब्लाक में सैकड़ों किसानों को फसल बीमा के नाम पर चवन्नी भी नहीं मिल पाई है। आठनेर ब्लाक के ग्राम सूखी निवासी फगनसिंह धुर्वे ने बताया कि एक साल पहले उसके द्वारा सोसायटी से खाद खरीदी गई थी तब डेढ़ हजार रुपए फसल बीमा का प्रीमियम भी जमा किया गया था। दो साल बीत गए लेकिन फसलों के बर्बाद हो जाने के बाद भी धेला भर नहीं मिल पाया है।
बैतूल जिला कांग्रेस अध्यक्ष समीर खान कहते हैं कि अच्छे दिन का ढोल पीटने वाली सरकार की पोल हर कदम पर खुल रही है। अन्नदाता बर्बाद हो गया है और उनके हक की राशि सरकार दबाए बैठी है। किसानों को फसल बीमा का लाभ जल्द दिलाने के लिए कांग्रेस सड़क पर उतरेगी और सरकार की पोल खोलेगी। उधर, बैतूल जिला सहकारी बैंक के महाप्रबंधक लता कृष्णन कहती है कि पिछले वर्ष की रबी और खरीफ मौसम की फसलों का प्रीमियम किसानों से वसूल कर बीमा कंपनी को दिया गया है। अभी तक पिछले साल की बीमा राशि प्राप्त नहीं हो पाई है। इस वर्ष की रबी मौसम की फसलों का बीमा किया जा रहा है।
बीमा योजना की सुविधा बनी असुविधा
सुनने में आसान लगने वाली फसल बीमा योजना की सुविधा किसानों के लिए टेड़ी खीर साबित हो रही है। पहले तो इस योजना के दायरे में किसानों का आना ही मुश्किल होता है। दायरे में आ भी जाएं, तो फसल का नुकसान साबित करने और क्लेम पाने में रात-दिन एक करना पड़ता है। तमाम दुविधाओं को देखते हुए जिले के किसानों ने इससे तौबा कर ली है। अनिवार्य बीमा के दायरे में आने वाले ऋणधारक किसानों को छोड़ दिया जाए, तो निजी तौर पर आगे आकर बीमा कराने वाले किसानों की जिले में सं या न के बराबर है। फसलों के नुकसान के आकलन के लिए जिला प्रशासन द्वारा तैयार रिपोर्ट को बीमा कंपनी मान्य नहीं करती है। इसके लिए उसकी टीम अलग से सर्वे करती है और नुकसान तय करती है। कंपनी क्षेत्र में हुए नुकसान को आधार बनाती है, न कि बीमित किसान की फसल को। यदि सिर्फ बीमित किसान की फसल किसी आपदा का शिकार हुई है, तो उसे मान्य नहीं किया जाएगा।
एक साल बाद क्लेम
तमाम उलझनों के बाद किसानों का नुकसान मान भी लिया जाए, तो क्लेम की राशि मिलने में एक साल इंतजार करना होता है। यानी खरीफ की फसल में नुकसान होने पर उसका क्लेम अगली खरीफ की फसल में दिया जाएगा। कृषि विभाग के अनुसार अधिसूचित फसलों को तय करने के लिए क्षेत्र में उस फसल के पांच साल के उत्पादन को देखा जाता है। उसके हिसाब से मौजूदा सीजन में उसके उत्पादन का आंकलन करते हुए उसे अधिसूचित किया जाता है। एक जिले में आम तौर पर तीन से चार फसलों को अधिसूचित किया जाता है। फसल बीमा का काम जिला सहकारी बैंक के माध्यम से किया जाता है। यह सुविधा खास तौर से उन किसानों को मिलती है, जिन्होंने बैंक से ऋण ले रखा है। बैंक द्वारा ऋण राशि में ही उनका प्रीमियम समायोजित कर दिया जाता है। इसके अलावा कोई किसान अलग से बीमा का लाभ लेना चाहे, तो उसे नकद प्रीमियम देने के साथ ही क्लेम पाने के लिए भटकना पड़ता है। इन मुश्किलों से बचने के लिए किसान अलग से फसल बीमा का लाभ नहीं लेते हैं।
निर्मल भारत की मप्र में दिखी गंदी तस्वीर
शौचालय बनाने के नाम पर 785 करोड़ हजम कर गई पंचायतें
समेकित ऑडिट रिपोर्ट में हुए खुलासों ने सबको चौकाया
विभाग ने पंचायतों से वापस बुलाए 475 करोड़
भोपाल। पिछले एक दशक में मप्र में जितने भ्रष्टाचारी पकड़ाएं हैं, उससे पहले इतने भ्रष्टाचार के मामले कभी भी सामने नहीं आए हैं। हद तो यह की देश में ग्रामीण स्वच्छता के लिए शुरू किया गया निर्मल भारत अभियान भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है। सरकार ने घर-घर शौचालय बनाने के लिए प्रदेश की 23,000 पंचायतों को करीब 1260 करोड़ रूपए दिया था, लेकिन आज 7 साल बाद भी 63 फीसदी ग्रामीण क्षेत्र में शौचालय नहीं हैं। जबकि पंचायतों ने कागजों पर 785 करोड़ की रकम खर्च कर दी है। इस खुलासे के बाद सरकार ने पंचायतों से 475 करोड़ रूपए वापस बुलाए हैं। वहीं पंचायतों को क्षेत्र में बनाए गए शौचालयों की रिपोर्ट भी तलब की है। उल्लेखनीय है के मध्य प्रदेश में ग्राम पंचायतों और ग्राम कोषों का ऑडिट सीएजी के पर्यवेक्षण में स्वतंत्र एजेंसी के जरिए होने लगा तो गड़बड़ी मिलने का सिलसिला भी शुरू हो गया। समेकित ऑडिट रिपोर्ट में कई ऐसे खुलासे सामने आए हैं जो चौकाने वाले हैं।
पंचायत चुनाव नहीं होते तो चलता रहता भ्रष्टाचार
देश को निर्मल बनाने के लिए सरकार ने हर घर में शौचालय बनाने के लिए निर्मल भारत अभियान शुरू किया था, लेकिन मप्र में यह अभियान भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है। प्रदेश की कई पंचायतों ने तो शौचालय बनाने का बजट ही हजम कर लिया और वहां के लोग आज भी खुले में शौचालय जाने को मजबूर हैं। अगर प्रदेश में हाल ही में पंचायत चुनाव नहीं होते तो शौचालय बनाने के नाम पर भ्रष्टाचार चलता रहता और निर्मल भारत की तस्वीर कागजों पर संवरती रहती। लेकिन पंचायत चुनाव के दौरान तत्कालीन सरपंचों की पोल खोलने के लिए प्रदेशभर में जिस तरह भंडाफोड़ अभियान चला उससे सारी हकीकत सामने आ गई। सबसे पहले निर्मल भारत अभियान में भ्रष्टाचार का बड़ा मामला सतना जिले की आदिवासी बहुल्य मझगवां जनपद की 76 ग्राम पंचायतों में सामने आया। यहां विभिन्न वित्तीय वर्षों के दौरान 18 हजार 316 शौचालयों के निर्माण के लिए बतौर अनुदान दी गई 6 करोड़ 96 लाख 56 हजार रुपए की भारी भरकम रकम में से 1 करोड़ 66 लाख 60 हजार रुपए की राशि का डंके की चोट पर दुरुपयोग हुआ। गबन की शिकार यह वह रकम है जो सरंपच और सचिवों ने काम स्वीकृत नहीं होने के बाद भी बैंक खातों से निकाल ली गई। अब इस रकम की भरपाई के लिए प्रशासन को पसीना आ रहा है। हालांकि देर से ही सही भ्रष्टाचार की खबर सामने आने के ग्रामीण विकास विभाग ने प्रदेश की 23000 पंचायतों में निर्मल भारत अभियान के तहत भेजी गई करीब 475 करोड़ की राशि वापस बुला ली है। इस अभियान के तहत गांवों में शौचालय और अन्य विकास कार्य होने थे पर चुनाव के दौरान इस राशि में भ्रष्टाचार होने की शिकायतों के चलते यह कदम उठाया गया है। उल्लेखनीय है कि 7 साल के अंदर पूरे देश में खुले में शौच की परंपरा के सफाए के केंद्र सरकार के संकल्प के साथ शुरु किया गया निर्मल भारत अभियान मप्र में जमीनी स्तर पर भारी भ्रष्टाचार के दलदल में फंस कर रह गया है।
एनबीए में गबन की ऐसे खुली पोल
निर्मल भारत अभियान में सतना जिले में करोड़ों के घोटाले की पोल तब खुली जब जिला पंचायत के तबके मुख्य कार्यपालन अधिकारी(सीईओ)अभिजीत अग्रवाल ने जिले के सभी जनपदों के सीईओ को निर्देश देकर इस आशय के ब्यौरे तलब किए कि निर्मल भारत अभियान(एनबीए)के तहत शौचालय निर्माण में राशि आहरण (व्यय),मूल्यांकन उपियोगिता और कार्यपूर्णता की अद्यतन स्थिति क्या है? जब रिपोर्ट सामने आई तो पता चला कि निर्मल भारत मद में केंद्र से आए अनुदान में करोड़ों का गोलमाल हुआ है। अकेले मझगवां जनपद की 76 पंचायतों में बगैर काम के 1 करोड़ 66 लाख 60 हजार रुपए की राशि निकाल ली गई। जिला पंचायत के सीईओ को कमोबेश सभी जनपद सीईओ की ओर से भेजे गए प्रतिवेदनों में भी इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि निरंतर फोन पर,भ्रमण के दौरान, लिखित-मौखिक और बैठकों में भी सरपंच-सचिवों से अद्यतन रिपोर्ट मांगी गर्इं लेकिन प्रतिवेदन नहीं मिले। ज्यादातर जनपद सीईओ ने भी अपनी रिपोर्ट में माना है कि अनुदान राशि का निजी मद में दुरुपयोग करते हुए ऐसी गंभीर अनियमितताएं की गर्इं जो गबन की श्रेणी में आती हैं।
सतना जिला कलेक्टर संतोष मिश्रा कहते हैं, त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में आऊट स्टैंडिंग पर नोड्यूज (एनओसी)की बाध्यता के चलते हालांकि काफी हद तक धांधली में फंसी यह रकम रिकवर हुई है। उन्होंने बताया कि चुनाव के बहाने तकरीबन 9 करोड़ की रिकवरी हुई है। कलेक्टर ने भी माना कि वसूली की यह रकम पर्याप्त नहीं है। कलेक्टर ने कहा कि सीईओ जिला पंचायत और जनपदों के सीईओ तथा एसडीएम को जल्द ही इस मामले में अभियान चला कर वसूली कराए जाने के निर्देश दिए जाएंगे। जरुरत पड़ी तो गबन के आरोपी सरपंच और सचिवों के खिलाफ एफआईआर करा कर मामले पुलिस को भी सौंपे जाएंगे। उन्होंने कहा कि कार्यवाही तो ऐसी की जाएगी जो नजीर बने। सतना जिला पंचायत की मुख्यकार्यपालन अधिकारी और अपर कलेक्टर (विकास)सूफिया फारुखी बताती हैं, कि निर्माण एवं विकास तथा अन्य मदों पर बकाया रिकवरी और सरकारी धन के दुरुपयोग मामले में किसी भी प्रकार की आऊट स्टैंडिंग पर जनपद के सभी सीईओ को जीरो रिकवरी का टारगेट देते हुए कड़े निर्देश दिए गए हैं। उनसे अब इस आशय के सर्टिफिकेट भी लिए जा रहे हैं। भ्रष्टाचार के मामलों में आरोप सिद्ध होने पर सख्त कार्यवाही और वसूली का भी सिलसिला शुरु हो गया है। शौचालय निर्माण में सरकारी राशि के दुरुपयोग पर जनपद सीईओ के प्रतिवेदन को गंभीरता से लिया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि निर्मल भारत अभियान के तहत केंद्रीय अनुदान के भुगतान के तहत रकम जिला पंचायत द्वारा आरटीजीएस के माध्यम से जनपदों के जरिए सीधे पंचायतों के खाते में भेजी जाती है। पंचायतों के इन बैंक खातों का संचालन साझा तौर पर सरपंच और सचिव करते हैं। सरपंच और सचिवों की साठगांठ के कारण ही जिले में भारी पैमाने पर गफलत हुई।
सतना जिले के मझगवां जनपद में निर्मल भारत अभियान के तहत भ्रष्टाचार का मामला सामने के बाद से तो जैसे भ्रष्टाचार की बाढ़ आ गई। एक-एक कर कई जिलों की रिपोर्ट सामने आते ही पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने जब प्रदेशभर के पंचायतों की प्रोग्रेस रिपोर्ट का जायजा लिया और उससे मैदानी रिपोर्ट का मिलान किया तो उसमें अरबों रूपए के भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है।
मुरैना जिले में 2003 में ग्राम पंचायतों के माध्यम से गांव-गांव सर्वे कराकर कुल तीन लाख 76 हजार 398 परिवारों को इस योजना के लिए चुना गया था। इन सभी के लिए 2018 तक शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा गया था। आज 12 साल होने को हैं लेकिन अब तक जिले में कुल एक लाख 49 हजार 195 शौचालय ही बन सके हैं। भौतिक सत्यापन में इनमें से कितने काम करते मिलेंगे यह जांच का विषय है। अपने शुरुआती साल से ही यह अभियान कभी अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सका। 2013-14 के जो आंकड़े उपलब्ध हैं उनमें उस साल 122 ग्राम पंचयातों में 35267 शौचालय बनाए जाने थे जिनमें से 22017 को मंजूरी मिली। उनमें से भी पूरे साल में कुल 9672 यानी लगभग 27 फीसदी शौचालय ही बन सके। इस वित्तीय वर्ष के लिए 63437 शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा गया लेकिन अब तक कुल 3380 शौचालय बन सके हैं। कागज पर दर्ज आकड़ों की अपेक्षा शौचालयों की मैदानी स्थिति ज्यादा खराब है। बने हुए शौचालयों में से ज्यादातर अनुपयोगी हैं उनकी दीवारें अधूरी हैं उनसे छत गायब हैं कमोड मिट्टी में दवा दिया गया है उसका किसी सैप्टिक टैंक से कनेक्शन ही नहीं है। पानी की कैसी भी कोई सुविधा नहीं है ऐसे हजारों आधे शौचालय पूरे जिले में मौजूद है। जिनके घर में शौचालय बने हैं उन्होंने अपना 900 रुपए का अंशदान बचा लिया तो बाकी पैसा ठेकेदार, पंच, सरपंच और इस योजना की देखरेख करने वाली एजेंसी जिला पंचायत के अधिकारी-कर्मचारी खा पी गए। लोग आज भी खुले में शौच कर रहे हैं।
पंचायतों तक नहीं पहुंचा मर्यादा का अभियान
सीधी जिले के विभिन्न विकासखण्डों में स्थित ग्राम पंचायतों में से अधिकांश ग्राम पंचायतें ऐसे है जिनके प्रतिनिधियों के घर में शौचालय का निर्माण नहीं कराया गया है। इसके बावजूद भी प्रशासनिक अधिकारी ऐसे पंचायत प्रतिनिधि के विरूद्ध पद से पृथक करने की कार्यवाई नहीं कर पाए हंै। उल्लेखनीय है कि वातावरण स्वच्छ रखने एवं खुले मैदान में शौचक्रिया से रोकने के उद्देश्य से सरकार तरह-तरह के कार्यक्रम तैयार करती रही है। निर्मल ग्राम योजना, निर्मल वाटिका, समग्र स्वच्छता एवं मर्यादा अभियान जैसी योजनाओं को लागू कर चुकी है ताकि किसी न किसी माध्यम से गरीब व्यक्ति भी शौचालय का निर्माण करा सके। मप्र पंचायत राज अधिनियम 1993 के अनुसार पंचायत प्रतिनिधि घोषित होने के 6 माह अवधि तक संबंधित प्रतिनिधि के घर शौचालय का निर्माण कराना आवश्यक है इसके बाद भी जिले के अधिकांश जनप्रतिनिधि अब तक शौचालय का निर्माण नहीं करा सके हंै। ऐसे प्रतिनिधियों के विरूद्ध प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा पद से पृथक करने संबंधी कोई कार्यवाई करना तो दूर रहा इस संबंध में नोटिस तक जारी नहीं की जा रही है।
जिला प्रशासन की लापरवाही का ही परिणाम है कि जिले की 60 फीसदी ग्राम पंचायतें ऐसी है जहां पर योजना लागू होने के 12 वर्ष बाद भी शौचालय निर्माण कराने के लिए सरपंच-सचिव द्वारा विचार तक नहीं किया जा रहा है। खासतौर पर रामपुर नैकिन विकासखण्ड अंतर्गत ग्राम पंचायतों झगरी, गुजरेड़, अमिलहा, खड्डीकला, मोहनी रतवार, पैपखरा, सतोहरी सहित 50 ग्राम पंचायतों के पंचों के घरों में शौचालय का निर्माण अब तक नहीं हो सका है। इसी तरह जनपद सीधी अंतर्गत ऐंठी, खिरखोरी सहित दर्जनों ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि खुले मैदान में शौचक्रिया करने के लिए मजबूर हैं। साथ ही जनपद पंचायत मझौली, सीधी एवं जनपद पंचायत कुसमी की दर्जनों ग्राम पंचायतों में यही हालत बनी हुई है। जबकि जनपद पंचायत सिहावल की अधिकांश ग्राम पंचायतों में शौचालय निर्माण की कार्यवाही प्रक्रियाधीन बताई जा रही है।
पंचायत प्रतिनिधियों को शौचालय निर्माण कराने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा कड़े निर्देश नहीं दिए जा रहे है और न ही शौचालय न बनवाने वाले पंचों एवं जनपद सदस्यों को पद से पृथक करने की कार्यवाही संबंधी जानकारी ही दी जाती है। यही वजह है कि पंचायत प्रतिनिधि शौचालय निर्माण कराने का विचार तक नहीं बना पा रहे है। पंचायत राज अधिनियम में भले ही प्रतिनिधियों को शौचालय का निर्माण कराना अनिवार्य बताया गया है लेकिन प्रशासनिक अधिकारी इस नियम को कभी भी महत्व नहीं दिए। यही वजह है कि जिले के सैकड़ा भर पंच एवं जनपद सदस्यों सहित सरपंचों के घर में शौचालय नही ंबन पाए हैं और न ही इसके बाद कोई कार्यवाई ही की गई। प्रशासनिक अधिकारी अधिनियम में वर्णित निर्देशों को नजर अंदाज करते रहे है। जिला पंचायत के मर्यादा अभियान शाखा में अब तक यह जानकारी उपलब्ध नहीं है कि जिले की किन-किन ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों के घरों में शौचालय बने हैं या नहीं बनाए गए हैं। संबंधित शाखा से बताया जाता है कि अधिकांश प्रतिनिधियों के घरों में शौचालय नहीं बने हैं। बावजूद इसके पद से पृथक करने की कार्यवाई करना आवश्यक नहीं माना जा रहा है।
खंडवा में शौचालय निर्माण के नाम पर बड़ा घोटाला
एक ओर जहां प्रधानमंत्री द्वारा देश में स्वच्छ भारत का सपना लेकर भारत निर्माण अभियान चलाया जा रहा हैं जिसमें देश के प्रत्येक गांव को भी जोड़ा गया हैं। वही दूसरी ओर उनके इस सपने को योजना को अमलीजामा पहनाने वाले अधिकारियों द्वारा धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा हैं। वैसे तो इस योजना को मूर्त रूप देने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं लेकिन इन योजनाओं में केवल भ्रष्टाचार ही पनप रहा हैं। ऐसा ही एक मामला खंडवा जिले के विकासखंड खालवा, हरसूद का हैं जिसमें निर्मल भारत अभियान एवं मनरेगा योजनान्तर्गत तैयार की गई मर्यादा उपयोजना अंतर्गत निर्माण किए जा रहें हैं शौचालयों का हैं।
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अनुसार शौचालय निर्माण के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। जिसमें व्यक्तिगत पारिवारिक शौचालय निर्माण हेतु प्रोत्साहन राशि 4600 रूपए का प्रावधान निहित था। जिसमें केन्द्रांश 3200 रूपए एवं राज्यांश 1400 रूपए एवं हितग्राही का अंशदान 900 रूपए उल्लेखित था। मनरेगा से अंशदान के रूप में 4400 रूपए निर्धारित किए गए हैं। कुल मिलाकर घरेलू शौचालय की लागत 9900 रूपए भारत सरकार एवं मप्र शासन की सहमति से तय हुई थी। मनरेगा योजना से अकुशल श्रम हेतु 20 मानव दिवस हेतु 2640 रूपए एवं मिस्त्री, प्लंबर, मेट की मजदूरी एवं प्रोत्साहन राशि 1760 रूपए शामिल हैं। 5 दिवस मिस्त्री के लिए 1460 रूपए एवं 300 रूपए मेट प्रोत्साहन राशि का निर्देशन शासन स्तर से किया गया था। निर्मल भारत अभियान से सामग्री हेतु 4600 रूपए का प्रावधान था। जिसमें 900 रूपए हितग्राही का अंशदान मिलाकर यह आकलन 5500 रूपए किया गया था। कुल मिलाकर शौचालय हेतु 9900 रूपए निर्माण हेतु प्राक्लन राज्य स्तर पर तैयार करके ड्राईंग एवं मार्गदर्शन शासन के पत्र के साथ प्राप्त होने के साथ दिशा-निर्देश दिए गए थे। भ्रष्टाचार से जुडे इस गंभीर मामले को शिकायतकर्ता गोपाल राठौर द्वारा पंचायतो के निरीक्षण के दौरान नियम विरूद्ध बनाए गए जर्जर शौचालयों को देखने के बाद प्रकाश में लाया गया है। जिला दर अनुसूची अनुसार कार्यपालन यंत्री द्वारा मानक प्राकलन तैयार करके जिला कार्यक्रम समन्वयक के माध्यम से सभी पंचायतों को उपलब्ध कराए गए थे जिसे तकनीकी स्वीकृति मानकर कार्य करवाए जाने के दिशा निर्देश जारी किए गए थे।
तकनीकी दिशा निर्देशों के अनुसार कार्य में ईंट की चुनाई करके छत पर एसी सीट का प्रावधान, 2 लीच पीट की जालीदार चिनाई सीमेंंट मसालों से करना थी। साइड में एक पानी की टंकी जो कि ईंट से निर्मित की जाना थी। पूरे शौचालय को प्लास्टर करना था। एक दरवाजा बिना चौखट का लगाने के अलावा पानी की टंकी में पाईप व दो टोटी लगाना था।
जनपद खालवा के सीईओ सौरभ सिंह राठौर ने शासन के दिशा-निर्देशों का पालन न करते हुए मनमाने ढंग से सचिवों पर बाह्य एजेंसियो को भुगतान करने के लिए दबाव बनाया। खालवा अंतर्गत रेडीमेड शौचालय प्रदाय करवाए गए। ग्राम पंचायत रोशनी, मलगांव में इस तरह के शौचालय हितग्राहियों को प्रदाय किए गए हैं जिनकी वर्तमान स्थिति दयनीय हैं। इन शौचालयों के निर्माण में लोहे की 20 एमएम पतली चादर, प्लेन एसी सीट को फेब्रिकेशन वर्क करके नट बोल्ट के माध्यम से कसा गया हैं। इसमें लोहा सरिया कुछ भी नही लगाया हैं। एसी सीट भी छत की मानकों के अनुसार नहीं हैं। कुल मिलाकर बाह्य एजेंसियों द्वारा प्रदाय किए गए शौचालयों में मनरेगा के मार्गदर्शी दिशा निर्देशों की पूर्ति नहीं होती हैं। योजना के मार्गदर्शी सिद्घांतो से हटकर बिना जिला पंचायत एवं कलेक्टर से अनुमोदन लिए बिना ही एनजीओ से इन शौचालयों को ग्राम पंचायतों में प्रदाय करवाया गया हैं। जो कि शासन के दिशा-निर्देशो के विपरीत है।
राशि की गई बंदरबाट
ग्राम पंचायत स्तर पर प्रत्येक शौचालय हेतु अकुशल श्रम के तौर पर 2460 रूपए के फर्जी मस्टर भरे गए हैं और मिस्त्री, प्लंबर के नाम से भी 1760 रूपए के फर्जी बिल लगाकर राशि का आहरण किया गया हैं। ग्राम पंचायतों को मानकों से हटकर प्रदाय किए गए शौचालय की बाजार कीमत एवं दर अनुसूची से भी प्राकलन बनवाया जाए तो इस शौचालय पर 5400 रूपए से ज्यादा खर्च नहीं होगा। इस तरह मनरेगा के सिद्घांतों से हटकर राशि की बंदरबांट जनपद स्तर पर सीईओ सौरभसिंह राठौर द्वारा की गई है। भ्रष्टाचार से जुडे इस गंभीर मामले मेंं शिकायतकर्ता गोपाल राठौर द्वारा बताया गया कि इस सारे मामले की शिकायत संभागायुक्त इंदौर, अपर सचिव पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, जिला पंचायत के सीईओ से भी की गई हैं। जिसमें जिला पंचायत सीईओ द्वारा इस संबंध में कलेक्टर द्वारा दल गठित कर जांच करने की बात कही गई।
कागजों पर बना दिए शौचालय
इसी तरह रहली में भी निर्मल भारत अभियान में भ्रष्टाचार सामने आया है। शासन की इस महत्वपूर्ण योजना को निर्माण एजेंसी द्वारा जमकर चूना लगाया जा रहा है। रहली ब्लाक में शौचालयों का निर्माण पंचायतों के माध्यम से किया जा रहा है लेकिन अधिकांश पंचायतों में राशि का दुरूपयोग कर शासन की मंशा पर पानी फेरा जा रहा है। निर्मल भारत अभियान में लाखों का घोटाला प्रमाणित होने के बाद भी संबंधित अधिकारियों द्वारा दोषियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही नहीं कि जा रही है, सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाकर औपचारिकता पूरी की जा रही है। ब्लाक के दस सरपंचो एवं सचिवों द्वारा शौचालयों के निर्माण की लाखो रूपए की राशि आहरित कर शौचालयों का निर्माण नहीं कराया गया है। जनपद द्वारा कई बार सरपंच-सचिव को नोटिस जारी किए गए परन्तु इसके खिलाफ कार्यवाही नहीं किया जाना संदिग्ध है। विभागीय सूत्रों के अनुसार इस गडबडी में संबंधित अधिकारी भी भागीदार है और इसी कारण सरपंचों सचिवों पर कार्यवाही नहीं की जा रही है। ब्लाक की इकलौती पंचायत जरिया खिरिया के सरपंच सचिव पर ही एफआईआर दर्ज कराई गई है बाकी दोषी सरपंचों पर कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही इसका जबाब देने को कोई तैयार नहीं है।
ग्राम पंचायत सागौनी बुदेला, खैराना, रमखिरिया, चौका गढाकोटा, बोरई, बसारी, उदयपुरा, छपरा, पटना बुर्जग के सरपंचो-सचिवो को लगभग डेढ़ माह पूर्व नोटिस जारी कर सात दिवस के अंदर राशि जमा करने के निर्देश जारी किए गए थे। राशि जमा नहीं करने पर एफ आईआर दर्ज करने की चेतावनी दी गई थी परन्तु सरपंचो-सचिवों द्वारा समय सीमा गुजर जाने के बाद भी न तो राशि जमा कराई गई है और ना ही शौचालयों का निर्माण कराया गया है। उक्त पंचायतों में पांच-पांच लाख रूपए से अधिक का फर्जीवाड़ा किया गया है। समग्र स्वच्छता अभियान के ब्लाक समन्वयक अनुपम सराफ का कहना है कि नोटिस के बाद भी सरपंच-सचिवों ने राशि जमा नहीं कराई है। सब इंजीनियार के साथ मौका मुआयना कर रिपोर्ट तैयार की जा रही है शीघ्र ही एफआईआर दर्ज कर कार्यवाई की जाएगी।
सरकार ने पंचायतों से वापस मंगाई राशि
प्रदेश में यह अपनी तरह का पहला मामला है जब एक बार राशि आवंटित होने के बाद सरकार ने उसे वापस बुलाया है। अब गांवों में होने वाले कामों का फिर से सर्वे कराकर यह राशि दी जाएगी। गौरतलब है कि प्रदेश सरकार इस समय स्वच्छता अभियान पर खासा जोर दे रही है। सरकार ने गांवों में रहने वाले गरीब लोगों को घरों में शौचालय बनवाने के लिए बीपीएल कार्डधारकों को 12 हजार रुपए देने का तय किया है। इसके अलावा प्रत्येक ग्राम में सार्वजनिक शौचालय बनवाने की भी सरकार की योजना है। पिछले महीने 475 करोड़ की राशि ग्राम पंचायतों के लिए जारी की गई थी। यह राशि ग्राम पंचायतों में पहुंचते ही सरपंच इस राशि से शौचालय बनवाने की जगह दूसरे कामों में खर्च करने लगे। इसकी भनक जैसे ही पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव को लगी उन्होंने सभी जिला पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को निर्देश दिए कि सात दिन के भीतर सभी पंचायतों से सख्ती से राशि बुलाकर उसे सरकारी खजाने में जमा किया जाए। मंत्री के आदेश मिलते ही सीईओ सक्रिय हुए और पंचायतों से राशि वापस बुला ली। अब यह राशि जिला पंचायतों के खाते में जमा है। सतना कलेक्टर संतोष मिश्रा कहते हैं कि रिकवरी की एनओसी की बाध्यता के अच्छे नतीजे आए हैं। अकेले शौचालय निर्माण मद में फंसी 9 करोड़ रुपए की वसूली कराई गई है। पर यह रकम पर्याप्त नहीं है। जल्द ही सख्त अभियान चला कर दोषियों से वसूली की जाएगी। जरुरत पड़ी तो पुलिस कार्यवाही भी की जाएगी।
विभाग के आदेश के बाद भी राशि न लौटाने वाली एक सौ दस पंचायतों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही की तैयारी कर ली गई है। इन पंचायतों को आरआरसी के तहत रिकवरी के नोटिस जारी किए गए हैं। नोटिस के बाद भी राशि न लौटने पर सरपंच की सम्पत्ति की कुर्की कर राशि वसूल की जाएगी।
पैसों का पॉवरप्ले बनी पंचायतें
मध्य प्रदेश पहला राज्य है, जहां संविधान संशोधन के बाद सबसे पहले पंचायत चुनाव कराए गए थे। कभी पिछड़े एवं वंचित वर्ग के राजनीतिक एवं सामाजिक सशक्तीकरण को लेकर चर्चित हुईं, सूबे की पंचायतें अब आर्थिक अनियमितता एवं भ्रष्टाचार को लेकर चर्चा में हैं। स्थानीय निधि संपरीक्षा द्वारा पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के प्रमुख को सौंपी गई समेकित ऑडिट रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि पंचायतें न तो ऑडिट कराने में रुचि ले रही हैं, न ही इसमें सहयोग कर रही हैं। यहां तक कि हिसाब-किताब रखने की जिम्मेदारियों से भी बच रही हैं। ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि पंचायतों में करोड़ों की अनियमितता हुई है। रिपोर्ट में साफ-साफ कहा गया है, 'अधिकतर जगहों पर मनरेगा के अभिलेख स्थानीय निधि संपरीक्षा विभाग को अंकेक्षण के लिए उपलब्ध नहीं कराने से शासन की इस सबसे महत्वपूर्ण एवं महत्वकांक्षी योजना का विधिवत अंकेक्षण संपादित नहीं हो पा रहा है।Ó
शुरुआती दौर में आर्थिक मामलों में पंचायतों के अधिकार सीमित थे, पर पिछले कुछ साल से पंचायतों के जरिए करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। मनरेगा आने के बाद पंचायतों में पैसों का प्रवाह बहुत तेजी से बढ़ा है, पर ग्राम पंचायतों की ऑडिट स्वंतत्र एजेंसियों से कराने का प्रयास कभी नहीं किया गया। 11वें वित्त आयोग की अनुशंसा के बाद, आखिरकार सूबे के वित्त विभाग को ग्राम पंचायतों एवं ग्राम कोषों का ऑडिट नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के पर्यवेक्षण में स्थानीय निधि संपरीक्षा के जरिए कराने का आदेश निकालना पड़ा। इस आदेश के बाद स्थानीय निधि संपरीक्षा ने ग्राम पंचायतों एवं ग्राम कोषों के अलावा जिला एवं जनपद पंचायतों की भी ऑडिट शुरू की। एक ओर, राज्य में ऑडिटरों की भारी कमी है, जिसकी वजह से सभी पंचायतों की ऑडिट संभव ही नहीं है, तो दूसरी ओर कई पंचायतें ऑडिट में सहयोग ही नहीं करना चाहतीं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरूण यादव कहते हैं, 'यदि प्रदेश के सभी पंचायतों की ऑडिट हो तो वित्तीय अनियमितताओं के जो मामले सामने आएंगे, उनमें अरबों रुपये के भ्रष्टाचार का खुलासा होगा। सरकार का विकास से कोई लेना-देना नहीं है। वह यात्राओं में उलझी हुई है। इसका फायदा मैदानी अमला उठा रहा है। विकास कार्यों एवं मनरेगा के लिए मिलने वाली राशि में भारी भ्रष्टाचार हो रहा है।Ó
पंचायतों में 9,388 लाख का अनियमित भुगतान
प्रदेश की पंचायतें भ्रष्टाचार एवं अनियमितता का ठीहा बन गई हैं। त्रिस्तरीय पंचायतों में कुल 9,388 लाख 12 हजार रुपए का अनियमित भुगतान किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 'ऐसे समस्त भुगतान, जो कि स्थापित नियमों के विपरीत किए गए हैं, अनियमित भुगतान हैं।Ó ग्राम पंचायतों में अनियमित ऑडिट आपत्तियों की संख्या 17,178 है, जिसमें 8,944 लाख 89 हजार रुपये का अनियमित भुगतान हुआ है। इस मामले में पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव के क्षेत्र-सागर संभाग में सबसे ज्यादा 3,404 लाख 76 हजार रुपए का अनियमित भुगतान हुआ है। जनपद पंचायतों में 408 लाख 64 हजार रुपए का अनियमित भुगतान एवं जिला पंचायतों में 34 लाख 59 हजार रुपए का अनियमित भुगतान हुआ है। अनियमित भुगतान की वजह से भ्रष्टाचार की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। पंचायतों में 41.15 लाख रुपए के गबन का मामला सामने आया है। इसमें सरपंच एवं सचिव ने मिलकर कई तरह की तिकड़में लगाईं। गबन के सबसे अधिक मामले इंदौर एवं ग्वालियर संभाग में उजागर हुए हैं। 50 जिला पंचायतों में से महज आठ का अंकेक्षण होने से, गबन का एक प्रकरण सिर्फ रीवा से सामने आया है।
ग्राम पंचायतों द्वारा 16,733 लाख 78 हजार रुपए की अनुदान राशि खर्च ही नहीं की गई। इस मामले में जनपद एवं जिला पंचायतों की भूमिका नकारात्मक रही है। रिपोर्ट में टिप्पणी की गई है, 'केंद्र एवं राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान राशि का उपयोग न हो पाना अत्यंत गंभीर बात है, क्योंकि यह राशि 'राज्य के सर्वांगीण विकासÓ के लिए है। राशि का उपयोग नहीं होने का प्रमुख कारण त्रिस्तरीय पंचायती राज की प्रमुख संस्था जिला एवं जनपद पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों द्वारा अनुदान राशि को समय से ग्राम पंचायतों को उपलब्ध नहीं कराना एवं ग्रामीण यांत्रिकी विभाग के अधीन तकनीकी सेवाओं के लाभ को ग्राम पंचायत एवं ग्राम सभा स्तर तक नहीं पहुंचाया जाना है।Ó इस मामले में भी पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री का क्षेत्र-सागर संभाग आगे है, जहां 6,423 लाख 58 हजार रुपए की अनुदान राशि खर्च नहीं हो पाई। जनपद पंचायत, अनुदान राशि ग्राम पंचायतों को देने के बजाए ब्याज प्राप्ति के लिए खातों में रखते हैं, इसे अत्यंत आपत्तिजनक माना गया है। इन कमियों को छुपाने के लिए जिला पंचायतों ने ऑडिट के लिए मेमो का उत्तर देना तक मुनासिब नहीं समझा।
पंचायतों ने नियम के विपरीत जाकर अग्रिम भुगतान करने में भी दिल खोलकर उदारता दिखाई। इस कारण 716 लाख 88 हजार रुपए अवशेष अग्रिम राशि है। कई निकायों में यह 20-25 साल से लंबित है। ग्राम पंचायतों की वित्तीय एवं कार्य अनियमितता के कारण 132.29 लाख रुपए की राजस्व की हानि भी हुई है। ग्राम पंचायतें नियम के विपरीत जाकर अपने को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा रही हैं। यह भी देखने में आया है कि व्यय करने के मामले में पंचायतें नियमों से परे जाकर बड़े पैमाने पर खर्च कर रही हैं, जो कि एक तरह का भ्रष्टाचार ही है। व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाकर भी जनपद पंचायतों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
अब एमएफएस के जरिए होगा पैमेन्ट
ग्रामीण विकास विभाग ने तय किया है कि अब निर्मल भारत अभियान के पूरे कार्यक्रम की फिर से समीक्षा की जाएगी। इसके बाद ही राशि जारी की जाएगी। यह भी तय किया गया है कि राशि पंचायतों को देने के बजाए अब इलैक्ट्रानिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम (एमएफएस) के जरिए सीधे हितग्राही के खाते में शौचालयों के निर्माण के लिए दी जाएगी। इस राशि के तहत होने वाले अन्य कामों का उपयंत्री और पंचायत समन्वय अधिकारी भौतिक सत्यपान करेंगे इसके बाद ही अतिरिक्त राशि जारी की जाएगी। इस संदर्भ में पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव कहते हैं कि निर्मल भारत अभियान के तहत पंचायतों को दी गई राशि के भ्रष्टाचार की शिकायतें आ रही थीं। राशि का कई पंचायतें गलत उपयोग कर रही थीं। इसलिए राशि वापस बुलवा ली है, अब योजना की फिर से समीक्षा कर जारी किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्र में अब तक लगभग 63 प्रतिशत परिवार शौचालय की सुविधा से वंचित हैं। इस दिशा में कुल शौचालय विहीन परिवारों में से वर्ष 2015-16 में 20 प्रतिशत, वर्ष 2016-17 में 35 प्रतिशत एवं 2017-18 में शेष 45 प्रतिशत परिवारों को शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। संपूर्ण राज्य को 31 मार्च 2018 तक खुले में शौच से मुक्त किए जाने की कार्य योजना बनाई गई है।
1600 करोड़ की दरकार, कई योजना में पैसा नहीं
प्रदेश में दो महीने से अधिक समय तक चले पंचायत चुनावों की वजह से पंचायतों में पैसे का टोटा पड़ गया है। विभिन्न कार्यो सहित कई योजनाओं में बजट जारी करने पर लगाई गई रोक के कारण अब पंचायतों को 1600 करोड़ की दरकार है। वैसे विभाग ने अक्टूबर-नवंबर से ही आवंटन पर रोक लगा दी थी, जबकि पंचायतों के लिए 1830 करोड़ 92 लाख रुपए का आवंटन होना था, जिसमें से पंचायतों को 230 करोड़ 71 लाख की मिल सके, जिसके कारण पंचायतों में कई योजनाओं के कार्यो पर विपरीत प्रभाव पड़ा। वित्तीय वर्ष 2014-15 के लिए राज्य सरकार ने पंचायतों के लिए 1830 करोड़ 92 लाख का बजट जारी किया था, लेकिन पंचायत चुनावों के चलते कई योजनाओं पर आवंटन रोक दिया गया। खासकर पंच-परमेश्वर योजना, मुख्यमंत्री हाट बाजार योजना, कपिल धारा योजना आदि शामिल हैं। केंद्र प्रवर्तित योजना में राज्य सरकार को 1223 करोड़ 70 लाख रुपए मिले थे, जिसमें से आवंटन 388 करोड़ का किया गया और 746 करोड़ 64 लाख रुपए की राशि की अभी दरकार है। पंचायत सचिवों का प्रशिक्षण, पंचायतराज संस्थाओं को प्रभार के मामले में 167.90 करोड़ में से 24.37 करोड़ की राशि मिल सकी। 13वें वित्त आयोग से अनुशंसित योजनाओं के लिए भी पैसा नहीं मिल सका, जबकि गौण खनिज से प्राप्त होने वाली 340 करोड़ 320 करोड़ जारी किए गए। स्टाम्प शुल्क से वसूली से मिलने वाली 342.37 करोड़ में से मात्र 46 करोड़ ही आवंटित किए जा सके और 275.83 करोड़ की राशि की पंचायतों को दरकार है, पंचायत सचिवालयों के संचालन के लिए 89 करोड़ में से 83.78 करोड़ की दरकार पंचायतों को है, जबकि अनुरक्षण के लिए अनुदान के रूप में 10 करोड़, पेयजल के लिए विद्युत व्यय की पूर्ति के लिए 40 करोड़ अटका पड़ा है। साथ ही राजीव गांधी पंचायत सशक्तिकरण योजना में मिलने वाली 72.14 करोड़ की राशि का प्रावधान तो किया गया, मगर राशि जारी नहीं की गई। अब नए वित्तीय वर्ष में इन लटकी हुई योजनाओं के लिए फंड जारी किया जाएगा।
लक्ष्य से भटक गई मप्र सरकार की मर्यादा
मध्यप्रदेश में स्वच्छता के लिए चलाए गए अभियान को भ्रष्टाचार की बुरी नजर लग गई है। इसका परिणाम यह हुआ है कि स्वच्छता के लिए स्वीकृत की गई राशि भ्रष्ट कर्मचारी हजम कर रहे हैं। निर्मल भारत अभियान से लेकर स्वच्छता अभियान तक के नाम पर बड़ी रकम केन्द्र और राज्य शासन की ओर से स्वीकृत की गई थी। परन्तु गांव शहर के गली मुहल्लों से लेकर पाठशाला तक हर तरफ आज भी पर्याप्त साफ-सफाई नजर नहीं आ रही है। 2003 में केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना को मप्र सरकार मर्यादा योजना के नाम से चला रही है उसने शौचालय बनाने का जिम्मा ग्राम पंचायतों को दे रखा है पंच-सरपंच मिलकर गरीबों के इन शौचालयों की दीवारें, छतें, पानी की टंकियां कमोड सैप्टिक टैंक और मौका लगा तो पूरा का पूरा शौचालय ही डकार गए हैं। गांवों में मौजूद ऐसे आधे-अधूरे शौचालयों के अवशेष इस योजना में फैले भ्रष्टाचार को उजागर करते हैं इनमें से ज्यादातर कंडे या भूसा भरने के काम में आ रहे हैं। जिनके पास पैसे थे या जिन्हें शौचालय की जरूरत थी उन्होंने अपने पैसे लगाकर ऐसे आधे-अधूरे शौचालयों को उपयोगी बना लिया है।
पूरी दुनिया में खुले शौच के लिए होने वाली बदनामी से परेशान भारत सरकार ने 2003 में समग्र स्वच्छता अभियान के नाम से गरीबी की रेखा से नीचे के परिवारों के कच्चे-पक्के घरों में शौचालय बनाने की योजना शुरू की थी। सरकार इन बीपीएल परिवारों को घर में शौचालय बनाने के लिए 500 रुपए की प्रोत्साहन राशि देती थी जो धीरे-धीरे बढ़कर 1200 रुपए और 2012 तक 3200 रुपए कर दी गई थी। तब माना गया था कि एक छोटा सा चारदीवारों वाली एक छत एक कमोड, एक सैप्टिक टैंक, एक पानी की टंकी युक्त शौचालय 3500 रुपए में बनकर तैयार होता है। इसमें 300 रुपए का इंतजाम उस व्यक्ति को करना होता था जिसके घर में शौचालय बन रहा होता था। बाकी 3200 रुपए सरकार देती थी।
केंद्र द्वारा 2012 में इस अभियान का नाम संशोधित करके निर्मल भारत अभियान कर दिया गया। मप्र सरकार ने इसे मर्यादा अभियान के नाम से लागू किया। प्रोत्साहन राशि 3200 रुपए से बढ़ाकर 4600 रुपए हो गई साथ में मनरेगा से इसमें 4400 रुपए और जोड़े गए। हितग्राही का अंशदान बढ़ाकर 900 रुपए कर दिया गया। इस तरह शौचालय की लागत 9900 रुपए हो गई। 2014 में इसमें 1000 रुपए और बढ़ाकर 10900 रुपए कर दिया गया पहले जो योजना केवल बीपीएल परिवारों के लिए थी उसमें एपीएल, अनुजाति, अनु.जनजाति, निषक्तजन, भूमिहीन किसान, लघु सीमांत किसान परिवारों को भी इससे जोड़ दिया गया। साथ ही शौचालय निर्माण की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों को सौंप दी गई जिन्हें अपने गांव के जरूरतमंदों के घरों में उनसे 900 रुपए जमा कराकर उनके लिए शौचालय बनवाने थे। लोग 900 रुपए नगद या शौचालय निर्माण में मजदूरी करके भी अपने इस अंशदान का भुगतान कर सकते थे।
स्कूलों में शौचालय के लिए 600 करोड़ का खर्चा
मप्र के 40 हजार स्कूलों में शौचालय निर्माण एवं पुननिर्माण की तैयारियां शुरू हो गईं हैं। इसके लिए करीब 600 करोड़ रुपया खर्च किया जाएगा। सरकार कई अलग अलग माध्यमों से पैसा जुटाने की तैयारी कर रही है, शौचालय इस तरह से बनाने का प्रयास है कि मोदी के स्वच्छता अभियान में अव्वल नंबर मिल जाए। प्रदेश के शौचालय विहीन स्कूलों में अब कॉर्पोरेट सेक्टर और सरकारी कंपनियों की मदद से टॉयलेट बनेंगे। राज्य सरकार धन इकट्ठा करने के लिए मुख्यमंत्री स्वच्छता कोष बना रही है। केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम भी इस अभियान में राज्य सरकार के साथ रहे हैं। सांसद और विधायक निधि का उपयोग भी इसमें किया जाएगा। वर्तमान में राज्य के एक तिहाई सरकारी स्कूलों में टॉयलेट नहीं है या फिर उपयोग करने लायक नहीं बचे। एक रिपोर्ट के मुताबिक छात्राओं का पढ़ाई बीच में छोडऩे का एक कारण स्कूलों में टॉयलेट नहीं होना भी सामने आया है। प्रदेश में प्राथमिक से लेकर हायर सेकंडरी स्तर के स्कूलों में अभी 17, 851 टॉयलेट्स की आवश्यकता है। इनके निर्माण में लगभग तीन सौ करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसके अलावा 23,359 स्कूलों में बने टॉयलेट उपयोग में नहीं आते। इनके पुनर्निर्माण पर लगभग 260 करोड़ रुपए खर्च संभावित है। केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा मध्यप्रदेश में सीएसआर (कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) के अंतर्गत 13363 शौचालयों के निर्माण पर सहमति दे दी है। स्कूल शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार कोल इंडिया लिमिटेड, नेशनल हाइड्रो पॉवर कॉरपोरेशन, गेल, एनटीपीसी आदि ने स्कूलों का चयन भी कर लिया है। केंद्र सरकार के कुछ मंत्रालयों ने भी इसमें रुचि दिखाई है।
शुक्रवार, 6 मार्च 2015
चित्रकूट
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