किसानों का 12,0000,00,000 हड़पा बीमा कंपनियों ने
मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी
6 लाख किसानों को फसल बीमा राशि का इंतजार
भोपाल। यह लगातार तीसरा वर्ष है जब रवि फसलों के पकने और कटने के समय अतिवृष्टि एवं ओलावृष्टि हुई है और किसानों की फसल खेत में ही बर्बाद हो गई है। पिछली दो बार की तरह इस बार भी मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके मंत्रिमंडल के सदस्य खेतों में घूम-घूमकर किसानों के आंसू पोछने को उपक्रम (इसका अर्थ अपनी-अपनी समझ के अनुसार लगाने के लिए आप स्वतंत्र हैं )कर रहे हैं। मुख्यमंत्री किसानों को तत्काल राहत राशि मुहैया कराने की घोषणा कर रहे हैं, अफसरों को तरह-तरह का निर्देश दे रहे हैं, बर्बाद फसलों का सर्वे करने के लिए अलग-अलग तरीके सुझा रहे हैं। यहीं नहीं वे राष्ट्रीय फसल बीमा का लाभ दिलाने की घोषणा कर रहे हैं। वह कहते फिर रहे हैं कि वर्ष 2013 में खरीफ सत्र के दौरान फसलों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए 2187 करोड़ रुपए की बीमा राशि का भुगतान करवा दिया हूं, लेकिन किसान आज भी बीमा राशि के लिए बैंकों का चक्कर लगा रहे हैं। आलम यह है कि पिछले 14 साल में फसल बीमा के लिए प्रदेश के 3 करोड़ 27 लाख किसानों से प्रीमियम के रूप में 12 अरब 44 करोड़ रूपए वसूले गए, लेकिन मौसम की मार पर फायदा मात्र 65 लाख किसानों को ही मिला और वह भी कौडिय़ों में। जिसका परिणाम यह हो रहा है कि पिछले आठ साल में कर्ज के बोझ के तले प्रदेश में करीब साढ़े नौ हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं। फसल बीमा कराने वाले किसानों का कहना है कि अगर हमारी बर्बाद हुई फसलों की बीमा राशि ही मिल जाए तो हम सरकार के मुआवजे की आस में नहीं रहेंगे।
आसमानी कहर से हुई बर्बादी की भरपाई करने का दावा कर किसानों से हर साल फसल बीमा के प्रीमियम के नाम पर करोड़ों की उगाही करने के बाद भी उन्हें धेला भर की मदद नहीं दी जा रही है। पूरा साल गुजर जाने के बाद भी जिले में किसानों को फसल बीमा की राशि नही दी गई है। सुनियोजित तरीके से की जा रही ठगी के कारण लगातार तीसरी फसल बर्बाद हो जाने के बाद जिले के किसानों का गुस्सा अब फसल बीमा करने वाली सहकारी समितियों के कर्ताधर्ताओं के खिलाफ पनप रहा है। जिम्मेदार अफसर सारा दोष शासन की प्रक्रिया पर मढ़ रहे हैं तो सत्ताधारी दल और विपक्ष किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने में खुद को असहाय महसूस कर रहा है।
वर्ष 2013-14 में जहां प्रदेश में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से 49 जिलों के 9,584 गांवों की करीब 10 हजार करोड़ रूपए की फसल तबाह हो गई थी। वहीं इस बार सरकारी आंकलन से 15 और कृषि व मौसम विशेषज्ञों के अनुसार 39 जिलों में फसलों को नुकसान पहुंचा है। प्रदेश सरकार ने किसानों को त्वरित राहत पहुंचाने के लिए 500 करोड़ रूपए की राहत राशि की घोषणा कर दी है, लेकिन अभी न तो कोई बैंक और न ही सहकारी समिति किसानों को राहत देने सामने आई है।
फसल बीमा के नाम पर ठगी का खेल
करीब एक दशक पहले शुरू हुई राष्ट्रीय फसल बीमा योजना का सीधा-सीधा मकसद फसल नष्ट होने की स्थिति में क्षतिपूर्ति करना और किसान को मदद पहुंचाना है। अपने घोषित मकसद की वजह से जाहिर है कि यह योजना काफी लोकलुभावनी दिखाई देती है, लेकिन हकीकत इसके उलट है। बीमा कंपनियों ने बड़ी चालाकी से इसकी ऐसी शर्तें तय की हैं कि हर्जाने का दावा मान्य होने पर कंपनियों को बहुत मामूली भुगतान करना पड़े। मुआवजा भी तब मिलता है, जब तालुका या प्रखंड स्तर पर फसल बर्बाद हुई हो। इससे कम क्षेत्र में नुकसान होने पर भरपाई नहीं की जाती। इतना सब कुछ पक्ष में होने के बाद भी कंपनियों की नीयत किसानों को फायदा देने की नहीं है। फसल बीमा का अग्रिम प्रीमियम वसूल करने वाली बीमा कंपनियां जरूरत पडऩे पर दावा राशि का भुगतान करने में भी आनाकानी करती हैं।
पहले तो किसानों को बिना बताए उनके खातों से फसल बीमा प्रीमियम काट लिया जाता है। जब सूखा या ओलावृष्टि आदि से फसल बर्बाद होती है कई फसलों को गैर अधिसूचित बताकर बीमा कंपनी मुआवजा नहीं देती। लेकिन जो फसलें अधिसूचित हैं उनका मुआवजा देने में भी आनाकानी की जाती है। पिछले साल ओलावृष्टि से बर्बाद हुई गेहूं की फसल के किसानों को अब तक मुआवजे का इंतजार है। हालांकि कृषि महकमा और बीमा कंपनी अपने-अपने स्तर से सर्वे कर चुके हैं। वैसे तो राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना किसानों की भलाई के लिए लागू की गई है। इसलिए किसानों को फसल सुरक्षा करने के उद्देश्य से उनके बैंक खाते से संबंधित बैंक या सहकारी समितियां फसल बीमा का प्रीमियम काट लेती हैं। इस प्रीमियम में आधी धनराशि किसान की होती है और आधी राशि केंद्र और राज्य सरकार समान रूप से वहन करती हैं। लेकिन जब मौसम की प्रतिकूलता और ओलावृष्टि से फसल बर्बाद होती है किसानों को उसका मुआवजा तक नहीं दिया जाता।
किसान को मिलता है सिर्फ 50 पैसे मुआवजा
राज्य के 39 जिलों में हुई ओलावृष्टि से सैकड़ों करोड़ रूपए की फसल बर्बाद हो गई है। हालांकि, किसानों के पास बीमा है, लेकिन इसका फायदा उन्हें नहीं मिलने वाला है। पिछले 14 साल का अनुभव बताता है कि बीमा होने के बावजूद किसानों के हाथ कुछ नहीं लगता है, जबकि कंपनियां हजारों करोड़ रुपए कमा रही हैं। बीमा योजना में भारी खामियां है, जिसका लाभ कंपनियां उठा रही हैं और लाखों की बर्बादी झेलने वाले किसान को भरपाई के नाम पर सिर्फ 50-50 पैसे मिल रहे हैं। जानकारी के अनुसार, 'फसल बीमाÓ करने वाली कंपनियों ने पिछले 14 साल में प्रदेश के 3 करोड़ 27 लाख किसानों से प्रीमियम के रूप में 12 अरब 44 करोड़ रूपए कमाए हैं। गौरतलब है कि कंपनियां केंद्रीय सहकारी बैंकों और उनकी शाखाओं के माध्यम से बीमा करती हैं। किसान अगर फसल का बीमा नहीं करवाएं तो ये बैंक उन्हें कर्ज भी नहीं देते हैं। किसानों का कहना है कि सरकार की गलत योजना से बीमा कंपनियां सीधे तौर पर 65 प्रतिशत से ज्यादा पैसा अपनी जेब में डाल लेती हैं और किसानों को लाखों रुपए की फसल नष्ट होने के बदले में कभी 50 तो कभी 80 पैसे का मुआवजा देकर पल्ला झाड़ लेती हैं। किसानों के प्रतिनिधियों का कहना है कि बीमा कंपनियां फसल बर्बाद होने पर किसानों को प्रीमियम से भी कम राशि का क्लेम देती हैं। यानी वे किसानों से प्रीमियम का पैसा भी हजम कर जाती हैं और मुआवजे की राशि भी खा जाती हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2010 में फसल बीमा के तहत प्रदेश के किसानों ने खरीफ फसलों के लिए 11374.53 लाख स्पए प्रीमियम के तौर पर जमा कराया था,जबकि उन्हें लगभग आधी रकम लगभग 5416.28 लाख रूपए ही दावे के अंतर्गत मिल सके। इसी तरह वर्ष 2012-13 में खरीफ -के लिए 20781.50 लाख रूपए प्रीमिय जमा हुआ और फसल खराब होने पर मिले मात्र 7507.77 लाख रूपए। इस तरह बीमा कंपनिया किसानों को ठग रही हैं।
बीमा कंपनियों को कोई नुकसान नहीं
राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना के अंतर्गत एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी के पास किसानों का बीमा होता है। प्रदेश के जिला सहकारी बैंक और प्राथमिक सहकारी समितियों के जरिए जो किसान अल्पकालीन कृषि ऋण लेते है उनके ऋण की राशि को ही बीमा राशि मानते हुए उसका डेढ़ से साढ़े तीन प्रतिशत तक प्रीमियम राशि शुरूआत में ही काट ली जाती है। बीमा कंपनी केवल उस सीमा तक नुकसान की भरपाई करती है जितनी उन्हें प्रीमियम के रूप में प्राप्त हुई। दावे की राशि ज्यादा होने पर राज्य और केंद्र सरकार आधा-आधा वहन करती है। इस कारण बीमा कंपनी को इसमें कोई नुकसान नहीं होगा। बल्कि जिस वर्ष में ज्यादा प्रीमियम मिलता है और दावा भुगतान कम किया जाता है उस वर्ष उन्हें फायदा होता है।
ऐसे फंसाया जाता है पेंच
फसल बीमा योजना की सबसे बड़ी गड़बड़, योजना का स्वैच्छिक और अनिवार्य होना है। जो भी किसान बैंक या सहकारी संस्था से ऋण लेता है, बैंक उससे बिना पूछे अनिवार्य रूप से प्रीमियम काट लेता है। उसे कोई जानकारी, रसीद या पॉलिसी का कागज नहीं दिया जाता। जिसके चलते किसान को मालूम ही नहीं चलता कि उसकी फसल का बीमा हुआ भी है,या नहीं। मौसम आधारित फसल बीमा योजनाएं हमारे मुल्क में पश्चिम मुल्कों से आई हैं। और सब जानते हैं,कि इसमें विश्व बैंक की सिफारिशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बहुत बड़ा दबाव था। पश्चिमी मुल्कों और हमारे यहां की परिस्थितियों में यदि अंतर करके देखें, तो इसमें बुनियादी फर्क है। यूरोपीय मुल्कों में जहां सैंकड़ो-हजारों एकड़ जमीन के किसान और कंपनियां बहुतायत में हैं, तो हमारे यहां छोटे-छोटे काश्तकार हैं। एक बात और। वहां के किसान संतुष्ट होकर स्वेच्छा से अपनी फसल का बीमा करवाते हैं,लेकिन हमारी सरकारों ने इस बीमे को जबर्दस्ती किसानों पर थोपा है। किसान चाहे न चाहे,उसे बीमा करवाना ही पड़ेगा। आलम यह है कि हमारे यहां सभी फसल बीमा योजनाएं सरकार के अनुदान और सहयोग से क्रियान्वित हो रही हैं। उसके बाद भी तस्वीर कुछ इस तरह से है, पैसा किसान व सरकार का, मुनाफा कंपनियों का और नुक्सान सिर्फ व सिर्फ किसान का। कुल मिलाकर, सरकारों के तमाम दावों और वादो के बाद भी फसल बीमा योजना किसानों के लिए सिर्फ एक छलावा साबित हुई है। लगातार हो रही किसानों की आत्महत्याएं, फसल बीमा योजना की नाकामी को उजागर करती हैं। बीमा कंपनी द्वारा किसानों की फसल का बीमा व्यक्तिगत होता है। लेकिन फसल के नुकसान होने पर मुआवजा सामूहिक मिलता है। प्राकृतिक आपदा के बाद 3 और 5 साल के औसत उत्पादन के आधार पर नुकसान का आकलन होता है। अधिकांश फसल कटाई प्रयोग किसान के सामने नहीं होते। मौसम खराबी का आंकलन करने के लिए हर जगह पर्याप्त लैब और उपकरणों का अभाव है। अऋणी किसानों को नहीं मिल पाता बीमा योजना का लाभ। विडंबना की बात यह है कि एक तरफ किसानों को यहां फसल बीमा का फायदा नहीं मिला,तो दूसरी तरफ बैंक अधिकारी किसानों को कर्ज वसूली के लिए परेशान कर रहे हैं। किसानों पर दंड व ब्याज लगाया जा रहा है।
सरकार की आर्थिक सेहत बिगड़ी
करीब एक लाख करोड़ के कर्ज में डूबे प्रदेश की वित्तीय स्थिति पहले ही गड़बड़ चल रही थी, अब असमय बारिश और ओलावृष्टि ने सरकार की आर्थिक सेहत पर सीधा असर डाला है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की है कि किसानों की मदद को पूरा करने के लिए विभागों के बजट में कटौती की जरूरत पड़ी तो वह भी किया जाएगा। जानकारी के अनुसार सरकार पीडब्ल्यूडी, पीएचई, पर्यटन, खेलकूद, उद्योग संवर्धन, पुलिस इत्यादि महकमे के बजट से कटौती कर किसानों को राहत राशि उपलब्ध कराने की तैयारी कर रही है। यदि यहां से भी व्यवस्था पूरी नहीं हुई तो विकास कार्यो को रोककर राशि जुटाई जाएगी। प्रदेश की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। ओला-पाला से खरीफ की फसल चौपट होने के बाद जैसे-तैसे किसानों ने हिम्मत कर फिर फसल बोई, फसल पक कर तैयार हुई और फिर प्रकृति की मार से फसल बर्बाद हो गई।
कर्ज के जाल में किसान
किसानों की आत्महत्या के पीछे कर्ज एक बड़ा कारण है। लघु और सीमांत किसानों के लिए बगैर कर्ज से खेती करना लगभग असंभव हो गया है। बैंकों से मिलने वाला कर्ज अपर्याप्त तो है ही, साथ ही उसे पाने के लिए खूब भागदौड़ करनी पड़ती है। इस दशा में किसान आसानी से साहूकारी कर्ज के चंगुल में फस जाते हैं। यदि हम पूरे मध्यप्रदेश में किसानों पर कर्ज की मात्रा का आकलन करेंं तो पाते हैं कि प्रदेश के किसान करीब दस हजार करोड़ रूपए से भी ज्यादा के कर्जदार हैं। क्योंकि अपेक्स बैंक के रिकॉर्ड में किसानों पर साढ़े सात हजार करोड़ रूपए कर्ज के रूप में दर्ज हैं। इसमें कम से कम ढाई हजार करोड़ का साहूकारी कर्ज जोड़ दें तो यह आंकड़ा दस हजार करोड़ को पार कर लेता है। सन् 2006 में गठित राधाकृष्णन समिति ने भी किसानों की आत्महत्या के लिए कर्ज को एक मुख्य कारण माना है। मध्यप्रदेश में आत्महत्या करने वाले किसान 20 हजार से लेकर 3 लाख रूपए तक के साहूकारी कर्ज में दबे थे। साहूकारी कर्ज की ब्याजदर इतनी ज्यादा होती है कि सालभर के अंदर ही कर्ज की मात्रा दुगनी हो जाती है। ऐसे में यदि फसल खराब हो जाए तो आने वाले समय में यह संकट और भी बढ़ जाता है।
3 माह से 6 लाख किसानों को फसल बीमा राशि का इंतजार
पिछले रबी सत्र में फसलों को हुए नुकसान की भरपाई के एवज में करीब 6 लाख किसानों को सरकार ने दिसंबर 2014 में फसल बीमा मद में करीब 609 करोड़ रुपए देने की घोषणा की थी, लेकिन तीन माह बाद भी किसानों को उक्त राशि नहीं मिल पाई है। राज्य किसान कल्याण और कृषि विकास विभाग के प्रमुख सचिव राजेश राजोरा ने कहा, 'दावा निपटान समिति जल्द ही दावों की समीक्षा करेगी और इस बात की पूरी संभावना है कि 2013-14 के रबी सत्र के लिए 608 करोड़ रुपये का दावा निपटा लिया जाएगा। इससे गेहूं और चना की फसल को नुकसान के एवज में करीब 5.77 लाख किसानों को मुआवजा मिल सकता है। खरीफ सीजन 2013 के लिए फसल बीमा दावा को पहले ही निपटाया जा चुका है और इसके तहत किसानों के बीच 2187 करोड़ रुपए का मुआवजा वितरित किया गया है।
6 साल में वसूले 53 करोड़, बांटे 24 करोड़
मुख्यमंत्री प्रदेशभर में घूम-घूमकर किसानों को फसल बीमा का लाभ दिलाने का आश्वासन दे रहे हैं, जबकि किसानों को पिछले साल का बीमा अभी तक नहीं मिल सका है। मंदसौर जिले में फसल बीमा योजना के नाम पर किसानों से प्रीमियम तो ली जा रही है, लेकिन क्लेम के नियम-कायदे इतने उलझे हुए हैं कि समय पर दे ही नहीं रहे हैं। छह सालों में कंपनी ने किसानों से 53 करोड़ रुपए वसूले हैं पर बांटे केवल 24 करोड़ रुपए ही है। वर्ष 2012-13 में जिले में 99 हजार 694 किसानों ने प्रीमियम के रुप में 2.53 करोड़ रुपए जमा कराए थे लेकिन एक भी किसान को क्लेम नहीं मिला। वर्ष 2013-14 में तो 57692 में से सिर्फ 18 किसानों को क्लेम मिल पाया। रबी की फसल पर प्राकृतिक कहर टूटने के बाद किसानों को बीमा कंपनी एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया से उम्मीद थी लेकिन प्रीमियम वसूलने के बाद भी सिर्फ 37 लाख रुपए दिए गए। इस तरह से वर्ष 2014-15 में भी फसल बर्बाद होने के बाद किसान क्लेम का इंतजार कर रहे हैं। जिले में 2013 में खरीफ की फसल में अति बारिश से हुए नुकसान में जिलेभर के किसानों में से महज 74 को ही फसल बीमा योजना का लाभ मिला था, लेकिन उन्हें किस तरह मिला यह बात न तो कृषि विभाग कहने के लिए तैयार है और न ही लीड बैंक के कर्ताधर्ता। लीड बैंक के मुताबिक 2014 की रबी की फसल में हुए नुकसान के कई बीमा प्रकरण भोपाल इंश्योरेंस कंपनी को भेजे गए थे, लेकिन अभी तक उनका निराकरण नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री ने सबलगढ़ में इंश्योरेंस का प्रीमियम 31 मार्च तक जमा करवाकर बीमा लाभ दिलाने की घोषणा की है, लेकिन रबी की फसल का बीमा कराने की आखिरी तारीख 31 दिसंबर थी। ऐसे में अब किसानों की फसल का बीमा किस तरह होगा, यह लोगों की समझ में नहीं आ रहा है। जिले के कृषि विभाग के उप संचालक आरपी गोयल कहते हैं कि अंचल के किसान आमतौर पर फसल का बीमा नहीं कराते हैं। जब वे खाद या बैंक से लोन लेते हैं तो बैंक उनकी फसल का बीमा करा देती हैं। तत्कालीन कलेक्टर मदन कुमार के समय फसलों का बीमा कराने के लिए काफी प्रयास किए गए, लेकिन किसान बीमा कराने के लिए तैयार ही नहीं हुए। लीड बैंक मुरैना प्रबंधक टी शाह कहते हैं कि 2013 में खरीफ की फसल में हुए नुकसान के लिए जिले के 74 किसानों को फसल बीमा मिला था। 2014 के प्रकरण अभी भी इंश्योरेंस कंपनी में लटके हैं। निराकरण नहीं हुआ है।
शर्तों ने रोकी किसान की राहत
ओला और बारिश से रबी की फसलें चौपट होने के बाद किसानों को फसल बीमा योजना से भी उम्मीद नहीं है। बीमा की शर्तें ही किसानों के लिए मुसीबत बन रही हैं। किसानों से प्रीमियम तो पूरा वसूला जाता है लेकिन शर्तें इतनी सख्त कि क्लेम मिलना नामुमकिन ही होता है। इस पर भी यदि क्लेम मिल भी जाता है तो वो भी नहीं के बराबर ही होता है। प्रदेश में फसल बीमा के हालात ये हैं कि कई जिलों के किसान को तो दो साल में एक बार भी क्लेम नहीं मिला। कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन भी मानते हैं कि फसल बीमा में विसंगतियां हैं। किसानों को लाभ नहीं मिल रहा है। बावजूद इसके प्रदेश सरकार बीमा नियमों में सुधार की दिशा में अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी है। रायसेन जिले के संग्रामपुर गांव के लालाराम की 15 बीघा की फसल दो साल पहले ओलों से नष्ट हो गई थी। फसल बीमा था, दो हजार प्रीमियम भी जमा किया लेकिन उन्हें क्लेम की राशि महज 15 सौ रुपए ही मिली। विदिशा के बिलरई निवासी हरनाम सिंह रघुवंशी की अतिवृष्टि से पिछले साल 20 बीघा का सोयाबीन नष्ट हो गया था। फसल पर 50 हजार रुपए से अधिक की लागत आई और बीमा क्लेम महज 12 सौ रुपए ही मिला। बैतूल जिले के घोड़ाडोंगरी के कोयलारी गांव के किसान राजेश यादव की 25 बीघा की वर्ष 2013 की रबी और खरीफ की फसल ओला, बारिश के कारण बर्बाद हो गई थी। दोनों फसलों बीमा का क्लेम महज 12 सौ रुपए मिला।
बैतूल जिले में वर्ष 2013-14 में रबी और खरीफ मौसम की फसलों के लिये 68 हजार 608 किसानों से 4 करोड़ 18 लाख रुपए से अधिक राशि फसल बीमा का प्रीमियम जमा करने के लिए वसूल की गई है। सहकारी समितियों के माध्यम से जिले भर में रबी और खरीफ मौसम की फसलों के लिये खाद और बीज क्रय करने वाले किसानों से फसल बीमा के लिए प्रीमियम राशि की वसूली की गई है। जिले में पिछले साल की रबी और खरीफ मौसम की फसलों के लिये जमा किए गए प्रीमियम की बीमांकित राशि करीब सवा अरब रुपए है। दोनों फसलों को मौसम के कहर से हुए नुकसान के बाद प्रशासन द्वारा किए गए सर्वे में केवल खरीफ मौसम में सवा अरब से अधिक की क्षति का आंकलन किया गया था। सरकारी तौर पर तो किसानों को मुआवजा बांट दिया गया लेकिन फसल बीमा की राशि का आज तक किसान इंतजार कर रहे हैं। फसल बीमा के लिए जिले में एग्रीकल्चर इश्योरेंस कंपनी को अधिकृत किया गया है। इस कंपनी को किसानों की सूची और प्रीमियम की राशि भेज दी जाती है और फसल कटाई प्रयोग के अलावा आनावारी की रिपोर्ट के आधार पर कंपनी बीमा दावे स्वीकार करती है। फसल बीमा करने के लिये जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक के अलावा राष्ट्रीयकृत बैंकों से किसान क्रेडिट कार्ड बनाने वाले किसानों से भी प्रीमियम की वसूली की जाती है।
बैतूल जिले की शाहपुर तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम सोहागपुरढाना के कृषक राजेश सिनोटिया ने बताया कि उनके द्वारा सोसायटी में फसल बीमा का प्रीमियम तो जमा किया गया था। लेकिन आज तक लाभ नहीं मिल पाया है। उनके खेत के आसपास के सभी किसानों को बीमा का लाभ दिया गया लेकिन उन्हे लाभ नहीं मिल पाया है। राजेश ने बताया कि पिछले साल सोयाबीन की फसल अधिक बारिश होने और गेहूं की फसल ओलावृष्टि होने की वजह से पूरी तरह से बर्बाद हो गई थी। तमाम जगह शिकायत करने के बाद भी केवल यह आश्वासन दिया जा रहा है कि बीमा कंपनी के द्वारा अभी राशि नहीं दी गई है। फसल बीमा के नाम पर किसानों से हो रही ठगी के मामले में आठनेर ब्लाक सबसे अव्वल है। इस ब्लाक में सैकड़ों किसानों को फसल बीमा के नाम पर चवन्नी भी नहीं मिल पाई है। आठनेर ब्लाक के ग्राम सूखी निवासी फगनसिंह धुर्वे ने बताया कि एक साल पहले उसके द्वारा सोसायटी से खाद खरीदी गई थी तब डेढ़ हजार रुपए फसल बीमा का प्रीमियम भी जमा किया गया था। दो साल बीत गए लेकिन फसलों के बर्बाद हो जाने के बाद भी धेला भर नहीं मिल पाया है।
बैतूल जिला कांग्रेस अध्यक्ष समीर खान कहते हैं कि अच्छे दिन का ढोल पीटने वाली सरकार की पोल हर कदम पर खुल रही है। अन्नदाता बर्बाद हो गया है और उनके हक की राशि सरकार दबाए बैठी है। किसानों को फसल बीमा का लाभ जल्द दिलाने के लिए कांग्रेस सड़क पर उतरेगी और सरकार की पोल खोलेगी। उधर, बैतूल जिला सहकारी बैंक के महाप्रबंधक लता कृष्णन कहती है कि पिछले वर्ष की रबी और खरीफ मौसम की फसलों का प्रीमियम किसानों से वसूल कर बीमा कंपनी को दिया गया है। अभी तक पिछले साल की बीमा राशि प्राप्त नहीं हो पाई है। इस वर्ष की रबी मौसम की फसलों का बीमा किया जा रहा है।
बीमा योजना की सुविधा बनी असुविधा
सुनने में आसान लगने वाली फसल बीमा योजना की सुविधा किसानों के लिए टेड़ी खीर साबित हो रही है। पहले तो इस योजना के दायरे में किसानों का आना ही मुश्किल होता है। दायरे में आ भी जाएं, तो फसल का नुकसान साबित करने और क्लेम पाने में रात-दिन एक करना पड़ता है। तमाम दुविधाओं को देखते हुए जिले के किसानों ने इससे तौबा कर ली है। अनिवार्य बीमा के दायरे में आने वाले ऋणधारक किसानों को छोड़ दिया जाए, तो निजी तौर पर आगे आकर बीमा कराने वाले किसानों की जिले में सं या न के बराबर है। फसलों के नुकसान के आकलन के लिए जिला प्रशासन द्वारा तैयार रिपोर्ट को बीमा कंपनी मान्य नहीं करती है। इसके लिए उसकी टीम अलग से सर्वे करती है और नुकसान तय करती है। कंपनी क्षेत्र में हुए नुकसान को आधार बनाती है, न कि बीमित किसान की फसल को। यदि सिर्फ बीमित किसान की फसल किसी आपदा का शिकार हुई है, तो उसे मान्य नहीं किया जाएगा।
एक साल बाद क्लेम
तमाम उलझनों के बाद किसानों का नुकसान मान भी लिया जाए, तो क्लेम की राशि मिलने में एक साल इंतजार करना होता है। यानी खरीफ की फसल में नुकसान होने पर उसका क्लेम अगली खरीफ की फसल में दिया जाएगा। कृषि विभाग के अनुसार अधिसूचित फसलों को तय करने के लिए क्षेत्र में उस फसल के पांच साल के उत्पादन को देखा जाता है। उसके हिसाब से मौजूदा सीजन में उसके उत्पादन का आंकलन करते हुए उसे अधिसूचित किया जाता है। एक जिले में आम तौर पर तीन से चार फसलों को अधिसूचित किया जाता है। फसल बीमा का काम जिला सहकारी बैंक के माध्यम से किया जाता है। यह सुविधा खास तौर से उन किसानों को मिलती है, जिन्होंने बैंक से ऋण ले रखा है। बैंक द्वारा ऋण राशि में ही उनका प्रीमियम समायोजित कर दिया जाता है। इसके अलावा कोई किसान अलग से बीमा का लाभ लेना चाहे, तो उसे नकद प्रीमियम देने के साथ ही क्लेम पाने के लिए भटकना पड़ता है। इन मुश्किलों से बचने के लिए किसान अलग से फसल बीमा का लाभ नहीं लेते हैं।
हमे पता नहीं कहां हो रहा सर्वे
ओलावृष्टि और बारिश से फसल बर्बाद होने के बाद तबाह किसानों को मुआवजा देने के लिए शासन और प्रशासन ने अपने-अपने स्तर पर घोषणा तो कर दिया है,लेकिन किसानों के खेतों पर सर्वे करने के लिए अभी तक कोई नहीं पहुंचा है। भोपाल जिले के कुछ गांवों का दौरा कर सर्वे के बारे में किसानों से पूछा गया तो उन्होंने ही सवाल पूछ लिया कि आखिर सर्वे हो कहां रहा है? ज्यादातर किसान कह रहे हैं कि उनके यहां सर्वे के लिए कोई नहीं आया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्देश पर कलेक्टर ने जिला प्रशासन और कृषि विभाग के अधिकारियों को ओला और बारिश में हुए नुकसान का आकलन करने के निर्देश दिए थे। उसके बाद से सर्वे शुरू हुआ है। जिला प्रशासन का दावा है कि टीमों ने क्षेत्र में सर्वे कर लिया है, लेकिन अधिकांश क्षेत्रों में टीमें नहीं पहुंचने की बात कह रहे हैं। तूमड़ा गांव के निवासी नर्मदा पटेल ने बताया कलेक्टर साहब ने कहा था कि जल्द ही टीम सर्वे करने जाएगी। क्षेत्र में हजारों एकड़ फसल तबाह हो गई है, लेकिन अभी तक कोई सर्वे करने नहीं पहुंचा। खेतों में पानी भरने से फसल खराब हो गई है, लेकिन सर्वे के लिए कोई नहीं आया। कांहासैया निवासी कमल ने बताया, एक एकड़ में गेहूं बोया था। फसल बर्बाद हो गई। पटवारी कह रहा है, गेहूं के सर्वे का निर्देश नहीं है। इसी गांव के निवासी संतोष पटेल का तीन एकड़ में बोया चना बर्बाद हो गया है। रामकेश पटेल का नौ एकड़ चना खराब हुआ है। इन्होंने बताया कि पटवारी आया था, लेकिन सर्वे किए बिना ही लौट गया। परवलिया सड़क निवासी ब्रजमोहन ने कहा कि सर्वे अभी किया गया है, जबकि फसल चार दिन बाद सूखेगी। अभी नुकसान मामूली दिख रहा है। लक्ष्मण ने बताया उनका 2.5 एकड़ चना बर्बाद हो गया, लेकिन सर्वे नहीं हुआ।अम्बिका शुक्ला ने बताया कि पटवारी को सर्वे के लिए फोन किया, तो उसने कह दिया कि आदेश नहीं मिला है। छांद निवासी राजा खान ने बताया कि उनकी दस एकड़ से ज्यादा फसल तबाह हो गई है, लेकिन अभी तक गांव में सर्वे करने कोई नहीं पहुंचा। इसी तरह जिले के ललोई,जमूसर खुर्द,आदमपुर छावनी आदि गांवों में दलहनी फसलें ओला, पानी से चौपट हो गई हैं। ओला पानी से क्षेत्र में दलहनी फसलों को सौ प्रतिशत नुकसान पहुंचा है, तो गेहूं की फसल खेतों में बिछ गई है।
तिल-तिल मरती फसल देख रो रहे किसान
बड़ी मेहनत से फसल बोई। देखभाल की और बारिश का पानी भरने के कारण अब फसल तिल-तिल करके सूख रही है। किसानों को पता है कि पानी सूखने तक फसल नष्ट हो जाएगी और इसके कारण उनके आंसू नहीं रूक रहे हैं। यह हाल हुजूर तहसील के कई गांवों का है। खेतों में पानी भरने से गेहूं के पौधों की जड़ें सड़ गई हैं और पत्तियां पीली पडऩे लगी हैं। किसानों का कहना है कि जड़ें सड़ गई हैं, इसलिए अब इन पौधों का सूखना भी तय है। मटर सूखी और टमाटर के पौधे काले-मटर के पौधे भी सूख गए हैं। फलियां पानी में डूबने के कारण सड़ गई हैं। उनमें कीड़े लगने लगे हैं। टमाटर और आलू के पौधे भी सूखकर काले हो गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पटवारी ने गेहूं में नुकसान न होने की बात कहकर सर्वे से इनकार कर दिया है, जबकि खेतों में अभी भी पानी भरा है। पौधे सूख रहे हैं। सब्जियों के नुकसान के लिए यह कहकर टाला जा रहा है कि सिर्फ दलहन के सर्वे का आदेश है। जिला प्रशासन का दावा है कि तहसीलदार तथा राजस्व व कृषि विभाग की टीम गांवों में जाकर नष्ट हुई फसल का सर्वे किया है। सात दिन में सर्वे पूरा करने के लिए कहा गया था। हुजूर तहसील के ग्रामीण इलाकों में हुई ओलावृष्टि के बाद तूमड़ा, र्इंटखेड़ी राजस्व सर्किल के अंतर्गत आने वाले गांवों की फसल पर सीधा असर पड़ा है।
अब कैसे होगी बेटी की शादी और बेटे की पढ़ाई
मौसम की मार झेल रहे किसान अब कर्ज में डूबते जा रहे हैं, खासतौर से छोटे किसानों के लिए मौसम अभिशाप बनकर सामने आ रहा है। स्थिति यह है कि किसान को फसल लगाने के लिए वर्ष में दो बार कर्ज लेना पड़ा, पहले कर्ज लेकर फसल लगाई। सोचा कि फसल आने पर कर्ज भी चुक जाएगा और घर की हालत भी बदल जाएगी, लेकिन शायद कुदरत को यह मंजूर न था और किसान की पहली फसल बारिश की भेंट चढ़ गई। कर्ज का बोझ बढ़ता गया और कर्ज को चुकाने के लिए किसान अगले सीजन पर फिर कर्ज लेकर रबी की फसल बो दी, लेकिन इस बार भी मौसम की बेरूखी किसान को भारी पड़ गई और दोबारा कर्ज लेकर किसान मुसीबतों में फंस गया। जी हां, हम बात कर रहे हैं क्षेत्र के उन किसानों की जिन्होंने कर्ज लेकर पहले खरीब की फसल बोई और अब रबी की फसल को मौसम की वजह से बर्बाद होता देख रहे हैं। ऐसे ही एक मामला जिले की बैरसिया तहसिल अंतर्गत आने वाले जमुसर खुर्द गांव निवासी लीलाराम का है। जिसने बीज और खाद के लिए कर्ज लेकर जुलाई माह में अपनी 5 एकड़ जमीन में सोयाबीन बोया लेकिन अत्याधिक बारिश की वजह से सोयाबीन की फसल खेत में ही सड़ गई और लीलाराम की उस उम्मीद पर पानी फिर गया। लीलाराम को उम्मीद थी वह फसल आने पर वह अपनी लाडली की शादी धूमधाम करेगा और अन्य बच्चों की परवरिश भी ठीक से हो जाएगी। रबी का सीजन आते ही पहले से कर्ज में डूबे लीलाराम ने एक बार फिर किसानी जुआ खेलने की सोचकर खाद,बीज खरीदने सेवा सहकारी बैंक से कर्ज ले लिया। उसने बैंक से 12 हजार रुपए खाद के नाम पर कर्ज लिया और 35 हजार रुपए फसल की लागत के लिए कर्ज ले लिया। कर्ज लेकर उसने गेहूं की बुवाई की, लेकिन बेमौसम हुई बारिश से उसकी फसल काली पड़ गई है और खेत से बीज निकलना भी मुश्किल है। लीलाराम के सामने अब घर चलाने के भी लाले पड़ गए हैं और अब ऐसे में उसकी बेटी के विवाह और पुत्र सोनू की पढ़ाई की चिंता सताने लगी है। गौरतलब हो कि सोयाबीन की फसल खराब होने पर सुखदेव के लाख प्रयासों के बाद भी उसकी जमीन का सर्वे नहीं किया गया और न ही मुआवजा संबंधी कार्रवाई की गई। इस संबंध में उसने जनसुनवाई समेत कई बार अधिकारियों के चक्कर काटे।
कैसे हो बेटे का इलाज
चार एकड़ की भूमि की खेती के सहारे अपने जीवन की गाड़ी चला रहे गुढारीघाट निवासी किसान भंवर लाल का कहना है कि खरीफ सीजन में बैंक से सोयाबीन की खेती के लिए 50 किलो सोयाबीन का बीज, खाद का कर्ज लेकर बोवनी की, लेकिन अधिक बारिश से फसल चौपट हो गई। पुन: हौसला करके 50 हजार का पुन: बैंक से कर्ज उठाकर इस सीजन में चनें और गेंहू की खेती की। जिसमें खराब मौसम की वजह से फसल में पाला लगने जाने से चने की फसल चौपट हो गई। उसने ने बताया कि उसका बेटा बेनी बीमारी से ग्रसित है और अब उसकी बीमारी के इलाज का भी इंतजाम नहीं है। इस तरह से देखा जा रहा है किसानों ने कर्ज लेकर फसलें बोईं लेकिन मौसम ने उनके कर्जे को चुकवाने की जगह और बढ़ा दिया। जिले में पिछले साल रबी मौसम की फसलों पर भी ओलों और अतिवृष्टि की ऐसी मार पड़ी थी कि किसानों के खेतों में चारों ओर बर्बादी फैल गई थी। गेहूं, चना और मसूर की फसलें बुरी तरह से प्रभावित हुईं और किसान तंगहाल हो गए थे। इसके बाद किसानों को खरीफ मौसम की फसलों से कुछ उम्मीद बंधी थी लेकिन लगातार बारिश से किसानों के खेतों में लगी धान, मक्का, ज्वार और सोयाबीन की फसलें पूरी तरह से चौपट हो गईं थी। किसानों को उम्मीद थी कि फसल बीमा का उन्हें लाभ मिल जाएगा लेकिन पूरा साल गुजर जाने के बाद भी राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं बच पाई है।
किसानों के कर्ज की वसूली स्थगित
प्रदेश सरकार ने फिलहाल ओला और बेमौसम बरसात से फसलों को हुए नुकसान के चलते 50 प्रतिशत से ज्यादा नुकसान उठाने वाले किसानों के कर्ज की वसूली स्थगित कर दी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि अल्पावधि ऋणों को मध्यावधि ऋणों में बदल दिया जाएगा और उनका ब्याज सरकार देगी। प्रभावित किसानों को खाद, बीज जीरो प्रतिशत ब्याज दर पर मिलेगा। मुख्यमंत्री का कहना है कि राज्य सरकार ने प्रभावित किसानों की मदद के लिए फौरी तौर पर 500 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। जितनी भी आवश्यकता होगी, उतनी राशि दी जाएगी। किसानों को फसल बीमा लाभ दिलवाने के लिए सभी कदम उठाए जायेंगे, जिससे नुकसान की काफी हद तक भरपाई हो सकेगी। वह कहते हैं कि पिछले साल प्रदेश में किसानों को 2187 करोड़ की राशि फसल बीमा में दिलवाई गई, जो देश में सबसे ज्यादा है। इस बार 50 प्रतिशत से अधिक नुकसान पर 15 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर और सब्जी तथा मसालों की फसलों के नुकसान पर 26 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से राहत दी जाएगी। व्यक्ति की मृत्यु पर 1.5 लाख, पशुओं की मृत्यु पर 16 हजार 500 और छोटे जानवरों की मृत्यु पर 10 हजार रुपए की सहायता दी जाएगी। प्रभावित किसानों की बेटी की शादी के लिए 25 हजार रुपए की सहायता दी जाएगी। जिन किसानों की पूरी फसल नष्ट हो गई है, उन्हें अगली फसल तक गेहूं, चावल और नमक एक रुपए प्रति किलो की दर से दिया जाएगा।
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