शुक्रवार, 15 मई 2015
मप्र के 22,000 गांवों में सूखे की आहट
48 फीसदी कुओं में भूजल स्तर गिरा
ओलावृष्टि-बेमौसम बारिश के बाद सूखा कहर बरपाने को तैयार
गांवों में पानी के लिए सरकार ने बनाया 2,000 करोड़ का प्लान
विनोद उपाध्याय
भोपाल। पिछले साल देश के कई हिस्सों में पड़े सूखे और इस साल मार्च में हुई बेमौसम बारिश के बाद अब प्रदेश में सूखे के आसार निर्मित होने लगे हैं। प्रदेश के 48 फीसदी कुओं का भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। इस कारण करीब 22,000 गांवों में सूखे की संभावना बढ़ गई है। सूखे की संभावना को देखते हुए पीएचई विभाग ने प्रदेश के 15,000 गांवों में पानी पहुंचाने के लिए 2,000 करोड़ का प्लान बनाया है।
मप्र स्टेट ग्राउंड वॉटर सर्वे डिपार्टमेंट के अनुसार, लगातार दोहन के कारण प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में दिनों दिन भूजल स्तर गिर रहा है। जैसे-जैसे पारा ऊपर चढ़ रहा है। वैसे ही भूजल स्तर तेजी से पालात की ओर जाने लगा है। इस साल अभी तक कुछ जिलों में जलस्तर 45 से 62 मीटर तक नीचे खिसक चुका है। भूजल स्तर इसी तेजी से गिरता रहा तो गर्मी के मई-जून माह में लोगों को गंभीर पेयजल संकट से जूझना पड़ सकता है। जिन जिलों में तेजी से भूजल स्तर गिर रहा है उनमें रीवा, सतना, सीधी, सिंगरौली, शहडोल, अनूपपुर, उमरिया, डिंडौरी, जबलपुर, कटनी, छिंदवाड़ा, बालाघाट, नरसिंहपुर, मंडला, सागर, पन्ना, टीकमगढ, छतरपुर, रायसेन, विदिशा, दमोह, सिहोर, ग्वालियर, गुना, अशोकनगर, शिवपुरी, दतिया, भिंड, मुरैना, श्योपुर, इंदौर, धार, मंदसौर, उज्जैन शाजापुर, देवास, रतलाम, खंडवा, बुरहानपुर, बडवानी, झाबुआ और अलीराजपुर जिले हैं। ये जिले इस बार सूखे की चपेट में आ सकते हैं। भूजल स्तर की पहली लेयर 35 मीटर की होती है। जिसका पानी अब खत्म हो चुका है। वर्तमान में 70 मीटर वाली दूसरी लेयर का पानी हैंडपंपों और नलकूपों के माध्यम से मिल रहा है। गर्मी के दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को पेयजल संकट का समाना करना पड़ सकता है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की ताजा रिपोर्ट ने मध्यप्रदेश सहित सभी राज्यों की भूजल का गिरता स्तर ने सबको अवाक कर दिया है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के अनुसार मध्यप्रदेश के 1031 विशेषित कुओं में से 555 (48 प्रतिशत कुओं में भूजल का स्तर गिरा है। चौकाने वाले रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि 2.13 मीटर प्रति वर्ष की दर से सूबे के कुओं में भूजल का स्तर में गिरावट हो रहा है।
46 हजार जल स्त्रोत सूखे
केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के अनुसार,प्रदेश में जल संकट गंभीर रूप ले चुका है क्योंकि यहां भू जल स्तर 35 से 50 मीटर नीचे तक चला गया है। हाल यह है कि प्रदेश के 46,689 जल स्त्रोत सूख गए हैं। सबसे ज्यादा जल स्तर 50 मीटर सीहार जिले में नीचे गया है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में 46,689 जल स्त्रोत सूख चुके हैं। इनमें 46094 हैंडपंप और 595 लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के कुएं भी शामिल हैं। भिंड जिले को छोड़कर प्रदेश का एक भी जिला ऐसा नहीं है जहां जल स्त्रोत न सूखे हों। इंदौर का जल स्त्रोत सूखने के मामले में सबसे बुरा हाल है जहां 3662 हैंडपंपों ने पानी देना बंद कर दिया है। इसी तरह उज्जैन में 3113, रतलाम में 3091, देवास में 3038 जल स्त्रोत सूख गए हैं। केंद्रीय जल संसाधन विभाग के भू जल बोर्ड द्वारा तैयार किए गए आंकड़ों के आधार पर प्रदेश में टीकमगढ़ को छोड़कर हर जिले में भूजल स्तर नीचे चला गया है और भिंड के अलावा सभी जिलों में जल स्त्रोत सूखे हैं। उधर,मप्र में जमीन के भीतर का पानी और नीचे पहुंचने से सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। मप्र स्टेट ग्राउंड वॉटर सर्वे डिपार्टमेंट के अनुसार, इस बार सूखे का असर सबसे ज्यादा मालवा अंचल के जिलों पर पड़ेगा। विभाग की इस रिपोर्ट से प्रदेश में जहां सूखे की आशंका बढ़ गई है। वहीं सरकारी महकमे में इस बात पर चर्चा भी तेज हो गई है कि ऐसे में भूजल दोहन को कैसे रोका जाए। ओवर एक्साप्लाटेड एरिया (सबसे ज्यादा प्रभावित) में इंदौर, उज्जैन और ग्वालियर संभाग के जिले शामिल हैं। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है, इन संभागों के रहवासियों की भूजल पर निर्भरता अधिक है। अधिकारियों की माने तो इन जिलों में अन्य जल स्त्रोतों के उपयोग को बढ़ाने के भी सुझाव विभाग ने दिए हैं। इस रिपोर्ट के जारी होने के बाद पानी को लेकर सरकार की मुश्किलें और बढ़ती दिखाई दे रही है। मालवा में बीते पांच सालों से गिरते जल स्तर को देखते हुए विभाग ने भीषण सूखे की आंशका जाहिर की है।
मप्र स्टेट ग्राउंड वॉटर सर्वे डिपार्टमेंट के अनुसार प्रदेश के दस जिलों के 24 ब्लॉकों को ओवर एक्सप्लावटेड एरिया घोषित किया गया है। अर्थात यहां भूजल का दोहन अत्यधिक खतरनाक स्तर को भी पार कर गया है। इसके अलावा चार ब्लॉकों को क्रिटिकल घोषित किया गया है। जबकि वर्ष 2009 की तुलना में सेमी क्रिटिकल ब्लॉकों की संख्या में 6 का इजाफा हो गया है। वर्तमान में प्रदेश में सेमी क्रिटिकल ब्लॉकों की संख्या 61 से बढ़कर 67 पहुंच गई है। भूजल स्तर की सबसे खराब स्थिति मालवा क्षेत्र की आंकी गई है। ओवर एक्सप्लावटेड एरिया में मालवां क्षेत्र के 22 ब्लॉक शामिल है। प्रभावित जिलों में इंदौर, देवास, धार, मंदसौर रतलाम, सीहोर, शाजापुर, बड़वानी के साथ उज्जैन नाम आता है।
48 फीसदी कुओं में भूजल स्तर गिरा
प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों के उपलब्धता में मनुष्य की छेड़छाड़ ने भयावह स्थिति खड़ा कर दिया है। एक ओर हवा के झोके जहरीली होती जा रही है तो दूसरी ओर प्रकृति की अनमोल संसाधन भूजल का स्तर भी तेजी से गिरता जा रहा है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की ताजा रिपोर्ट ने मध्यप्रदेश सहित सभी राज्यों की भूजल का गिरता स्तर ने सबको अवाक कर दिया है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के अनुसार मध्यप्रदेश के 1031 विशेषित कुओं में से 555 (48 प्रतिशत कुओं में भूजल का स्तर गिरा है। चौकाने वाले रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि 2.13 मीटर प्रति वर्ष की दर से सूबे के कुओं में भूजल का स्तर में गिरावट हो रहा है। हालांकि सबसे अधिक राजस्थान के 877 कुओं में से 521 कुओं में 3.96 मीटर प्रति वर्ष की दर से गिरावट देखा गया है जबकि तमिलनाडू के 736 कुओं में से 363 कुओं में 3.14 मीटर प्रति वर्ष की दर से गिरावट देखी गयी है। दिल्ली (85 प्रतिशत), आंध्रप्रदेश (74), चंडीगढ़ (71), झारखंड (73), हिमाचल प्रदेश(68), पश्चिम बंगाल (66) प्रतिशत कुओं में गिरावट देखी गयी है। हालांकि केंद्र सरकार विभिन्न स्कीमों के माध्यम से तकनीकी एवं वित्त्तीय सहायता देकर जल संसाधन में संवर्धन, संरक्षण एवं प्रभावी प्रबंधन के लिए राज्य सरकारों के प्रयासों में सहयोग देकर देश में जल संरक्षण के उपायों को प्रोत्साहित करती है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड ने भूजल के कृत्रिम पुनर्भरण के लिए एक मास्टर योजना तैयार की है।
करोड़ों खर्च, नहीं बढ़ा जल स्तर
मध्यप्रदेश सरकार ने भू जल स्तर को बढ़ाने के लिए करोड़ों रूपए की लागत से भू-जल स्तर को बढ़ाने के लिए वाटर सेट योजना ग्रामीण क्षेत्रों में लागू की थी। जिसके तहत हरियाली परियोजना के नाम से इस योजना को ग्रामीण क्षेत्र में लागू किया गया। जिसमें उन स्थानों का चयन किया गया था। जिन किसानों के खेतों में सिंचाई के साधन नहीं है उन स्थानों का भू-जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। हरियाली परियोजना में जल स्तर ऊपर लाने के लिए छोटे-छोटे चेक डेम एंव नदी, नालों पर स्टाप डेम बनाकर पानी को रोका जाने का काम किया जाता है। पांच वर्ष में भूमि का जल स्तर ऊपर उठाने के लिए हरियाली परियोजना के माध्यम से करोड़ों रूपए खर्च किए जा चुके है। लेकिन जल स्तर नहीं बढ़ सका। हरियाली परियोजना ने किए जल स्तर बढ़ाने के सारे कार्य मात्र एक औपचारिकता बनकर रह गए है। जिन नालों पर चेक डेम और स्टाप डेमों का निर्माण किया गया। उन डेमो में विगत पांच वर्षो से पानी रूका ही नहीं है क्योंकि इन डेमों में पानी रोकने वाले गेटों को लगाया ही नहीं गया। इसके कारण सारा पानी व्यर्थ बहजाता है। जिससे लाखों की लागत से बने स्टाप डेमों का फायदा किसानों को नहीं मिल पा रहा है।
कारगर साबित नहीं हुई योजना
अभी तक जिन जिलों में यह योजना संचालित की गई है, वहां के अनुभव कड़वे साबित हुए हैं। प्रदेश में नल-जल योजना संधारण, रखरखाव की कमी के चलते फेल हुई है। वहीं ग्राम पंचायतों की उदासीनता भी सामने आई है। जिन ग्राम पंचायतों में यह योजना संचालित की गई थी, वहां समय पर विद्युत बिलों के भुगतान नहीं होने के कारण ये बंद हो गई। जबकि कई जगह अधिकारियों की साठ-गांठ से योजना में हुए भारी भ्रष्टाचार के कारण योजना फ्लॉप हुई है। राज्य सरकार ने इन सभी खामियों को देखते हुए योजना में बदलाव करने का निर्णय लिया है। इसके अंतर्गत योजना की जिम्मेदारी ठेकेदारों को दी जाएगी। वह 20 वर्ष तक इसके संधारण की जिम्मेदारी भी उठाएंगे, जिससे योजना दूरगामी बनी रहे। इसमें अहम रोल ग्राम पंचायतों का भी होगा। ग्राम पंचायतों में योजना के संचालन के लिए पेय जल समिति का गठन किया जाएगा। यह समिति ग्राम के लोगों से तय की गई पेयजल की राशि एकत्र कर बिल के रूप में जमा करेगी।
बांधों में कैद हुआ पानी
मप्र में हर साल गर्मी में गहराते जल संकट के पीछे नदियों पर बनने वाले बांध और डैम हैं। नर्मदा, सोन, सिन्ध, चम्बल, बेतवा, केन, धसान, तवा, ताप्ती, शिप्रा, काली सिंध आदि नदियों का पानी मैदानी इलाकों में पहुंचने की बजाय बांध और डैम में कैद होकर रह जाता है। एक अनुमान के अनुसार बाणसागर, मणीखेड़ा, कोलार, केरवा, बरगी, तवा, संजय सरोवर, इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर,सरदार सरोवर, बरना, भीमगढ़, गांधीसागर, हलाली, हरसी बांध, महेश्वर, राजघाट, तिघरा आदि बांध और डैम ऐसे हैं जिनमें मप्र का एक तिहाई पानी कैद रहता है। बरसात में तो ये सब लबालब हो जाते हैं, लेकिन गर्मी में इनका पानी एक सीमित क्षेत्र में ही जमा रहता है। जिसके कारण नदियों के माध्यम से मैदानी इलाकों में पानी पहुंच नहीं पाता है और वहां जल स्तर दिन पर दिन नीचे सरकता जा रहा है।
2,000 करोड़ की योजना
हर साल गर्मियों में सूखे की कगार पर पहुंचने वाले गांवों में पानी की समस्या दूर करने के लिए सरकार ने खाका तैयार किया है। इसके तहत प्रदेश के पंद्रह हजार से अधिक गांवों में सरकार ने अब नलों के जरिए पानी पहुंचाने की तैयारी शुरू कर दी है। नल-जल योजना के सालों से लंबित पड़े प्रोजेक्ट को नाबार्ड का सहारा मिल गया है। नाबार्ड से मिले दो हजार करोड़ से इन गांवों में नलों के जरिए पानी पहुंचाया जाएगा। योजना पर इसी महीने से काम शुरू कर देने की तैयारी की जा रही है। गौरतलब है कि राज्य सरकार के निर्देश पर पीएचई महकमें ने गांवों में पानी पहुंचाने के लिये ढाई हजार करोड़ का प्रोजेक्ट तैयार किया था, अब सरकार के पास पैसा नहीं होने से यह परवान नहीं चढ़ सका। इसके बाद राज्य सरकार ने केन्द्र को यह प्रोजेक्ट भेजकर उससे मदद की मांग की पर केन्द्र से भी इसके लिये राशि नहीं मिल सकी। अब नाबार्ड ने इसके लिये राज्य सरकार को दो करोड़ रूपए मुहैया कराए हैं। इस पैसे से गांवों में साफ पानी पहुंचाने की व्यवस्था की जाएगी।
पीएचई विभाग ने नलकूप खनन कर पाईप लाइन बिछाने का काम करेगा। विभाग का मानना है कि नदियों से पानी लाकर उसे गांवो में वितरित करने में सफाई के लिये ट्रीटमेंट प्लान की जरूरत पड़ती पर विभाग ने तय किया है कि गांवों में नलकूपों का खनन कर उसके जरिये गांवों में पानी पहुंचाया जाएगा। इसमें गांवों तक पाईप लाइन बिछाने का काम पीएचई विभाग करेगा। इसके बाद घर तक नल कलेक्शन देने का काम पंचायतों को दिया जाएगा। पंचायतें एक नल कनेक्शन देने के लिये पांच सौ रूपए का शुल्क वसूलेंगी और प्रतिमाह उपभोक्ता से साठ रूपए महीने जलकर लिया जाएगा। जिस कंपनी को पाईप लाइन बिछाने का ठेका दिया जाएगा। उससे दस साल तक मेंटीनेंस करने का भी अनुबंध किए जाने का निर्णय लिया गया है।
विभाग का मानना है कि नदियों से पानी लाकर उसे गांवो में वितरित करने में सफाई के लिये ट्रीटमेंट प्लान की जरूरत पड़ती पर विभाग ने तय किया है कि गांवों में नलकूपों का खनन कर उसके जरिये गांवों में पानी पहुंचाया जाएगा। इसमें गांवों तक पाईप लाइन बिछाने का काम पीएचई विभाग करेगा। इसके बाद घर तक नल कलेक्शन देने का काम पंचायतों को दिया जाएगा। पंचायतें एक नल कनेक्शन देने के लिये पांच सौ रूपए का शुल्क वसूलेंगी और प्रतिमाह उपभोक्ता से साठ रूपए महीने जलकर लिया जाएगा। जिस कंपनी को पाईप लाइन बिछाने का ठेका दिया जाएगा। उससे मेंटीनेंस करने का भी अनुबंध किए जाने का निर्णय लिया गया है।
नल-जल योजना 20 साल के ठेके पर देगी सरकार
मुख्यमंत्री ने योजना को नए तरीके से बेहतर प्रबंधन के जरिए संचालित करने के लिए पीएचई विभाग से प्रस्ताव तैयार कराया है। इसके लिए शासन स्तर पर नए सिरे से नीति तैयार की गई है। इसमें यह प्रावधान किया गया है कि अब योजना में निर्माण कार्य पीएचई द्वारा नहीं, बल्कि निजी एजेंसियों द्वारा कराया जाएगा, जिन्हें निर्माण के बाद योजना के संधारण और रख-रखाव की जिम्मेदारी 20 साल तक उठाना पडेगी। जबकि योजना के ग्राम पंचायत स्तर पर आरंभ होने के बाद उसके संचालन की व्यवस्था यहां की पेयजल समिति करेगी। योजना के लिए नाबार्ड से दो हजार करोड़ की राशि मंजूर हुई है। इससे योजना की शुरुआत की जाएगी। प्रदेश में 14 हजार नल-जल योजनाएं संचालित की जा रही हैं। जबकि करीब डेढ़ हजार नल-जल योजनाएं बंद पड़ी हैं।
जलसंकट की आहट, सूखा राहत प्रकोष्ठ बना
कम बारिश के बाद पेयजल संकट की संभावित आहट के चलते लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने अभी से सूखा राहत प्रकोष्ठ बना लिया है। विभाग इस प्रकोष्ठ का व्यापक प्रचार-प्रसार करेगा और इसके स्थानीय प्रभारियों के नाम व मोबाइल नंबर भी समाचार पत्रों में प्रकाशित करेगा। साथ ही इस प्रकोष्ठ को जल स्रोतों और नलकूपों का जलस्तर भी लगातार जांचने को कहा गया है। हालांकि अभी तक प्रदेश के किसी भी क्षेत्र में पेयजल संकट की स्थिति नहीं बनी है फिर भी विभाग ने तैयारियां शुरु कर दी हैं। ताजा निर्देशों में कहा गया है कि हर स्थान पर सूखा राहत प्रकोष्ठ का गठन किया जाए और संभागायुक्त, कलेक्टर व कार्यपालन यंत्री से सतत संपर्क बनाए रखें। इतना ही नहीं इसके लिए उठाए गए कदमों की जानकारी प्रतिदिन ई-मेल से इनकी जानकारी भी भोपाल भेजी जाए। प्रदेश स्तर पर सूखा राहत की जिम्मेदारी कार्यपालन यंत्री सुनील कुमार खरे को सौंपी गई है।
मध्यप्रदेश में इस बार सूखे जैसे हालात बनने की आशंका जताई जा रही है। ऐसा प्रशांत महासागर की सतह पर असामान्य तरीके से बढ़ते तापमान(अल-नीनो प्रभाव) के कारण होगा। प्रशांत महासागर की सतह पर असामान्य तरीके से बढ़ते तापमान (अल-नीनो प्रभाव) के चलते इस वर्ष मानसून के दौरान भारत में सामान्य से कम बारिश होने के आसार बन रहे हैं। जून से सितंबर के बीच कुल 896 मिलीमीटर बारिश होने की आशंका जताई जा रही है। अगस्त को छोड़ पूरे मानसून के दौरान इस बार सामान्य से सिर्फ 34 फीसदी बारिश होने के आसार हैं। यह भविष्यवाणी इस हफ्ते मौसम संबंधी सूचना जारी करने वाली देश की पहली निजी कंपनी स्काईमेट ने की है।
सूखी 313 नदियों को पुनर्जीवित करने की योजना अधर में
मध्यप्रदेश में छोटी नदियां लगातार सूखती जा रही हैं, कई इलाके तो ऐसे हैं जहां नदियों के निशान तक नहीं बचे हैं। राज्य सरकार ने भी 313 ऐसी नदियों को चिह्न्ति किया है जो सूख चुकी हैं। इन्हें पुनर्जीवित किया जाना है, लेकिन योजना अभी अधर में है। राज्य की प्रमुख नदियों-नर्मदा, चंबल, बेतवा, क्षिप्रा, गंभीर, जामनी व धसान की हालत किसी से छुपी नहीं है, यह लगातार प्रदूषित हो रही हैं। साथ ही इनका प्रवाह भी प्रभावित हो रहा है। वहीं इन प्रमुख नदियों की सहायक नदियों के अलावा छोटी नदियां तो बारिश के मौसम में नजर आती हैं, लेकिन बारिश के बाद वे पूरी तरह सूख जाती हैं। इसके अलावा कई ऐसी नदियां हैं जिनमें बरसात में भी पानी नजर नहीं आता। राज्य की नदियों की स्थिति को लेकर पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह ने दो वर्ष पूर्व राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए नीति बनाने का प्रारूप दिया था। तब मुख्यमंत्री ने इस पर अमल का भरोसा दिलाया था। इस पर राज्य सरकार की ओर से चलाए गए अभियान में 313 नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए सर्वेक्षण और पैमाइश कर ली गई, लेकिन वह नीति अभी तक नहीं बनी है।
राज्य की नदियों के सूखने की मूल वजह पानी को रोकने का बेहतर प्रबंधन न होना रहा है। राजेंद्र सिंह कहते हैं कि फसलचक्र और वर्षाचक्र के बीच संबंध ठीक से स्थापित न किए जाने के कारण अधिकांश जल बह जाता है, वहीं कटाव को रोकने के बेहतर प्रबंध नहीं हैं। इसके अलावा भूजल पुनर्भरण की दिशा में भी काम नहीं हुआ है। राज्य सरकार की ओर से जल संरक्षण-सुरक्षा की दिशा में पहल की जा रही है, लेकिन जल प्रबंधन की दिशा में कारगर पहल के अभाव में नदियां और स्थायी संरचनाएं गर्मी के मौसम में सूख जाती हैं।
इधर, जल जन जोड़ो अभियान के संयोजक संजय सिंह कहते हैं कि नदियों के सूखने की वजह स्थायी संरचनाओं का सूखना है। हिमालय क्षेत्र से निकलने वाली नदियों के अलावा अधिकांश नदियों का उद्गम तालाब, झील या नाले हैं, लेकिन आज यही तालाब और झीलें सूख रही हैं। राज्य में बुंदेलखंड, बघेलखंड, मालवा, निमांड वह इलाका है, जहां पानी की समस्या किसी से छुपी नहीं है। हाल यह है कि पानी की किल्लत के कारण बुंदेलखंड में खेती पर संकट छाया रहता है और हर वर्ष कई परिवार रोजी-रोटी की तलाश में राज्य से पलायन कर जाते हैं। राज्य में सूख चुकी नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए सरकारी स्तर पर चल रही कोशिश अगर कारगर साबित हुई तो पानी को लेकर होने वाले झगड़ों से निजात तो मिलेगी ही, साथ ही खेती- किसानी के काम भी आसान हो जाएंगे।
सूखने लगे हैण्डपंप
प्रदेश में गर्मी का प्रकोप बढऩे से जहां जन जीवन अस्त व्यस्त है, वहीं जल स्तर में गिरावट आने से ग्रामीणों की चिंता बढऩे लगी है। हैण्डपंपों में कई स्थानों पर गंदा पानी आने से ग्रामीणों की परेशानियां बढऩे लगी है। उन्होंने प्रशासन से खराब पडे हैण्ड पंपों को सुधारने और पेयजल के पुख्ता इंतजाम किए जाने पर जोर दिया है। जिस तरह गर्मी अपना तेज दिनों दिन बढ़ा रही है, ठीक उसी तरह कुंए एवं हैण्डपंप का जल स्तर कम होता जा रहा है। कहीं कहीं तो गर्मी के दिनों में हैैण्डपंप में पानी ही नही आ रहा है। जिस कारण ग्रामीण महिलाओं को पीने के पानी के लिए मसक्कत करना पड़ रही है। गांवों में लोग पीने के पानी के लिए हैण्ड पंपों पर ही निर्भर है, लेकिन हैण्डपंप सही पानी नहीं दे रहे है, जिस कारण लोग परेशान है। बताया गया है कि ग्रामीण इलाकों में कुओं का जल स्तर भी लगातार कम होता जा रहा है।, जिस कारण पेयजल और निस्तार के लिए पानी का अभाव होने लगा है। इतना ही नहीं कई इलाकों में बोर भी सूखने लगे है। पानी की कमी वेसे तो नहीं होती लेकिन गर्मी के दिनों में लोग पानी के लिए मजबूर दिखाई देते है। हद तो तब हो जाती है जब हैंडपंप से केवल लाल कलर का पानी निकलने लगता है। जिससे लोग बीमारी के भय से उपयोग में नहीं ला रहे है। गांवों में जल संकट के चलते लोगों को पाने के पानी के लिए परेशान होना पड़ रहा है। इसके अलावा किसानों को मवेशियों के लिए पानी लाने में पेरशानी हो रही है। कुओं के घटते जल स्तर एवं सूखते नल कूपों पर चिंता जताते हुए ग्रामीाणें ने प्रशासन से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की मांग की है।
नगर निकायों में पानी स्थिति
स्थानीय प्रशासन और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकीय विभाग द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार प्रदेश के 360 नगर निकायों में से 189 में रोज पानी सप्लाई नहीं हो रहा है लेकिन इनमें से 29 नगर निकायों में तीन दिन या इससे अधिक दिन छोड़ कर पानी सप्लाई हो रहा है। 50 नगर निकायों में दो दिन छोड़ कर बाकी 110 नगर निकायों में एक दिन छोड़कर पानी आता है। स्थिति इतनी भयावह है कि झाबुआ जिले के खवासा में 20 दिन में एक बार पानी सप्लाई होता है। इसी जिले के मेघनगर में 15 दिन में एक बार जनता को पानी के दर्शन नसीब होते हैं। शुजालपुर में 7 दिन बाद जिले में सोयतकलां और नगर पंचायत सीहोर में 6 दिन छोड़कर पानी दिया जाता है। छतरपुर के बकस्वाहा,शाजापुर के सुमनेर, खंडवा के मूंदी, राजगढ़ की ब्यावरा नगर पालिका में 5-5 दिन के अंतराल से पानी मिल रहा है। छतरपुर के महाराजपुर और गढ़ीमलहरा, छिंदवाड़ा के चांदामेटा, चौरई, राजगढ़ के बोड़ा और माचलपुर में 4-4 दिन के अंतर से बुरहानपुर के 10 वार्डों में तीन दिन छोड़ कर, पानी सप्लाई हो रहा है। धार जिले में कुक्षी में 4 दिन छोड़ कर, मनावर और गंधवानी में तीन दिन छोड़कर, धामनोद में 2 दिन छोड़कर, धरमपुरी में 4 दिन बाद, नालछा में 7 दिन के अंतराल से और मांडू में 1 दिन छोड़कर पानी दिया जा रहा है। राजधानी भोपाल में भी एक दिन छोड़कर पानी मिल रहा है। बैरसिया में अगर दो दिन छोड़कर पानी मिल रहा है तो कोलार नगर पालिका में तो नल जल योजना ही नहीं है, वहां टैंकरों से पानी सप्लाई हो रहा है। इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि जो कोलार डैम भोपाल की प्यास बुझाता है, उसी डैम से कोलार के नागरिकों की प्यास बुझाने की कोई योजना नहीं है। गर्मी के इस मौसम में बीस दिन या सात दिन में मिलने वाला पानी पीने के लिए कितना सुरक्षित हो सकता है, इसका अंदाजा तो सहज ही प्रदेश में गंदे पानी से होने वाली बीमारियों, उलटी, दस्त, डायरिया सहित पेट की अन्य बीमारियों के बढ़ते मरीजों से लगाया जा सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के लिए त्राहि-त्राहि
यह बदतर स्थिति केवल शहरों तक सीमित नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो हालत और भी भयावह है। पहाड़ी क्षेत्रों में तो आदिवासी गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। उन्हें कई-कई मील से पानी भर कर लाना पड़ रहा है। मैदानी क्षेत्रों में भी कुंओं और हैंडपंपों का पानी नीचे उतर गया है। जिनकी चिंता नहीं हो रही है। वह हैं पालतू पशु। नदी नालों में पानी सूख जाने के कारण उनकी प्यास बुझाना सबसे मुश्किल हो रहा है। केवल पशुओं के पीने के पानी के संकट के कारण ही कई क्षेत्रों में लोगों को पलायन करना पड़ रहा है। यदि हम आदिवासी बहुल क्षेत्रों की बात करें तो बालाघाट में 4 नल जल योजनायें और 168 हैंडपंप बंद पड़े हैं। मंडला में जहां नर्मदा कुंभ के नाम पर आरएसएस का कार्यक्रम आयोजित करने पर शिवराज सरकार ने करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाये थे। वहां 56 नल जल योजनायें और 923 हैंडपंप बंद पड़े हुए हैं। सिवनी में 100 से ज्यादा गांवों में परिवहन से पानी की व्यवस्था हो रही है। 133 नल जल योजनाएं बंद हैं। इसके साथ ही 405 हैंडपंप भी बंद पड़े हुए हैं। बड़वानी जिले में 2 नल जल योजनायें ठप्प हैं। साथ ही 587 हैंडपंप बंद हैं। झाबुआ में 2 नल जल योजनायें बंद हैं। पिटोल में 4 व बामनियां में 3 दिन के बाद पानी सप्लाई होता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार खराब हैंडपंपों की संख्या तो मात्र 46 है, लेकिन 79 गांवों में गांववासियों को परिवहन से पानी लाकर प्यास बुझाने को मजबूर होना पड़ा रहा है। मंदसौर जिले में शासन ने मान लिया है कि 200 गांव पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। कई गांव ऐसे भी हैं, जहां 5 किलोमीटर दूर से पानी लाया जा रहा है। 1415 हैंडपंप खराब पड़े हुए हैं और 25 नल जल योजनायें बंद पड़ी हैं। रतलाम में 116 हैंडपंप और 106 नलकूप योजनायें बंद हैं। शहरों तक में यह स्थिति है कि रतलाम नगरनिगम में एक दिन छोड़कर, जावरा नगर पालिका में 3 दिन छोड़कर, नामली नगर पंचायत में 3 दिन छोड़कर, ताल और पिपलोदा में 2 दिन छोड़कर पानी सप्लाई हो रहा है। दमोह जिला फिर पानी संकट से जूझ रहा है। जहां ग्रामीण क्षेत्रों 373 हैंडपंप बंद हैं। डिंडोरी जिले के 88 गांवों में पानी का भयावह संकट है। शहडोल संभाग में 183 में से 28 नल जल योजनायें बंद हैं।
जबलपुर जिले में 27 नल जल योजनायें बंद हैं। 200 हैंडपंप सूख गये हैं और 41 बसाहटों में टैंकर से पानी सप्लाई हो रहा है। ग्वालियर जिले में 1300 हैंडपंप सूखे गये हैं, इसके अलावा 200 हैंडपंप खराब हैं और 6 नल जल योजनायें बंद हैं। कुल मिलाकर सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही 4 लाख 62 हजार 348 हैंडपंपों में से 36,690 बंद पड़े हुये हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में नल जल की 8 हजार 835 योजनाओं मे से 1196 योजनाएं बंद हैं। जो हैंडपंप चालू भी हैं, उनमें से भी आधे से अधिक दबंगों के कब्जे में है। स्थिति यह है कि राजधानी भोपाल में ही 33 ट्यूबवेल पर दबंगों का कब्जा है। ग्रामीण क्षेत्रों में दलित और आदिवासी बस्तियों के हैंडपंप यदि खराब हैं तो वे दबंगों के कब्जे वाले हैंडपंपों से पानी भरने की सोच भी नहीं सकते। उल्लेखनीय है कि पेयजल संकट की यह स्थिति 15 अप्रैल की है। जब तक यह अंक पाठकों के हाथ में होगा, तब तक पेयजल संकट और ज्यादा विकराल हो चुका होगा।
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