शुक्रवार, 15 मई 2015
93 लाख लोगों की जेब काटी सरकार ने
किसानों की बिजली भी 13 फीसदी महंगी कर डाली, 50 यूनिट खपत वाले ढूंढना पड़ेंगे उपभोक्ता
भोपाल। जितनी बिजली उतने दाम का नारा देकर सरकार में आई भाजपा ने दोगुने से अधिक बिजली के दाम अपने कार्यकाल में बढ़ा दिए हैं। एक बार फिर 93 लाख घरेलू उपभोक्ताओं को महंगी बिजली का झटका शिव के राज में लगा है। विद्युत नियामक आयोग ने 25 अप्रैल से बढ़ी हुई दरें लागू करने की अनुमति बिजली कम्पनियों को दे दी है, यानि अगले माह से सबके बिल 10 से 20 फीसदी तक बढ़ जाएंगे। 50 यूनिट तक खपत वाले उपभोक्ताओं की दरों में वृद्धि ना करने का दावा किया गया है, मगर इस श्रेणी के उपभोक्ताओं को ढूंढना भी पड़ेगा, क्योंकि झुग्गी झोपड़ीवासियों की भी इससे अधिक यूनिट खपत महीनेभर में हो जाती है। यहां तक कि किसानों को भी नहीं छोड़ा और उनकी बिजली भी 13 फीसदी महंगी कर डाली।
हर साल भोपाल सहित प्रदेश की तीनों कम्पनियां हजारों-करोड़ों के घाटे का हवाला देकर आयोग के समक्ष याचिकाएं दायर करती है और आयोग दिखावटी सुनवाई के बाद दरें बढ़ाने की मंजूरी दे देता है। मजे की बात यह है कि कम्पनियों को होने वाला फायदा तो उसके खाते में और घाटे की भरपाई आम उपभोक्ताओं की जेब काटकर की जाती रही है। अभी जो वृद्धि की गई उसके बावजूद बिजली कम्पनियां घाटे में रहेगी, क्योंकि पारेक्षण यानि वितरण क्षति अभी भी 25 फीसदी तक बनी है, जिसमें से आधी बिजली चोरी करवाई जाती है। तीनों बिजली कम्पनियों को इस बढ़ोतरी के बाद साढ़े 26 हजार करोड़ रुपए से अधिक की राशि मिलेगी और लगभग 3 हजार करोड़ रुपए की आय अनुमानित की गई है। तीनों बिजली कम्पनियों के कुल उपभोक्ताओं की संख्या 1 करोड़ 32 लाख से अधिक है। इनमें से सर्वाधिक 93 लाख तो घरेलू उपभोक्ता ही हैं।
10 साल में दो गुना से अधिक हो गए दाम
10 साल में भाजपा के राज में बिजली के दाम दो गुना से अधिक बढ़ गए हैं, जबकि पूर्व की कांग्रेस की दिग्गी सरकार को सड़क के अलावा सबसे ज्यादा गालियां बिजली के मामले में ही खाना पड़ी और भाजपा ने दावा किया था कि जनता को बिजली की इस लूटपट्टी से राहत दिलवाएंगे। अब बिजली तो अवश्य पहले से अधिक मिल रही है मगर उसके एवज में जनता को दाम भी अधिक चुकाना पड़ रहे हैं। अब घरेलू बिजली साढ़े 3 रुपए यूनिट से लेकर 6 रुपए यूनिट तक पहुंच गई है और उसके साथ ढेर सारे अतिरिक्त शुल्क अलग वसूल किए जाते हैं।
तेज भागते मीटरों ने भी बढ़ा डाले बिल
सरकार बनाने के पहले भाजपा ने यह भी दावे किए थे कि तेज भागते इलेक्ट्रॉनिक मीटरों से जनता को छुटकारा दिलाया जाएगा। दरअसल जब से ये इलेक्ट्रॉनिक मीटर लगे हैं तब से ही घर-घर के बिजली बिल बढऩे लगे वरना पहले सामान्य उपभोक्ता का बिजली बिल 100, 150, 200 रुपए तक का आता था जो अब बढ़कर 800-1000 रुपए तक पहुंच गया है। इतना ही नहीं बिजली कम्पनियों ने सांठगांठ करते हुए ये इलेक्ट्रॉनिक मीटर ऐसे बनवाए हैं कि ये हर तरह की खपत दर्शाते हैं और पिछले दिनों ही विधानसभा में स्वीकार किया गया कि जांच में भी यह पाया गया कि ये इलेक्ट्रॉनिक मीटर तेज गति से भागते हैं।
15 फीसदी से अधिक बढ़ेगा निगम का बिल
आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ कड़की में चल रहे इंदौर नगर निगम का बिजली का बिल भी 15 प्रतिशत से अधिक बढ़ जाएगा। अभी नर्मदा परियोजना पर ही नगर निगम को लगभग 120 करोड़ रुपए सालाना बिजली बिल चुकाना पड़ता है, जिसमें 15 फीसदी तक बढ़ोतरी हो जाएगी। सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोडवानी ने निगम के मामले में आयोग के समक्ष आपत्ति भी दर्ज करवाई थी। हालांकि नगर निगम के तो सारे कर्णधार सोए रहे। नर्मदा के बिल में 14 प्रतिशत और यशवंत सागर तथा बिलावली के स्थायी प्रभार में 13 प्रतिशत और 10 प्रतिशत प्रति यूनिट में वृद्धि आयोग ने की है।
जब उत्पादन बढ़ रहा है तो दामों में वृद्धि क्यों?
बीते सालों में मध्यप्रदेश में बिजली का उत्पादन भी बढ़ा और कांग्रेस राज की तुलना में दो गुना से अधिक उत्पादन हो गया है। पहले मांग और आपूर्ति के बीच डेढ़ से 2 हजार मेगावाट का अंतर रहता था, जिसके चलते अन्य राज्यों से अधिक दरों पर बिजली खरीदना पड़ती थी, मगर अब शिवराज सरकार एक तरफ ये दावे करती है कि बिजली का उत्पादन ना सिर्फ बढ़ गया बल्कि अब अन्य राज्यों को सरप्लस बिजली बेची जा रही है। यहां तक कि अम्बानी सहित अन्य औद्योगिक घरानों को कोयला खदानें आवंटित की गई और उनसे पॉवर प्लांट भी लगवाए, जिसमें दावा किया गया कि सस्ती बिजली बनेगी, लेकिन पौने दो रुपए यूनिट अम्बानी के प्लांट से बिजली खरीदने वाली शिवराज सरकार जनता को 6 रुपए यूनिट तक की महंगी बिजली आप ने लिया कम वृद्धि का श्रेय बेच रही है। सवाल यह है कि जब उत्पादन बढ़ रहा है तो फिर दामों में लगातार वृद्धि क्यों हो रही है?
कांग्रेस बिजली के मामले में इसलिए विरोध नहीं कर सकती क्योंकि उसी ने बिजली कम्पनियों के सेटअप से लेकर नियामक आयोग जैसी संस्थाएं बनाई और इलेक्ट्रॉनिक मीटर भी कांग्रेस की ही देन है। उसके एक बड़े नेता की मीटर बनाने की फैक्ट्री भी रही और तमाम ठेकेदार कांग्रेस के ही रहे जो अब भाजपा के भी हो गए हैं। यही कारण है कि आज तक कांग्रेस बिजली के मामले में कभी भी दमदानी से लड़ाई नहीं लड़ पाई। इस बार अवश्य आम आदमी पार्टी यानि आप ने बिजली कम्पनियों के खिलाफ प्रदेश में विरोध शुरू किया और एक लाख से अधिक आपत्तियां आयोग के समक्ष प्रस्तुत की और धरने प्रदर्शन के आयोजन भी किए। अब आप ने इस बात का श्रेय लिया है कि उनके आंदोलन के चलते ही 24 प्रतिशत से अधिक बिजली महंगी नहीं हुई और सिर्फ 10 प्रतिशत तक ही दाम बढ़ाए गए।
फ्यूल कॉस्ट के नाम पर 24 पैसे बढ़ाए
नियामक आयोग के बिजली की दरें बढ़ाने से आम आदमी की जेब पर भार काफी बढ़ गया है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव के कारण 2013-14 में नियामक आयोग ने बिजली की दरें सीधे तौर पर तो नहीं बढ़ाई लेकिन फ्यूल कॉस्ट के नाम पर जरूर वर्तमान टैरिफ से 24 पैसे प्रति यूनिट अधिक वसूला जा रहा था। इसके बाद अब जो दरें बढ़ाई गई है उसने आम आदमी के घर का बजट ही गड़बड़ा दिया है क्योंकि 300 यूनिट की खपत वाले उपभोक्ताओं को अब तक बिजली 5.40 पैसे प्रति यूनिट के हिसाब से मिल रही थी, लेकिन अब उसको प्रति यूनिट के हिसाब से 5.77 पैसे चुकाने होंगे। जबकि गैर घरेलू उपभोक्ताओं पर सीधे 50 पैसे प्रति यूनिट की बढोतरी की गई है।
पिछले टैरिफ और नए टैरिफ में अंतर:
यूनिट वर्तमान दरें नई दरें
100 4.27 4.42
300 5.40 5.77
गैर घरेलू उपभोक्ता
200 6 रुपए 6.50
इसके पहले कब बढ़ी थी दरें:
नियामक आयोग ने इसके पहले सन 2012-13 में बिजली की प्रति यूनिट दरें बढ़ाई थी। उस दौरान .07 प्रतिशत के हिसाब से वृद्धि की गई थी। इसके बाद लोकसभा विधानसभा चुनाव थे और यदि दरें बढ़ाई जाती तो सरकार को नुकसान तय था इसलिए बिजली की दरों में कोई बढोत्तरी नहीं की गई।
आखिर क्यों बढ़ाई दरें:
नियामक आयोग ने बिजली कंपनी को फ्यूल कॉस्ट एडजेस्टमेंट की छूट दे रखी है। जिसे कारण 2013-14 में सीधे तौर पर तो दरें नहीं बढ़ी लेकिन फ्यूल कॉस्ट के नाम पर 24 पैसे पिछले वर्ष बढ़ाए गए हैं। कुल मिलाकर बिजली कंपनी गुपचुप तरीके से पहले से ही उपभोक्ता से पिछले टैरिफ के मुकाबले 24 पैसे प्रति यूनिट अधिक वसूल रही थी। जबकि इस अवधि में जब फ्यूल सस्ता हुआ तो रेट कभी भी कम नहीं किए गए। उधर एक्सपर्ट का कहना है कि जब फ्यूल कॉस्ट के नाम पर कंपनियों को दरें बढ़ाने की पहले ही अनुमति दी गई है तो फिर अलग से बिजली की दरें बढाने का क्या मतलब है।
एक कूलर भी बढ़ाएगा बोझ:
100 यूनिट पर बिजली की दरें कम बढाई गई है जबकि 300 यूनिट पर अधिक बढ़ी है। खास बात यह है कि यदि घर में एक कूलर भी है तो बिजली बिल 200 यूनिट के पार हो जाता है। ऐसे में सामान्य उपभोक्ता पर सबसे ज्यादा भार बढा है।
ऐसे समझें जेब पर पडऩे वाले भार को:
यूनिट खपत वर्तमान बिजली बिल कितना बढ़ेगा
100 427 442
300 1622.50 1732.50
गैर घरेलू उपभोक्ता
200 1200 1300
सीएजी से ऑडिट से खुलेगी पोल:
कंपनियां हमेशा घाटे का हवाला देकर बिजली की दरें बढ़ाने का प्रस्ताव देती है, लेकिन जब बात ऑडिट की आती है तो कंपनियां सीएजी से ऑडिट कराने से कतराती हैं। यही वजह है कि कंपनियां हमेशा निजी ऑडिटरों से ऑडिट कराती है जिसके कारण कभी यह पता नहीं चलता है कि मुनाफे और घाटे की हकीकत आखिर क्या है।
पहले रिटायर्ड जस्टिस होते थे अध्यक्ष:
नियामक आयोग के अध्यक्ष 2003 में रिटायर्ड जस्टिस सचिन द्विवेदी थे। नियम भी था कि अध्यक्ष रिटायर्ड जस्टिस को ही बनाया जाए लेकिन उस समय 2006 तक जब बिजली की दरें नहीं बढ़ाई गई तो शासन ने नियमों में संशोधन करते हुए रिटायर्ड जस्टिस के साथ ही रिटायर्ड प्रमुख सचिव को भी अध्यक्ष बनाने का प्रावधान शामिल कर दिया। इसके बाद रिटायर्ड पीएस एसके मल्होत्रा को अध्यक्ष बनाया गया था, तब से रिटायर्ड पीएस को ही अध्यक्ष बनाया जा रहा है और लगातार बिजली की दरें बढ़ भी रही हैं।
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