शुक्रवार, 27 मार्च 2015
निर्मल भारत की मप्र में दिखी गंदी तस्वीर
शौचालय बनाने के नाम पर 785 करोड़ हजम कर गई पंचायतें
समेकित ऑडिट रिपोर्ट में हुए खुलासों ने सबको चौकाया
विभाग ने पंचायतों से वापस बुलाए 475 करोड़
भोपाल। पिछले एक दशक में मप्र में जितने भ्रष्टाचारी पकड़ाएं हैं, उससे पहले इतने भ्रष्टाचार के मामले कभी भी सामने नहीं आए हैं। हद तो यह की देश में ग्रामीण स्वच्छता के लिए शुरू किया गया निर्मल भारत अभियान भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है। सरकार ने घर-घर शौचालय बनाने के लिए प्रदेश की 23,000 पंचायतों को करीब 1260 करोड़ रूपए दिया था, लेकिन आज 7 साल बाद भी 63 फीसदी ग्रामीण क्षेत्र में शौचालय नहीं हैं। जबकि पंचायतों ने कागजों पर 785 करोड़ की रकम खर्च कर दी है। इस खुलासे के बाद सरकार ने पंचायतों से 475 करोड़ रूपए वापस बुलाए हैं। वहीं पंचायतों को क्षेत्र में बनाए गए शौचालयों की रिपोर्ट भी तलब की है। उल्लेखनीय है के मध्य प्रदेश में ग्राम पंचायतों और ग्राम कोषों का ऑडिट सीएजी के पर्यवेक्षण में स्वतंत्र एजेंसी के जरिए होने लगा तो गड़बड़ी मिलने का सिलसिला भी शुरू हो गया। समेकित ऑडिट रिपोर्ट में कई ऐसे खुलासे सामने आए हैं जो चौकाने वाले हैं।
पंचायत चुनाव नहीं होते तो चलता रहता भ्रष्टाचार
देश को निर्मल बनाने के लिए सरकार ने हर घर में शौचालय बनाने के लिए निर्मल भारत अभियान शुरू किया था, लेकिन मप्र में यह अभियान भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है। प्रदेश की कई पंचायतों ने तो शौचालय बनाने का बजट ही हजम कर लिया और वहां के लोग आज भी खुले में शौचालय जाने को मजबूर हैं। अगर प्रदेश में हाल ही में पंचायत चुनाव नहीं होते तो शौचालय बनाने के नाम पर भ्रष्टाचार चलता रहता और निर्मल भारत की तस्वीर कागजों पर संवरती रहती। लेकिन पंचायत चुनाव के दौरान तत्कालीन सरपंचों की पोल खोलने के लिए प्रदेशभर में जिस तरह भंडाफोड़ अभियान चला उससे सारी हकीकत सामने आ गई। सबसे पहले निर्मल भारत अभियान में भ्रष्टाचार का बड़ा मामला सतना जिले की आदिवासी बहुल्य मझगवां जनपद की 76 ग्राम पंचायतों में सामने आया। यहां विभिन्न वित्तीय वर्षों के दौरान 18 हजार 316 शौचालयों के निर्माण के लिए बतौर अनुदान दी गई 6 करोड़ 96 लाख 56 हजार रुपए की भारी भरकम रकम में से 1 करोड़ 66 लाख 60 हजार रुपए की राशि का डंके की चोट पर दुरुपयोग हुआ। गबन की शिकार यह वह रकम है जो सरंपच और सचिवों ने काम स्वीकृत नहीं होने के बाद भी बैंक खातों से निकाल ली गई। अब इस रकम की भरपाई के लिए प्रशासन को पसीना आ रहा है। हालांकि देर से ही सही भ्रष्टाचार की खबर सामने आने के ग्रामीण विकास विभाग ने प्रदेश की 23000 पंचायतों में निर्मल भारत अभियान के तहत भेजी गई करीब 475 करोड़ की राशि वापस बुला ली है। इस अभियान के तहत गांवों में शौचालय और अन्य विकास कार्य होने थे पर चुनाव के दौरान इस राशि में भ्रष्टाचार होने की शिकायतों के चलते यह कदम उठाया गया है। उल्लेखनीय है कि 7 साल के अंदर पूरे देश में खुले में शौच की परंपरा के सफाए के केंद्र सरकार के संकल्प के साथ शुरु किया गया निर्मल भारत अभियान मप्र में जमीनी स्तर पर भारी भ्रष्टाचार के दलदल में फंस कर रह गया है।
एनबीए में गबन की ऐसे खुली पोल
निर्मल भारत अभियान में सतना जिले में करोड़ों के घोटाले की पोल तब खुली जब जिला पंचायत के तबके मुख्य कार्यपालन अधिकारी(सीईओ)अभिजीत अग्रवाल ने जिले के सभी जनपदों के सीईओ को निर्देश देकर इस आशय के ब्यौरे तलब किए कि निर्मल भारत अभियान(एनबीए)के तहत शौचालय निर्माण में राशि आहरण (व्यय),मूल्यांकन उपियोगिता और कार्यपूर्णता की अद्यतन स्थिति क्या है? जब रिपोर्ट सामने आई तो पता चला कि निर्मल भारत मद में केंद्र से आए अनुदान में करोड़ों का गोलमाल हुआ है। अकेले मझगवां जनपद की 76 पंचायतों में बगैर काम के 1 करोड़ 66 लाख 60 हजार रुपए की राशि निकाल ली गई। जिला पंचायत के सीईओ को कमोबेश सभी जनपद सीईओ की ओर से भेजे गए प्रतिवेदनों में भी इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि निरंतर फोन पर,भ्रमण के दौरान, लिखित-मौखिक और बैठकों में भी सरपंच-सचिवों से अद्यतन रिपोर्ट मांगी गर्इं लेकिन प्रतिवेदन नहीं मिले। ज्यादातर जनपद सीईओ ने भी अपनी रिपोर्ट में माना है कि अनुदान राशि का निजी मद में दुरुपयोग करते हुए ऐसी गंभीर अनियमितताएं की गर्इं जो गबन की श्रेणी में आती हैं।
सतना जिला कलेक्टर संतोष मिश्रा कहते हैं, त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में आऊट स्टैंडिंग पर नोड्यूज (एनओसी)की बाध्यता के चलते हालांकि काफी हद तक धांधली में फंसी यह रकम रिकवर हुई है। उन्होंने बताया कि चुनाव के बहाने तकरीबन 9 करोड़ की रिकवरी हुई है। कलेक्टर ने भी माना कि वसूली की यह रकम पर्याप्त नहीं है। कलेक्टर ने कहा कि सीईओ जिला पंचायत और जनपदों के सीईओ तथा एसडीएम को जल्द ही इस मामले में अभियान चला कर वसूली कराए जाने के निर्देश दिए जाएंगे। जरुरत पड़ी तो गबन के आरोपी सरपंच और सचिवों के खिलाफ एफआईआर करा कर मामले पुलिस को भी सौंपे जाएंगे। उन्होंने कहा कि कार्यवाही तो ऐसी की जाएगी जो नजीर बने। सतना जिला पंचायत की मुख्यकार्यपालन अधिकारी और अपर कलेक्टर (विकास)सूफिया फारुखी बताती हैं, कि निर्माण एवं विकास तथा अन्य मदों पर बकाया रिकवरी और सरकारी धन के दुरुपयोग मामले में किसी भी प्रकार की आऊट स्टैंडिंग पर जनपद के सभी सीईओ को जीरो रिकवरी का टारगेट देते हुए कड़े निर्देश दिए गए हैं। उनसे अब इस आशय के सर्टिफिकेट भी लिए जा रहे हैं। भ्रष्टाचार के मामलों में आरोप सिद्ध होने पर सख्त कार्यवाही और वसूली का भी सिलसिला शुरु हो गया है। शौचालय निर्माण में सरकारी राशि के दुरुपयोग पर जनपद सीईओ के प्रतिवेदन को गंभीरता से लिया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि निर्मल भारत अभियान के तहत केंद्रीय अनुदान के भुगतान के तहत रकम जिला पंचायत द्वारा आरटीजीएस के माध्यम से जनपदों के जरिए सीधे पंचायतों के खाते में भेजी जाती है। पंचायतों के इन बैंक खातों का संचालन साझा तौर पर सरपंच और सचिव करते हैं। सरपंच और सचिवों की साठगांठ के कारण ही जिले में भारी पैमाने पर गफलत हुई।
सतना जिले के मझगवां जनपद में निर्मल भारत अभियान के तहत भ्रष्टाचार का मामला सामने के बाद से तो जैसे भ्रष्टाचार की बाढ़ आ गई। एक-एक कर कई जिलों की रिपोर्ट सामने आते ही पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने जब प्रदेशभर के पंचायतों की प्रोग्रेस रिपोर्ट का जायजा लिया और उससे मैदानी रिपोर्ट का मिलान किया तो उसमें अरबों रूपए के भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है।
मुरैना जिले में 2003 में ग्राम पंचायतों के माध्यम से गांव-गांव सर्वे कराकर कुल तीन लाख 76 हजार 398 परिवारों को इस योजना के लिए चुना गया था। इन सभी के लिए 2018 तक शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा गया था। आज 12 साल होने को हैं लेकिन अब तक जिले में कुल एक लाख 49 हजार 195 शौचालय ही बन सके हैं। भौतिक सत्यापन में इनमें से कितने काम करते मिलेंगे यह जांच का विषय है। अपने शुरुआती साल से ही यह अभियान कभी अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सका। 2013-14 के जो आंकड़े उपलब्ध हैं उनमें उस साल 122 ग्राम पंचयातों में 35267 शौचालय बनाए जाने थे जिनमें से 22017 को मंजूरी मिली। उनमें से भी पूरे साल में कुल 9672 यानी लगभग 27 फीसदी शौचालय ही बन सके। इस वित्तीय वर्ष के लिए 63437 शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा गया लेकिन अब तक कुल 3380 शौचालय बन सके हैं। कागज पर दर्ज आकड़ों की अपेक्षा शौचालयों की मैदानी स्थिति ज्यादा खराब है। बने हुए शौचालयों में से ज्यादातर अनुपयोगी हैं उनकी दीवारें अधूरी हैं उनसे छत गायब हैं कमोड मिट्टी में दवा दिया गया है उसका किसी सैप्टिक टैंक से कनेक्शन ही नहीं है। पानी की कैसी भी कोई सुविधा नहीं है ऐसे हजारों आधे शौचालय पूरे जिले में मौजूद है। जिनके घर में शौचालय बने हैं उन्होंने अपना 900 रुपए का अंशदान बचा लिया तो बाकी पैसा ठेकेदार, पंच, सरपंच और इस योजना की देखरेख करने वाली एजेंसी जिला पंचायत के अधिकारी-कर्मचारी खा पी गए। लोग आज भी खुले में शौच कर रहे हैं।
पंचायतों तक नहीं पहुंचा मर्यादा का अभियान
सीधी जिले के विभिन्न विकासखण्डों में स्थित ग्राम पंचायतों में से अधिकांश ग्राम पंचायतें ऐसे है जिनके प्रतिनिधियों के घर में शौचालय का निर्माण नहीं कराया गया है। इसके बावजूद भी प्रशासनिक अधिकारी ऐसे पंचायत प्रतिनिधि के विरूद्ध पद से पृथक करने की कार्यवाई नहीं कर पाए हंै। उल्लेखनीय है कि वातावरण स्वच्छ रखने एवं खुले मैदान में शौचक्रिया से रोकने के उद्देश्य से सरकार तरह-तरह के कार्यक्रम तैयार करती रही है। निर्मल ग्राम योजना, निर्मल वाटिका, समग्र स्वच्छता एवं मर्यादा अभियान जैसी योजनाओं को लागू कर चुकी है ताकि किसी न किसी माध्यम से गरीब व्यक्ति भी शौचालय का निर्माण करा सके। मप्र पंचायत राज अधिनियम 1993 के अनुसार पंचायत प्रतिनिधि घोषित होने के 6 माह अवधि तक संबंधित प्रतिनिधि के घर शौचालय का निर्माण कराना आवश्यक है इसके बाद भी जिले के अधिकांश जनप्रतिनिधि अब तक शौचालय का निर्माण नहीं करा सके हंै। ऐसे प्रतिनिधियों के विरूद्ध प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा पद से पृथक करने संबंधी कोई कार्यवाई करना तो दूर रहा इस संबंध में नोटिस तक जारी नहीं की जा रही है।
जिला प्रशासन की लापरवाही का ही परिणाम है कि जिले की 60 फीसदी ग्राम पंचायतें ऐसी है जहां पर योजना लागू होने के 12 वर्ष बाद भी शौचालय निर्माण कराने के लिए सरपंच-सचिव द्वारा विचार तक नहीं किया जा रहा है। खासतौर पर रामपुर नैकिन विकासखण्ड अंतर्गत ग्राम पंचायतों झगरी, गुजरेड़, अमिलहा, खड्डीकला, मोहनी रतवार, पैपखरा, सतोहरी सहित 50 ग्राम पंचायतों के पंचों के घरों में शौचालय का निर्माण अब तक नहीं हो सका है। इसी तरह जनपद सीधी अंतर्गत ऐंठी, खिरखोरी सहित दर्जनों ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि खुले मैदान में शौचक्रिया करने के लिए मजबूर हैं। साथ ही जनपद पंचायत मझौली, सीधी एवं जनपद पंचायत कुसमी की दर्जनों ग्राम पंचायतों में यही हालत बनी हुई है। जबकि जनपद पंचायत सिहावल की अधिकांश ग्राम पंचायतों में शौचालय निर्माण की कार्यवाही प्रक्रियाधीन बताई जा रही है।
पंचायत प्रतिनिधियों को शौचालय निर्माण कराने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा कड़े निर्देश नहीं दिए जा रहे है और न ही शौचालय न बनवाने वाले पंचों एवं जनपद सदस्यों को पद से पृथक करने की कार्यवाही संबंधी जानकारी ही दी जाती है। यही वजह है कि पंचायत प्रतिनिधि शौचालय निर्माण कराने का विचार तक नहीं बना पा रहे है। पंचायत राज अधिनियम में भले ही प्रतिनिधियों को शौचालय का निर्माण कराना अनिवार्य बताया गया है लेकिन प्रशासनिक अधिकारी इस नियम को कभी भी महत्व नहीं दिए। यही वजह है कि जिले के सैकड़ा भर पंच एवं जनपद सदस्यों सहित सरपंचों के घर में शौचालय नही ंबन पाए हैं और न ही इसके बाद कोई कार्यवाई ही की गई। प्रशासनिक अधिकारी अधिनियम में वर्णित निर्देशों को नजर अंदाज करते रहे है। जिला पंचायत के मर्यादा अभियान शाखा में अब तक यह जानकारी उपलब्ध नहीं है कि जिले की किन-किन ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों के घरों में शौचालय बने हैं या नहीं बनाए गए हैं। संबंधित शाखा से बताया जाता है कि अधिकांश प्रतिनिधियों के घरों में शौचालय नहीं बने हैं। बावजूद इसके पद से पृथक करने की कार्यवाई करना आवश्यक नहीं माना जा रहा है।
खंडवा में शौचालय निर्माण के नाम पर बड़ा घोटाला
एक ओर जहां प्रधानमंत्री द्वारा देश में स्वच्छ भारत का सपना लेकर भारत निर्माण अभियान चलाया जा रहा हैं जिसमें देश के प्रत्येक गांव को भी जोड़ा गया हैं। वही दूसरी ओर उनके इस सपने को योजना को अमलीजामा पहनाने वाले अधिकारियों द्वारा धूमिल करने का प्रयास किया जा रहा हैं। वैसे तो इस योजना को मूर्त रूप देने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं लेकिन इन योजनाओं में केवल भ्रष्टाचार ही पनप रहा हैं। ऐसा ही एक मामला खंडवा जिले के विकासखंड खालवा, हरसूद का हैं जिसमें निर्मल भारत अभियान एवं मनरेगा योजनान्तर्गत तैयार की गई मर्यादा उपयोजना अंतर्गत निर्माण किए जा रहें हैं शौचालयों का हैं।
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अनुसार शौचालय निर्माण के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। जिसमें व्यक्तिगत पारिवारिक शौचालय निर्माण हेतु प्रोत्साहन राशि 4600 रूपए का प्रावधान निहित था। जिसमें केन्द्रांश 3200 रूपए एवं राज्यांश 1400 रूपए एवं हितग्राही का अंशदान 900 रूपए उल्लेखित था। मनरेगा से अंशदान के रूप में 4400 रूपए निर्धारित किए गए हैं। कुल मिलाकर घरेलू शौचालय की लागत 9900 रूपए भारत सरकार एवं मप्र शासन की सहमति से तय हुई थी। मनरेगा योजना से अकुशल श्रम हेतु 20 मानव दिवस हेतु 2640 रूपए एवं मिस्त्री, प्लंबर, मेट की मजदूरी एवं प्रोत्साहन राशि 1760 रूपए शामिल हैं। 5 दिवस मिस्त्री के लिए 1460 रूपए एवं 300 रूपए मेट प्रोत्साहन राशि का निर्देशन शासन स्तर से किया गया था। निर्मल भारत अभियान से सामग्री हेतु 4600 रूपए का प्रावधान था। जिसमें 900 रूपए हितग्राही का अंशदान मिलाकर यह आकलन 5500 रूपए किया गया था। कुल मिलाकर शौचालय हेतु 9900 रूपए निर्माण हेतु प्राक्लन राज्य स्तर पर तैयार करके ड्राईंग एवं मार्गदर्शन शासन के पत्र के साथ प्राप्त होने के साथ दिशा-निर्देश दिए गए थे। भ्रष्टाचार से जुडे इस गंभीर मामले को शिकायतकर्ता गोपाल राठौर द्वारा पंचायतो के निरीक्षण के दौरान नियम विरूद्ध बनाए गए जर्जर शौचालयों को देखने के बाद प्रकाश में लाया गया है। जिला दर अनुसूची अनुसार कार्यपालन यंत्री द्वारा मानक प्राकलन तैयार करके जिला कार्यक्रम समन्वयक के माध्यम से सभी पंचायतों को उपलब्ध कराए गए थे जिसे तकनीकी स्वीकृति मानकर कार्य करवाए जाने के दिशा निर्देश जारी किए गए थे।
तकनीकी दिशा निर्देशों के अनुसार कार्य में ईंट की चुनाई करके छत पर एसी सीट का प्रावधान, 2 लीच पीट की जालीदार चिनाई सीमेंंट मसालों से करना थी। साइड में एक पानी की टंकी जो कि ईंट से निर्मित की जाना थी। पूरे शौचालय को प्लास्टर करना था। एक दरवाजा बिना चौखट का लगाने के अलावा पानी की टंकी में पाईप व दो टोटी लगाना था।
जनपद खालवा के सीईओ सौरभ सिंह राठौर ने शासन के दिशा-निर्देशों का पालन न करते हुए मनमाने ढंग से सचिवों पर बाह्य एजेंसियो को भुगतान करने के लिए दबाव बनाया। खालवा अंतर्गत रेडीमेड शौचालय प्रदाय करवाए गए। ग्राम पंचायत रोशनी, मलगांव में इस तरह के शौचालय हितग्राहियों को प्रदाय किए गए हैं जिनकी वर्तमान स्थिति दयनीय हैं। इन शौचालयों के निर्माण में लोहे की 20 एमएम पतली चादर, प्लेन एसी सीट को फेब्रिकेशन वर्क करके नट बोल्ट के माध्यम से कसा गया हैं। इसमें लोहा सरिया कुछ भी नही लगाया हैं। एसी सीट भी छत की मानकों के अनुसार नहीं हैं। कुल मिलाकर बाह्य एजेंसियों द्वारा प्रदाय किए गए शौचालयों में मनरेगा के मार्गदर्शी दिशा निर्देशों की पूर्ति नहीं होती हैं। योजना के मार्गदर्शी सिद्घांतो से हटकर बिना जिला पंचायत एवं कलेक्टर से अनुमोदन लिए बिना ही एनजीओ से इन शौचालयों को ग्राम पंचायतों में प्रदाय करवाया गया हैं। जो कि शासन के दिशा-निर्देशो के विपरीत है।
राशि की गई बंदरबाट
ग्राम पंचायत स्तर पर प्रत्येक शौचालय हेतु अकुशल श्रम के तौर पर 2460 रूपए के फर्जी मस्टर भरे गए हैं और मिस्त्री, प्लंबर के नाम से भी 1760 रूपए के फर्जी बिल लगाकर राशि का आहरण किया गया हैं। ग्राम पंचायतों को मानकों से हटकर प्रदाय किए गए शौचालय की बाजार कीमत एवं दर अनुसूची से भी प्राकलन बनवाया जाए तो इस शौचालय पर 5400 रूपए से ज्यादा खर्च नहीं होगा। इस तरह मनरेगा के सिद्घांतों से हटकर राशि की बंदरबांट जनपद स्तर पर सीईओ सौरभसिंह राठौर द्वारा की गई है। भ्रष्टाचार से जुडे इस गंभीर मामले मेंं शिकायतकर्ता गोपाल राठौर द्वारा बताया गया कि इस सारे मामले की शिकायत संभागायुक्त इंदौर, अपर सचिव पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, जिला पंचायत के सीईओ से भी की गई हैं। जिसमें जिला पंचायत सीईओ द्वारा इस संबंध में कलेक्टर द्वारा दल गठित कर जांच करने की बात कही गई।
कागजों पर बना दिए शौचालय
इसी तरह रहली में भी निर्मल भारत अभियान में भ्रष्टाचार सामने आया है। शासन की इस महत्वपूर्ण योजना को निर्माण एजेंसी द्वारा जमकर चूना लगाया जा रहा है। रहली ब्लाक में शौचालयों का निर्माण पंचायतों के माध्यम से किया जा रहा है लेकिन अधिकांश पंचायतों में राशि का दुरूपयोग कर शासन की मंशा पर पानी फेरा जा रहा है। निर्मल भारत अभियान में लाखों का घोटाला प्रमाणित होने के बाद भी संबंधित अधिकारियों द्वारा दोषियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही नहीं कि जा रही है, सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाकर औपचारिकता पूरी की जा रही है। ब्लाक के दस सरपंचो एवं सचिवों द्वारा शौचालयों के निर्माण की लाखो रूपए की राशि आहरित कर शौचालयों का निर्माण नहीं कराया गया है। जनपद द्वारा कई बार सरपंच-सचिव को नोटिस जारी किए गए परन्तु इसके खिलाफ कार्यवाही नहीं किया जाना संदिग्ध है। विभागीय सूत्रों के अनुसार इस गडबडी में संबंधित अधिकारी भी भागीदार है और इसी कारण सरपंचों सचिवों पर कार्यवाही नहीं की जा रही है। ब्लाक की इकलौती पंचायत जरिया खिरिया के सरपंच सचिव पर ही एफआईआर दर्ज कराई गई है बाकी दोषी सरपंचों पर कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही इसका जबाब देने को कोई तैयार नहीं है।
ग्राम पंचायत सागौनी बुदेला, खैराना, रमखिरिया, चौका गढाकोटा, बोरई, बसारी, उदयपुरा, छपरा, पटना बुर्जग के सरपंचो-सचिवो को लगभग डेढ़ माह पूर्व नोटिस जारी कर सात दिवस के अंदर राशि जमा करने के निर्देश जारी किए गए थे। राशि जमा नहीं करने पर एफ आईआर दर्ज करने की चेतावनी दी गई थी परन्तु सरपंचो-सचिवों द्वारा समय सीमा गुजर जाने के बाद भी न तो राशि जमा कराई गई है और ना ही शौचालयों का निर्माण कराया गया है। उक्त पंचायतों में पांच-पांच लाख रूपए से अधिक का फर्जीवाड़ा किया गया है। समग्र स्वच्छता अभियान के ब्लाक समन्वयक अनुपम सराफ का कहना है कि नोटिस के बाद भी सरपंच-सचिवों ने राशि जमा नहीं कराई है। सब इंजीनियार के साथ मौका मुआयना कर रिपोर्ट तैयार की जा रही है शीघ्र ही एफआईआर दर्ज कर कार्यवाई की जाएगी।
सरकार ने पंचायतों से वापस मंगाई राशि
प्रदेश में यह अपनी तरह का पहला मामला है जब एक बार राशि आवंटित होने के बाद सरकार ने उसे वापस बुलाया है। अब गांवों में होने वाले कामों का फिर से सर्वे कराकर यह राशि दी जाएगी। गौरतलब है कि प्रदेश सरकार इस समय स्वच्छता अभियान पर खासा जोर दे रही है। सरकार ने गांवों में रहने वाले गरीब लोगों को घरों में शौचालय बनवाने के लिए बीपीएल कार्डधारकों को 12 हजार रुपए देने का तय किया है। इसके अलावा प्रत्येक ग्राम में सार्वजनिक शौचालय बनवाने की भी सरकार की योजना है। पिछले महीने 475 करोड़ की राशि ग्राम पंचायतों के लिए जारी की गई थी। यह राशि ग्राम पंचायतों में पहुंचते ही सरपंच इस राशि से शौचालय बनवाने की जगह दूसरे कामों में खर्च करने लगे। इसकी भनक जैसे ही पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव को लगी उन्होंने सभी जिला पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को निर्देश दिए कि सात दिन के भीतर सभी पंचायतों से सख्ती से राशि बुलाकर उसे सरकारी खजाने में जमा किया जाए। मंत्री के आदेश मिलते ही सीईओ सक्रिय हुए और पंचायतों से राशि वापस बुला ली। अब यह राशि जिला पंचायतों के खाते में जमा है। सतना कलेक्टर संतोष मिश्रा कहते हैं कि रिकवरी की एनओसी की बाध्यता के अच्छे नतीजे आए हैं। अकेले शौचालय निर्माण मद में फंसी 9 करोड़ रुपए की वसूली कराई गई है। पर यह रकम पर्याप्त नहीं है। जल्द ही सख्त अभियान चला कर दोषियों से वसूली की जाएगी। जरुरत पड़ी तो पुलिस कार्यवाही भी की जाएगी।
विभाग के आदेश के बाद भी राशि न लौटाने वाली एक सौ दस पंचायतों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही की तैयारी कर ली गई है। इन पंचायतों को आरआरसी के तहत रिकवरी के नोटिस जारी किए गए हैं। नोटिस के बाद भी राशि न लौटने पर सरपंच की सम्पत्ति की कुर्की कर राशि वसूल की जाएगी।
पैसों का पॉवरप्ले बनी पंचायतें
मध्य प्रदेश पहला राज्य है, जहां संविधान संशोधन के बाद सबसे पहले पंचायत चुनाव कराए गए थे। कभी पिछड़े एवं वंचित वर्ग के राजनीतिक एवं सामाजिक सशक्तीकरण को लेकर चर्चित हुईं, सूबे की पंचायतें अब आर्थिक अनियमितता एवं भ्रष्टाचार को लेकर चर्चा में हैं। स्थानीय निधि संपरीक्षा द्वारा पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के प्रमुख को सौंपी गई समेकित ऑडिट रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि पंचायतें न तो ऑडिट कराने में रुचि ले रही हैं, न ही इसमें सहयोग कर रही हैं। यहां तक कि हिसाब-किताब रखने की जिम्मेदारियों से भी बच रही हैं। ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि पंचायतों में करोड़ों की अनियमितता हुई है। रिपोर्ट में साफ-साफ कहा गया है, 'अधिकतर जगहों पर मनरेगा के अभिलेख स्थानीय निधि संपरीक्षा विभाग को अंकेक्षण के लिए उपलब्ध नहीं कराने से शासन की इस सबसे महत्वपूर्ण एवं महत्वकांक्षी योजना का विधिवत अंकेक्षण संपादित नहीं हो पा रहा है।Ó
शुरुआती दौर में आर्थिक मामलों में पंचायतों के अधिकार सीमित थे, पर पिछले कुछ साल से पंचायतों के जरिए करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। मनरेगा आने के बाद पंचायतों में पैसों का प्रवाह बहुत तेजी से बढ़ा है, पर ग्राम पंचायतों की ऑडिट स्वंतत्र एजेंसियों से कराने का प्रयास कभी नहीं किया गया। 11वें वित्त आयोग की अनुशंसा के बाद, आखिरकार सूबे के वित्त विभाग को ग्राम पंचायतों एवं ग्राम कोषों का ऑडिट नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के पर्यवेक्षण में स्थानीय निधि संपरीक्षा के जरिए कराने का आदेश निकालना पड़ा। इस आदेश के बाद स्थानीय निधि संपरीक्षा ने ग्राम पंचायतों एवं ग्राम कोषों के अलावा जिला एवं जनपद पंचायतों की भी ऑडिट शुरू की। एक ओर, राज्य में ऑडिटरों की भारी कमी है, जिसकी वजह से सभी पंचायतों की ऑडिट संभव ही नहीं है, तो दूसरी ओर कई पंचायतें ऑडिट में सहयोग ही नहीं करना चाहतीं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरूण यादव कहते हैं, 'यदि प्रदेश के सभी पंचायतों की ऑडिट हो तो वित्तीय अनियमितताओं के जो मामले सामने आएंगे, उनमें अरबों रुपये के भ्रष्टाचार का खुलासा होगा। सरकार का विकास से कोई लेना-देना नहीं है। वह यात्राओं में उलझी हुई है। इसका फायदा मैदानी अमला उठा रहा है। विकास कार्यों एवं मनरेगा के लिए मिलने वाली राशि में भारी भ्रष्टाचार हो रहा है।Ó
पंचायतों में 9,388 लाख का अनियमित भुगतान
प्रदेश की पंचायतें भ्रष्टाचार एवं अनियमितता का ठीहा बन गई हैं। त्रिस्तरीय पंचायतों में कुल 9,388 लाख 12 हजार रुपए का अनियमित भुगतान किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 'ऐसे समस्त भुगतान, जो कि स्थापित नियमों के विपरीत किए गए हैं, अनियमित भुगतान हैं।Ó ग्राम पंचायतों में अनियमित ऑडिट आपत्तियों की संख्या 17,178 है, जिसमें 8,944 लाख 89 हजार रुपये का अनियमित भुगतान हुआ है। इस मामले में पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव के क्षेत्र-सागर संभाग में सबसे ज्यादा 3,404 लाख 76 हजार रुपए का अनियमित भुगतान हुआ है। जनपद पंचायतों में 408 लाख 64 हजार रुपए का अनियमित भुगतान एवं जिला पंचायतों में 34 लाख 59 हजार रुपए का अनियमित भुगतान हुआ है। अनियमित भुगतान की वजह से भ्रष्टाचार की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। पंचायतों में 41.15 लाख रुपए के गबन का मामला सामने आया है। इसमें सरपंच एवं सचिव ने मिलकर कई तरह की तिकड़में लगाईं। गबन के सबसे अधिक मामले इंदौर एवं ग्वालियर संभाग में उजागर हुए हैं। 50 जिला पंचायतों में से महज आठ का अंकेक्षण होने से, गबन का एक प्रकरण सिर्फ रीवा से सामने आया है।
ग्राम पंचायतों द्वारा 16,733 लाख 78 हजार रुपए की अनुदान राशि खर्च ही नहीं की गई। इस मामले में जनपद एवं जिला पंचायतों की भूमिका नकारात्मक रही है। रिपोर्ट में टिप्पणी की गई है, 'केंद्र एवं राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान राशि का उपयोग न हो पाना अत्यंत गंभीर बात है, क्योंकि यह राशि 'राज्य के सर्वांगीण विकासÓ के लिए है। राशि का उपयोग नहीं होने का प्रमुख कारण त्रिस्तरीय पंचायती राज की प्रमुख संस्था जिला एवं जनपद पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों द्वारा अनुदान राशि को समय से ग्राम पंचायतों को उपलब्ध नहीं कराना एवं ग्रामीण यांत्रिकी विभाग के अधीन तकनीकी सेवाओं के लाभ को ग्राम पंचायत एवं ग्राम सभा स्तर तक नहीं पहुंचाया जाना है।Ó इस मामले में भी पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री का क्षेत्र-सागर संभाग आगे है, जहां 6,423 लाख 58 हजार रुपए की अनुदान राशि खर्च नहीं हो पाई। जनपद पंचायत, अनुदान राशि ग्राम पंचायतों को देने के बजाए ब्याज प्राप्ति के लिए खातों में रखते हैं, इसे अत्यंत आपत्तिजनक माना गया है। इन कमियों को छुपाने के लिए जिला पंचायतों ने ऑडिट के लिए मेमो का उत्तर देना तक मुनासिब नहीं समझा।
पंचायतों ने नियम के विपरीत जाकर अग्रिम भुगतान करने में भी दिल खोलकर उदारता दिखाई। इस कारण 716 लाख 88 हजार रुपए अवशेष अग्रिम राशि है। कई निकायों में यह 20-25 साल से लंबित है। ग्राम पंचायतों की वित्तीय एवं कार्य अनियमितता के कारण 132.29 लाख रुपए की राजस्व की हानि भी हुई है। ग्राम पंचायतें नियम के विपरीत जाकर अपने को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा रही हैं। यह भी देखने में आया है कि व्यय करने के मामले में पंचायतें नियमों से परे जाकर बड़े पैमाने पर खर्च कर रही हैं, जो कि एक तरह का भ्रष्टाचार ही है। व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाकर भी जनपद पंचायतों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
अब एमएफएस के जरिए होगा पैमेन्ट
ग्रामीण विकास विभाग ने तय किया है कि अब निर्मल भारत अभियान के पूरे कार्यक्रम की फिर से समीक्षा की जाएगी। इसके बाद ही राशि जारी की जाएगी। यह भी तय किया गया है कि राशि पंचायतों को देने के बजाए अब इलैक्ट्रानिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम (एमएफएस) के जरिए सीधे हितग्राही के खाते में शौचालयों के निर्माण के लिए दी जाएगी। इस राशि के तहत होने वाले अन्य कामों का उपयंत्री और पंचायत समन्वय अधिकारी भौतिक सत्यपान करेंगे इसके बाद ही अतिरिक्त राशि जारी की जाएगी। इस संदर्भ में पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव कहते हैं कि निर्मल भारत अभियान के तहत पंचायतों को दी गई राशि के भ्रष्टाचार की शिकायतें आ रही थीं। राशि का कई पंचायतें गलत उपयोग कर रही थीं। इसलिए राशि वापस बुलवा ली है, अब योजना की फिर से समीक्षा कर जारी किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्र में अब तक लगभग 63 प्रतिशत परिवार शौचालय की सुविधा से वंचित हैं। इस दिशा में कुल शौचालय विहीन परिवारों में से वर्ष 2015-16 में 20 प्रतिशत, वर्ष 2016-17 में 35 प्रतिशत एवं 2017-18 में शेष 45 प्रतिशत परिवारों को शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। संपूर्ण राज्य को 31 मार्च 2018 तक खुले में शौच से मुक्त किए जाने की कार्य योजना बनाई गई है।
1600 करोड़ की दरकार, कई योजना में पैसा नहीं
प्रदेश में दो महीने से अधिक समय तक चले पंचायत चुनावों की वजह से पंचायतों में पैसे का टोटा पड़ गया है। विभिन्न कार्यो सहित कई योजनाओं में बजट जारी करने पर लगाई गई रोक के कारण अब पंचायतों को 1600 करोड़ की दरकार है। वैसे विभाग ने अक्टूबर-नवंबर से ही आवंटन पर रोक लगा दी थी, जबकि पंचायतों के लिए 1830 करोड़ 92 लाख रुपए का आवंटन होना था, जिसमें से पंचायतों को 230 करोड़ 71 लाख की मिल सके, जिसके कारण पंचायतों में कई योजनाओं के कार्यो पर विपरीत प्रभाव पड़ा। वित्तीय वर्ष 2014-15 के लिए राज्य सरकार ने पंचायतों के लिए 1830 करोड़ 92 लाख का बजट जारी किया था, लेकिन पंचायत चुनावों के चलते कई योजनाओं पर आवंटन रोक दिया गया। खासकर पंच-परमेश्वर योजना, मुख्यमंत्री हाट बाजार योजना, कपिल धारा योजना आदि शामिल हैं। केंद्र प्रवर्तित योजना में राज्य सरकार को 1223 करोड़ 70 लाख रुपए मिले थे, जिसमें से आवंटन 388 करोड़ का किया गया और 746 करोड़ 64 लाख रुपए की राशि की अभी दरकार है। पंचायत सचिवों का प्रशिक्षण, पंचायतराज संस्थाओं को प्रभार के मामले में 167.90 करोड़ में से 24.37 करोड़ की राशि मिल सकी। 13वें वित्त आयोग से अनुशंसित योजनाओं के लिए भी पैसा नहीं मिल सका, जबकि गौण खनिज से प्राप्त होने वाली 340 करोड़ 320 करोड़ जारी किए गए। स्टाम्प शुल्क से वसूली से मिलने वाली 342.37 करोड़ में से मात्र 46 करोड़ ही आवंटित किए जा सके और 275.83 करोड़ की राशि की पंचायतों को दरकार है, पंचायत सचिवालयों के संचालन के लिए 89 करोड़ में से 83.78 करोड़ की दरकार पंचायतों को है, जबकि अनुरक्षण के लिए अनुदान के रूप में 10 करोड़, पेयजल के लिए विद्युत व्यय की पूर्ति के लिए 40 करोड़ अटका पड़ा है। साथ ही राजीव गांधी पंचायत सशक्तिकरण योजना में मिलने वाली 72.14 करोड़ की राशि का प्रावधान तो किया गया, मगर राशि जारी नहीं की गई। अब नए वित्तीय वर्ष में इन लटकी हुई योजनाओं के लिए फंड जारी किया जाएगा।
लक्ष्य से भटक गई मप्र सरकार की मर्यादा
मध्यप्रदेश में स्वच्छता के लिए चलाए गए अभियान को भ्रष्टाचार की बुरी नजर लग गई है। इसका परिणाम यह हुआ है कि स्वच्छता के लिए स्वीकृत की गई राशि भ्रष्ट कर्मचारी हजम कर रहे हैं। निर्मल भारत अभियान से लेकर स्वच्छता अभियान तक के नाम पर बड़ी रकम केन्द्र और राज्य शासन की ओर से स्वीकृत की गई थी। परन्तु गांव शहर के गली मुहल्लों से लेकर पाठशाला तक हर तरफ आज भी पर्याप्त साफ-सफाई नजर नहीं आ रही है। 2003 में केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना को मप्र सरकार मर्यादा योजना के नाम से चला रही है उसने शौचालय बनाने का जिम्मा ग्राम पंचायतों को दे रखा है पंच-सरपंच मिलकर गरीबों के इन शौचालयों की दीवारें, छतें, पानी की टंकियां कमोड सैप्टिक टैंक और मौका लगा तो पूरा का पूरा शौचालय ही डकार गए हैं। गांवों में मौजूद ऐसे आधे-अधूरे शौचालयों के अवशेष इस योजना में फैले भ्रष्टाचार को उजागर करते हैं इनमें से ज्यादातर कंडे या भूसा भरने के काम में आ रहे हैं। जिनके पास पैसे थे या जिन्हें शौचालय की जरूरत थी उन्होंने अपने पैसे लगाकर ऐसे आधे-अधूरे शौचालयों को उपयोगी बना लिया है।
पूरी दुनिया में खुले शौच के लिए होने वाली बदनामी से परेशान भारत सरकार ने 2003 में समग्र स्वच्छता अभियान के नाम से गरीबी की रेखा से नीचे के परिवारों के कच्चे-पक्के घरों में शौचालय बनाने की योजना शुरू की थी। सरकार इन बीपीएल परिवारों को घर में शौचालय बनाने के लिए 500 रुपए की प्रोत्साहन राशि देती थी जो धीरे-धीरे बढ़कर 1200 रुपए और 2012 तक 3200 रुपए कर दी गई थी। तब माना गया था कि एक छोटा सा चारदीवारों वाली एक छत एक कमोड, एक सैप्टिक टैंक, एक पानी की टंकी युक्त शौचालय 3500 रुपए में बनकर तैयार होता है। इसमें 300 रुपए का इंतजाम उस व्यक्ति को करना होता था जिसके घर में शौचालय बन रहा होता था। बाकी 3200 रुपए सरकार देती थी।
केंद्र द्वारा 2012 में इस अभियान का नाम संशोधित करके निर्मल भारत अभियान कर दिया गया। मप्र सरकार ने इसे मर्यादा अभियान के नाम से लागू किया। प्रोत्साहन राशि 3200 रुपए से बढ़ाकर 4600 रुपए हो गई साथ में मनरेगा से इसमें 4400 रुपए और जोड़े गए। हितग्राही का अंशदान बढ़ाकर 900 रुपए कर दिया गया। इस तरह शौचालय की लागत 9900 रुपए हो गई। 2014 में इसमें 1000 रुपए और बढ़ाकर 10900 रुपए कर दिया गया पहले जो योजना केवल बीपीएल परिवारों के लिए थी उसमें एपीएल, अनुजाति, अनु.जनजाति, निषक्तजन, भूमिहीन किसान, लघु सीमांत किसान परिवारों को भी इससे जोड़ दिया गया। साथ ही शौचालय निर्माण की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों को सौंप दी गई जिन्हें अपने गांव के जरूरतमंदों के घरों में उनसे 900 रुपए जमा कराकर उनके लिए शौचालय बनवाने थे। लोग 900 रुपए नगद या शौचालय निर्माण में मजदूरी करके भी अपने इस अंशदान का भुगतान कर सकते थे।
स्कूलों में शौचालय के लिए 600 करोड़ का खर्चा
मप्र के 40 हजार स्कूलों में शौचालय निर्माण एवं पुननिर्माण की तैयारियां शुरू हो गईं हैं। इसके लिए करीब 600 करोड़ रुपया खर्च किया जाएगा। सरकार कई अलग अलग माध्यमों से पैसा जुटाने की तैयारी कर रही है, शौचालय इस तरह से बनाने का प्रयास है कि मोदी के स्वच्छता अभियान में अव्वल नंबर मिल जाए। प्रदेश के शौचालय विहीन स्कूलों में अब कॉर्पोरेट सेक्टर और सरकारी कंपनियों की मदद से टॉयलेट बनेंगे। राज्य सरकार धन इकट्ठा करने के लिए मुख्यमंत्री स्वच्छता कोष बना रही है। केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम भी इस अभियान में राज्य सरकार के साथ रहे हैं। सांसद और विधायक निधि का उपयोग भी इसमें किया जाएगा। वर्तमान में राज्य के एक तिहाई सरकारी स्कूलों में टॉयलेट नहीं है या फिर उपयोग करने लायक नहीं बचे। एक रिपोर्ट के मुताबिक छात्राओं का पढ़ाई बीच में छोडऩे का एक कारण स्कूलों में टॉयलेट नहीं होना भी सामने आया है। प्रदेश में प्राथमिक से लेकर हायर सेकंडरी स्तर के स्कूलों में अभी 17, 851 टॉयलेट्स की आवश्यकता है। इनके निर्माण में लगभग तीन सौ करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसके अलावा 23,359 स्कूलों में बने टॉयलेट उपयोग में नहीं आते। इनके पुनर्निर्माण पर लगभग 260 करोड़ रुपए खर्च संभावित है। केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा मध्यप्रदेश में सीएसआर (कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) के अंतर्गत 13363 शौचालयों के निर्माण पर सहमति दे दी है। स्कूल शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार कोल इंडिया लिमिटेड, नेशनल हाइड्रो पॉवर कॉरपोरेशन, गेल, एनटीपीसी आदि ने स्कूलों का चयन भी कर लिया है। केंद्र सरकार के कुछ मंत्रालयों ने भी इसमें रुचि दिखाई है।
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